डॉ सुनील कुमार की 2 कविताएं

आग की खोज

उन बस्तियों के लिए आग की खोज
एक जुगुनू के द्वारा हुई

इतना घुप्प अंधेरा था सदियों से
एक जुगनू भी उन्हें विशालकाय सूरज सा लगने लगा
उसे देख कर सदियों की अंधेरी बस्तियों को
आग का एहसास हुआ
उन्हें भी गर्माहट सी होने लगी विचारों की
उनकी सोचने विचारने की क्षमता में
उथल-पुथल हो गया
तर्क वितर्क करने लगे
सदियों से सुन्न मस्तिष्क
जुगनू आभार तुम्हारा
तुम्हारे आने से
सदियों से मौन लोगों के अंदर
आग की खोज होने लगी।

पूर्ण विराम

पूर्ण विराम कब तक, यह झुकता सलाम कब तक?
नया सूरज उदित हो गया

उम्मीद की किरणें बो गया
हौसलों की फसल उग रही
चेतना नई जग रही, उनका स्वाभिमान कह रहा
पूर्ण विराम कब तक, यह झुकता सलाम कब तक?
अपने हक लेकर रहेंगे
आक्रोश को अब कह कर रहेंगे
मौन हमें अब रहना नहीं

ज़ुल्म हमें अब सहना नहीं
हर सबक अब यह कह रहा
पूर्ण विराम कब तक, यह झुकता सलाम कब तक?
अब तो दमन की हदें पार हो गई
उनकी अय्याशी शर्मसार हो गई
अब गूंजने लगा विद्रोह का शंखनाद
उठने लगी है हर दिशा से एक ही आवाज
पूर्ण विराम कब तक, यह झुकता सलाम कब तक?
जुर्म के क़िले उखड़ने लगे
शोषण के कारखाने में जंग लगने लगे
सदियों के सोए जगने लगे
स्वाभिमान की खुशबू उनकी चेतना में जाने लगी
उनके खुलते किवाड़ अब पूछने लगे
पूर्ण विराम कब तक, यह झुकता सलाम कब तक?
छिन्न-भिन्न करो इनकी सत्ता को
नेस्तनाबूद कर दो अन्याय के पेड़ के हर पत्ता को
सदियों का संताप अब इन्हें भी सहना होगा
सत्य बयान इन्हें भी देना होगा
हर सुनवाई कह रही है
पूर्ण विराम कब तक, यह झुकता सलाम कब तक?


डॉ०सुनील कुमार
(हिंदी विभाग)
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जोशीमठ(चमोली), उत्तराखंड।
जन्म:- 19 नवम्बर, जनपद- पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड।
संप्रति:- राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जोशीमठ, चमोली, उत्तराखंड में अध्यापन

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