आलोक कुमार मिश्रा की कविताएं

 

हंसो औरतों             

            (1)

चलो एक ऐसी दुनिया बनाएँ 
जहाँ औरतें हंसें तो 
हंसने लगें सारी दिशाएं 
वो बाहर निकलें तो 
स्वागत में खड़ी मिलें राहें 
जब उनके सिर में उभरें दर्द की रेखाएँ 
स्नेह से पगी उँगलियाँ उनके बालों में 
भागती दिख जाएँ 
जब वो साधें मौन 
खलबली सी हो हर ओर
जब वो रोयें तो रो पड़े धरती का हर छोर
चलो एक ऐसी दुनिया बनाएँ 
जहाँ मर्दों के साथ औरतें भी हरियाएं।

 

          (2)

जब 
हंसती है औरत
तब हंसता है अंबर
हंसती हैं दिशाएं 
हंसते हैं बच्चे 
हंस पड़ती हैं बलाएँ 

पर 
जब हंसती है औरत
कुछ चेहरों पर क्यों 
खिंच जाती हैं रेखाएँ 
कुछ लोगों को क्यों 
नहीं भातीं फिजाएं?

 

        (3)

हंसी एक पर्दा है
जिसमें बड़े सलीके से खुद को
छुपा लेती है वो
आँखें खिड़की हैं
जिस रस्ते थोड़ा सा खुद को
दिखा देती है वो।

 

मौन या मौत?

मैं और कुछ नहीं कर सकता था 
सिवाय रोने के
चिल्लाने के
थक हार कर प्रार्थना के शब्द 
बुदबुदाने के

वह समय ऐसा था कि मनाही थी
सवाल उठाने पर
तर्क लगाने पर
राय रखने पर
मुट्ठियाँ लहराने पर

और मैं! 
ये सब कौन कहे
रोया भी नहीं 
चिल्लाया भी नहीं 
प्रार्थना में बुदबुदाया भी नहीं

हाय! ऐसे में मैंने मौन चुना
ओह! मौन नहीं मैंने मौत चुना।

 

भूल

वह प्रेम में पड़ी और भूल गई 
जीवन की जरूरी खुराक
उसे याद न रहे पूछने वे प्रश्न 
जो उसके प्रेमी की रूह की करते पड़ताल
संशय तो उसे प्रेम में बाधा ही दिखे
सो झटक कर रख दिया बुद्धि से परे

वह साथ-साथ बस में घूमा
चिपक कर बैठा रहा उसकी बगल की सीट पर
खड़े रहे एक जोड़ी थके पैर वहीं 
अपनी ललचाती बूढ़ी आँख लिए
लेकिन वह चुन नहीं पाई इस वाकये को 
उसकी परीक्षा के लिए

अमूमन वह डूबी रहती थी
अपने और उसके जिस्म के भीतर से 
घहराती और बह आती नदी में
वह इंसान से बन जाती थी पानी
घर, परिवार, पड़ोस, समाज, राजनीति 
प्रेम की इस बाढ़ में हो जाते थे ओझल

जब उसने उसे बताया था
अपने मोहल्ले में हुए दंगों के बारे में 
और उसमें अपनी भागीदारी का किया था गुणगान
वह थरथराने लगी थी बस यह सोचकर
कि कहीं उसे कुछ हो जाता तो
बाकी हुए-हुवाए पर प्रेम का परदा था

वह तब भी नहीं चेती
जब वह उसे ले गया था एक मंहगे रैस्टोरेंट में 
और वेटर से उसकी कुर्ती पर जूस गिर जाने से 
वह नहीं रह पाया था अपने आपे में 
उसने इसे प्रेम की अभिव्यक्ति माना
वह एक ठूंठ को प्रेम का बरगद समझ 
सींचती रही

इस तरह धीरे-धीरे 
भूल ही गई वह 
प्रश्न करना
अस्तित्व रखना
कुछ पूछना
कुछ होना

और वह होता गया
प्रेमी से
पति
मालिक
स्वामी
अमानुष
बहुत कुछ।

 

बुरी कविता

दुनिया की तमाम 
असुंदरताओं से ही नहीं 
बहुत सी सुंदरताओं से भी
ज्यादा सुंदर होती है
बुरी से बुरी 
कविता

शर्त यही है कि
बस
वो कविता हो।

 

मेरी इच्छाएं

यही कामना है कि
बहता रहूँ उम्र भर
पर बहकर जाऊँ कहीं भी
नदी सा पकड़े रहूँ 
अपना उद्गम

यही प्रयास है कि 
बढ़ता रहूँ हमेशा
पर इतना ही कि
किसी पेड़ की शीतल छाया में 
समेट सकूँ 
अपना अस्तित्व 

अगर गिरूं भी कभी
तो ऐसे नहीं कि उठ ना न सकूँ 
गिरूं भी तो
लड़खड़ाते, गिरते, उठते 
और फिर आगे बढ़ जाते
शिशु की तरह

मेरी इच्छा है कि
लिप्त रहते हुए भी रहूँ निर्लिप्त 
जिससे किसी भी समय
किसी कबीर सा 
झाड़ कर गर्द मोह का 
होकर निष्पक्ष कह सकूँ-
‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’

यही सब चाहता हूँ मैं 
और जानता हूँ कि
बहुत मुश्किल है डगर पनघट की।

माहौल 

घर के अंतिम कोने वाले कमरे में 
उदास बैठी एक बुढ़िया 
गिन रही है अपनी खत्म होती सांसें 
सहला रही है अपने जड़ होते पैर
कुछ भी देख नहीं रहीं 
शून्य में ताकती उसकी आँखें 

उसी घर का बड़ा ड्राइंग रूम 
गूँज रहा है कहकहों से
बुढ़िया के पोते-पोतियां
उनके दोस्त और मॉडर्न माँ-बाप
कर रहे हैं पार्टी
सुसज्जित माहौल और महंगे गिफ्ट
खुशियों की कर रहे हैं तस्दीक़ 

इधर सदियों से 
एक ही लय में घूम रही धरती
न जाने क्यों 
अनुभव कर रही है आज
खुद को बूढ़ी
कहकहे चुभ रहे हैं उसको
माहौल दमघोंटू सा लग रहा है।

बोझ

सुनो दुक्खहरन!
मेरी पीठ पर लदे पर्वत को
जरा सा खिसका दो
बस इतना कि
हवा छू जाये तनिक चमड़ी को
इसे लेना मत अपनी पीठ पर
बस हिला दो थोड़ा सा

क्या! इतना भी नहीं करोगे
कोई बात नहीं 
हट जाओ मेरे रास्ते से
कि मेरी पीठ पर कोई पर्वत नहीं 
अब तुम खुद सवार हो
हटो मुझे पटकना है यह बोझ
यहीं इसी बंजर पर।

मैं और पिता

छत्तीस बरस की उम्र मेरी
और खुद को बच्चा अनुभव करता हूँ 
जब बरामदे में बैठे पिता के सामने से गुजरता हूँ 
लांघने से पहले और बाद जैसी नहीं रहती मेरी चाल
बरामदे से गुजरते हुए
सलीके से उठते हैं कदम
कुछ लड़खड़ाते, सहमते, संभलते हुए

नजरें पिता की जब मुझे देखतीं हैं 
तब मेरी नजरों में वह ताब नहीं होता कि
वे भी देखें उन्हें  
काश पिता की आँखों में कभी मैं झाँक कर देखूँ 
और जान पाऊँ कि उम्र भर मेरे लिए मीठे पानी का सोता रहे पिता
अंदर का खारापन कहाँ रोके रखते हैं

मेरे घर देर तक न आने पर
वो परेशान रहते हैं 
माँ और पत्नी से दरोगा बन पूछताछ करते रहते हैं कि- 
‘क्या बोलकर गया था, फोन पर पूछा कि नहीं?’
और जब मैं आ जाता हूँ तब पाता हूँ उन्हें शांत बैठा हुआ
कैसे अंदर से इतना लबालब भरे पिता
रूखे बने रहते हैं ऊपर से

एक दिन चिपक कर 
झाड़ देना चाहता हूँ रूखेपन की परत पिता के सीने से
काश! वो दिन आ जाए जल्दी 
मैं इस काश को काश नहीं रहने देना चाहता।

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आलोक कुमार मिश्रा 
जन्म तिथि:– 10 अगस्त 1984 

शिक्षा:- दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए (राजनीति विज्ञान), एम एड, एम फिल (शिक्षाशास्त्र)
संप्रति- दिल्ली के सरकारी विद्यालय में शिक्षक
प्रकाशन–  समसामयिक और शैक्षिक मुद्दों पर लेखन, कविता-कहानी लेखन, कुछ पत्र- पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं जैसे-जनसत्ता, निवाण टाइम्स, शिक्षा विमर्श, कदम, कर्माबक्श, किस्सा कोताह, परिकथा, मगहर, परिंदे, अनौपचारिका, वागर्थ, हंस आदि में।
बोधि प्रकाशन से कविता संग्रह ‘मैं सीखता हूँ बच्चों से जीवन की भाषा’ प्रकाशित। तीन पुस्तकें अलग-अलग विधाओं में प्रकाशनाधीन।
संपर्क:– मकान नंबर 280, ग्राउंड फ्लोर, पॉकेट 9, सेक्टर 21, रोहिणी, दिल्ली 110086 
मोबाइल नंबर– 9818455879
ईमेल- alokkumardu@gmail.com

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