अमरीक सिंह दीप की कविताएं

तकदीर कोई नहीं लिखता

तकदीर कोई नहीं लिखता
न आसमान पर बैठा  ईश्वर
न चित्रगुप्त
न कोई अन्य देवी देवता
सड़क पर झाडू लगाने वालों
सिर पर झल्ली ढोने वालों
खेत में हल चलाने वालों

खदानों में कोयला खूंदने वालों
धमन भट्ठियों में लोहा गलाने वालों
अथक श्रम  से रोटी कमाने वालों

सुनो
तकदीर  सिर्फ  एक  शब्द  है
सम्राटों की चरणवंदना करनेवाले
भाट किस्म के बुद्धिजीवियों द्वारा
गढ़ा  गया  एक दोमुंहा शब्द 
जिसे इन  बुद्धिजीवियों ने
सम्राटों  के शीश पर
स्वर्णमुकट की तरह रखा
और तुम्हारे  माथे पर
गाली की तरह थूक दिया

मुझे एक छुरा दो
मैं  इस  दोमुंहे शब्द की
हत्या  करने  के बाद
अमीरों  के माथे पर लिखे
स्वर्णअक्षरों को भी
खुरच दूंगा  ।

  1. धर्म की अफीम

तुम धर्म के अफीम होने का पीटते रहे डंका
वे धर्म की अफीम बांटते रहे मुक्तहस्त
तुमने धर्म की खेती रोकने का नहीं किया
कोई प्रयास
न धर्म की फसल की बरबाद
न धर्म के बीज किये नष्ट
वे धर्म की खेती करते रहे अनवरत
और तुम बस चिल्लाते रहे –
धर्म अफीम है
धर्म अफीम है
आज इस धर्म की अफीम की पिनक में
डूबे लोगों को
धर्म की कोख से जन्मी तानाशाही
रामराज्य नजर आने लगी है
बुरा न मानना अगर मैं कहूं –
तुम भी लफ्फाज ही हो
और लफ्फाजी से न कभी क्रांति होती है
न ही आता है समाजवाद ।

 

3. बेटियां

बेटियाँ
सपनों की सूई से काढ़ी गई
रेशमी चादरें होती हैं
इन्हें बारीकी से काढ़ते हुए
मां  की उंगलियों के
पोर छिल जाया करते हैं
आंखों की बिनाई कमजोर पड़ जाती है

इन चादरों पर काढ़ती है  मां
बेल- बूटे
फूल -पत्ते
मोर, तितलियाँ, चिड़ियाँ, और
जीवन के सुन्दर सपनों के इन्द्रधनुषी दृश्य
ये चादरें पूरी कढ़ जाने के बाद
सौंप दी जाती है बेगाने हाथों में
शोभा बन जाती पराये घरों की

बिछा दी जाती हैं
किसी अजनबी के बिस्तर पर
पर इन चादरों पर काढ़े गए मोर
नाच कहां पाते हैं ?
चहचहाना भूल जाती हैं चिड़ियां
बेल -बूटे
फूल – पत्ते
मुरझा जाते हैं चार ही दिन में
सुन्दर जीवन के दृश्य
कुरूप यथार्थ में बदल जाते हैं

ये चादरें हर रात मैली होती हैं
बार  – बार धोई और निचोड़ी जाती हैं
और यूं ही एक दिन
चिथड़ा – चिथड़ा हो कर रह जाती  हैं
इनके चिथड़ा -चिथड़ा हो जाने का दर्द
किसी इतिहास की किताब में
दर्ज नहीं मिलता

बेटियाँ
सपनों की सूई से काढ़ी गई
रेशमी चादरें होती हैं
चिथड़ा हो जाने के बाद भी
ये न सिली जाती हैं
न मां – बाप को लौटायी जाती हैं
दाम्पत्य नाम की कब्र पर
चढा़ दी जाती हैं
बेहद खामोशी के साथ।

4. शील जी के पास

शील जी के पास
एक आकाश था
जिसे वे ओढ़ते-बिछाते थे
अपने किदवई नगर वाले दबड़ेनुमा
कमरे में
और निराला जी की तरह
इसे भी बांट देना चाहते थे वंचितों में ।
शील जी के पास
कान में  लगाने वाली एक मशीन थी
भूख का असहनीय क्रदन न सह पाने के कारण

बहरे हो गये उनके कान
लगा लेते थे इसे कानों में
और सुनने को आतुर रहते थे
नये युग की पदचाप ।
शील जी के पास
मटमैले उन्नाबी रंग के फ्रेम में जड़े
मोटे- मोटे शीशों वाला एक चश्मा था
जिसे लगा कर वे देखना चाहते थे
ऋतु – परिवर्तन
आदमी को वे देखना चाहते थे
हरे – भरे वृक्ष के रूप में ।
शील जी के पास
हमेशा एक माचिस बनी रहती थी
सिगरेट की डिबिया भी
वे उसे सुलगा लेते थे
और उसके स्वप्निल धुएं  के बीच
गढ़ते रहते थे कोई न कोई नई कविता
कविता की आंच फेफड़ों में भर कर
कैन्सर की बीमारी के बावजूद
जीते थे भरपूर जीवन ।
शील के पास
” लाल पंखोँ वाली चिड़िया” थी
जिसकी उड़ान में वे शामिल करना चाहते थे
दाम्पत्य के दमघोंटू पिन्जरे में बंद
देश भर की चिड़ियों को।
शील जी देवता नहीं इंसान थे
भूख – प्यास उन्हें भी सताती थी
शील जी के पास एक दोस्त था
जो टिफिन में भरवा करॉ
अपने घर से दो बार लाता था खाना
वह उनकी यात्राओं में इसलिए शामिल रहता था
कि शील जी के पास स्वतन्त्रता सेनानियों वाला
फर्स्ट क्लास का रेलवे पास था
और वह एटेण्डेंट बन उनके के साथ
मुफ्त में यात्राएं करता था
बाद में जब उनकी भूख को
निरन्तर छला जाने लगा
तो यह दोस्त दुश्मनों के पाले में
जा मिला।
शील जी के पास
भाई थे , भतीजे थे
पाली गांव में उनका एक भरापूरा परिवार था
गांव का जमींदार था
जिसके आत्याचारोँ से आहत हो कर
उनके अंदर का किसान
” किसान” नाटक में बदल गया था।
शील जी अपने बड़े भाई को
काला नाग कहा करते थे
इसीसे आप उनकी पारिवारिक जिन्दगी का
लगा सकते है अनुमान ।

शील जी
कोई चीज  नहीं खाते थे
अपने भतीजों के हाथ की बनी हुई
क्योंकि भतीजे हथियाना चाहते थे
शील जी के पास था जो कुछ भी
भतीजों को शील जी की
कविताओं, किताबों और विचारधारा से
कोई लेना देना नहीं था
शील जी के पास एक संगठन था
जिसे वे सौपना चाहते थे
किसी योग्य उत्तराधिकारी को
एक दिन उन्होने मुझसे कहा था
“साथी, इस शहर के जनवादी लेखक संघ में
नई जान फूंकनी है।”
शील जी जब कैन्सरग्रस्त थे
और अनवरत
डाक्टरों व अस्पतालों के बीच
फेंके जा रहे थे शटल काक की तरह
उनका आकाश फट कर
हो गया था तार – तार
“लाल पंखोँ वाली चिड़िया” के पंख
हो गये थे शिथिल
डाक्टरों ने छीन ली थी उनसे
सिगरेट-दियासलाई
उनकी भूख में  बांध दी थी
परहेज की गिरह।
मृत्यु से कुछ दिन पूर्व
वे  कानपुर के जे के कैन्सर हास्पिटल के
एक नीम अंधेरे कमरे में
निढाल लेटे हुए थे
मैंने उनका हाथ अपनी हथेलियों के बीच
ले लिया था
और कहा था,” शील दा ,आपको कुछ नहीं होगा
हम सब आपके साथ है।”
श्रवण-यन्त्र की गैरमौजूदगी के चलते

वे मेरी बात समझ नहीं पाये थे
हताश स्वर में बोले थे –
“साथी ,
अब कविता नहीं आती।”
मैं भयभीत हो उठा था
क्या कविता से अब
जीवन भर के लिए महरूम हो जायेंगे हम
क्या कविता की मृत्यु का कलावादी फतवा
सच साबित हो जायेगा

  (यह कविता मन्नू लाल शील जी पर है)


अमरीक सिंह दीप सुप्रसिद्ध कथाकार हैं और कानपुर में रहते हैं। कहां जाएगा सिद्धार्थ, काला हांडी, चांदनी हूँ मैं, सिर फोड़ती चिड़िया, आजादी की फसल, काली बिल्ली इनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं

1 Response

  1. दयाशकर बर्मन सुबोध says:

    बहुत ही उत्कृष्ट रचनाएँ -खासकर बेटियाँ और शील जी ।
    मेरा बड़ा भाई सांप था
    इन पंक्तियों ने वर्तमान समय की पारिवारिक पृष्ठभूमि पूरी तरह खोल कर रख दी।

    लिटरेचर प्लांट के लिए बहुत बहुत बधाई सर एवं शुभकामनाएँ

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