सिमन्तिनी रमेश वेलुस्कर की कविताएं

1.

कठिनतम परिस्थितियों में

जब मुट्ठी भर संवेदनशील लोग

शर्म से गड़े जा रहे हैं

पांच हज़ार बरसों में

लगभग चौदह हज़ार

युद्धों का इतिहास

चीख़ चीख़ कर कह रहा है

कोई राजा आज तक

शर्म से नहीं मरा

2.

चैत और फागुन के बीच के मौसम में

जब चलती रहती हैं सूखी हुई हवाएं

पेड़ों से पत्तियां झाड़ती

गाल और होंठ फाड़ती

सर्दी से बढ़ती हुई गर्मी के बीच

सब कुछ नहीं सूखता इस वक़्त भी

सरसों लहलहाती है

चना भी बेसुरे घुंघरू पहन इठलाता है

गेहूँ भी ठाठ दिखाता है

बोगनबेलिया की गहरी हरी बेलों पर आते हैं फूल

गहरे गुलाबी रंग के

जंगली घास में फूल खिलते नारंगी गुलाबी नीले

इस मौसम में जब हवा सर्दी के दुशाले हटाने लगती है

धौल ढाक के बिना पत्तों वाली शाखों में भी

लगते हैं ख़ूबसूरत चटख लाल रंग के फूल

और छोटी काली हमिंगबर्ड चुनती है पराग उन्हीं फूलों से

सूखी हवा में भी प्रेम झरता है

और लिखता है कविताएं

गेहूँ की बालियों में

चने के बूट में

सरसों में फूलों में

बोगनबेलिया में

जंगली घास में

और ढाक की सूखी शाख़ों पर भी

चटख लाल फूल टांक कर

हमिंगबर्ड एक पेड़ से दूसरे पेड़

बायने में प्रेम बांट आती है.

(ढाक के फूलों का परागण ये हमिंगबर्ड ही करती है)

3

जब तुम बूढ़े हो चुकोगे

और तुम्हारी अगली पीढ़ी जवान

तब वो भविष्य की सुनहरी किरण

जो तुम्हारी चुप्पी की कालिख में धुंधली हुई है

तुमसे पूछेगी

जब समय इतना क्रूर था

तब तुमने क्यों नहीं फूँका

बग़ावत का बिगुल ?

भविष्य का बच्चा

पूछेगा एक बूढ़े बुद्धिजीवी से

क्यों नहीं दिखाई

नए रास्ते पर रोशनी

भविष्य का बच्चा

पूछेगा सवाल अपने माता पिता से

क्यों नहीं पूछ पाये सवाल

जब तुम दरकिनार बच्चे थे

भविष्य का बच्चा

पूछेगा सवाल अपने समाज से

किस नींद में थे कि

सोकर ही बर्बाद कर दिया

हमारा आज

जो उस वक़्त तुम्हारा ही भविष्य था ?

भविष्य का बच्चा

पूछेगा सवाल बूढ़े हो चुके कवि से

तुम्हारी कलम की सियाही

आग क्यों नहीं बनी तब

जब हमारे आज को तबाह करने के लिए तुम्हारे सियासतदां

पुरज़ोर कोशिश में लगे थे

भविष्य का बच्चा पूछेगा

सवाल अपनी पुरानी नस्लों से

समय बेशक़ अंधेरा रहा होगा

अंधेरा आँखों को ग़ुलाम कर सकता है

पर आवाज़ को नहीं

और तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं होगा

क्योंकि तुम आज सो रहे हो

भविष्य से आती हुई उस चीख़ से अनजान

जो तुम्हारी ही आने वाली पीढ़ी की है.

क्योंकि भविष्य का बच्चा

ग़ुलामी से दोस्ती नहीं करेगा

4.

मन मधुमक्खी के छत्ते सा

ना जाने कितने कोटर

सबके अलग अलग

और कोई भी एक दूसरे से मिलता नहीं

इतने पास होकर भी

एक दूसरे से कितने दूर

मन मधुमक्खी के छत्ते सा

हर कोटर में शहद सा ज़हर

सब उगलते हैं

और कोई भी नहीं पीता किसी का ज़हर

सब अपने ज़हर से ही बेहोश हैं

गलतफहमी में

कि मेरे ज़हर से वो मर गया

मन मधुमक्खी के छत्ते सा

5

ऐसे समय में

जब हर तरफ मचा हो

पीड़ा में होड़ का घमासान

कवि भी लिख रहे हों

भारी भरकम शब्दों में

अकर्मण्यता और निराशा भरी कविताएं

ऐसे समय में

मैं नहीं लिख पा रही

नरसंहार की दशाएं

नहीं कह पा रही

तीर और तलवार की महानता

ऐसे समय में भी

मैं लिखना चाहती हूं

प्यास से पानी का प्रेम

बीजों के जंगल में बदल जाने की कहानी

हवाओं के परों पर पानी के उड़ने की कहानी

एक देश का पानी दूजे देश बरसने की कहानी

हाँ मैं नहीं लिखना चाहती

थकी हुई हताश ऊर्जा

मैं थमाना चाहती हूँ बच्चों के हाथों में वो किताब

जिसमें सिर्फ़ प्रेम लिखा हो

क्योंकि नफ़रत और जंग की ज़रूरत

सिर्फ़ सियासत को है

बिल्कुल उसी तरह जिस तरह

जंगल की ज़रूरत इंसान को है

जंगल को इंसान की नहीं

6.

धरती देती है संकेत

समय समय पर

आदमी समझ नहीं पाता

जंगल जलाता है

ईंधन जलाता है

सुविधा बटोरने में जान भी जलाता है

कई बार घर भी

और हर बार मन जलाता है

आदमी कितना जलनखोर है

इसे सिर्फ जलाना आता है

आदमी

बुझाता कुछ भी नहीं

—–

सिमन्तिनी रमेश वेलुस्कर 

पता: जानकीपुरम विस्तार, लखनऊ

शैक्षिक योग्यता : जीवन विज्ञान में परास्नातक

स्वतंत्र लेखन

फ़ोन- 9888695851

8 Responses

  1. Anonymous says:

    क्या बात बहना, लिखते रहो इसी तरह

  2. Dr AjayVikram says:

    V nice

  3. Anonymous says:

    बेहद अच्छी लगी

  4. मनोज जैन says:

    सार्थक और यथार्थबोध की परिपक्व कविताएँ हार्दिक बधाइयाँ

  5. अर्चना राज चौबे says:

    बहुत सशक्त कवितायें सीमांतिनी, बधाई।

  6. Anonymous says:

    Keep it up dear simmo
    God bless u

  7. Anonymous says:

    समय को चुनौती देती कविताओं के लिए धन्यवाद।

  8. Yogender rathore says:

    बहुत अच्छी कविताए।बधाई।

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