अरविन्द यादव की कविताएं

  1. उम्मीदें

अनायास दिख ही जातीं हैं
आलीशान महलों को ठेंगा दिखाती
नीले आकाश को लादे
सड़क के किनारे खड़ी बैलगाड़ियां
और उनके पास घूमता नंग-धड़ंग  बचपन
शहर दर शहर

इतना ही नहीं खींच लेता है अपनी ओर
चिन्ताकुल तवा और मुँह बाये पड़ी पतीली की ओर 
हाथ फैलाए चमचे को देखता उदास चूल्हा

आसमां से अनवरत 
आफत बन बरसता जीवन
तथा सामने पत्थर होती
टूटी चारपाई पर बैठीं बूढ़ी आँखें
निष्प्राण होते वह फौलादी हाथ
जिनकी सामर्थ्य के आगे
हो जाती है नतमस्तक
वक्रता और कठोरता की पराकाष्ठा

दूर खिलखिलाता बचपन
देखता उस दौड़ते जीवन को
जो उसके लिए आफत नहीं
खुशी है कागजी नाव की

आकाश में फैलता अन्धकार
कर रहा है स्याह
उन उम्मीदों को 
जिन्हें परोसना है थाली में 
शाम होने पर । 

  1. हाशिए पर खड़ा जीवन

आज इतनी लंबी यात्रा के बाद भी 
दिखाई देते हैं वैसे ही काफिले 
चमचमाती कारें 
उनमें ठुसे हुए वैसे ही अनगिनत चेहरे 
करते हुए वैसी ही बातें 
जैसी सुनी थी बचपन में 
बाबा के मुख से
बाबा भी कहते थे उनके बाबा भी 
बताते थे यही कि
उनके सामने भी चमचमाती कार  में
आते थे ऐसे ही लोग 
गांव के बीच मुखिया की चौपाल पर
देखकर चमक उठती  थी गांव भर की आँखें  
भविष्य के सपनों से 
पसीने की बदबू के बीच महक उठते थे गुलाब 
और गूँज उठती थी चौपाल जयघोष से
परन्तु दुर्भाग्य 
बदल गए चेहरे 
बदल गईं गाडियां 
और गाड़ियों पर लहराते झंडे
पर नही बदले तो वादे
दूर पनघट से आतीं घड़ों की कतारें 
कच्ची सडकें 
अंधेरों से आवृत्त टूटी झोपड़ियां 
और हाशिए  पर खड़ा जीवन..

  1. मजदूर

चिड़ियों की चहचहाट के साथ निकल लेता है हरिओम
बीते सूरज को टिफिन में बन्द कर ,साइकिल के हेन्डिल पर टांग
शहर के उस चौराहे की ओर जो मिला है उसे विरासत में

जहाँ पर न जाने कितने अपरिचित, विलक्षण चेहरे
रहते हैं खड़े अनाम,अदृश्य मूर्तियों के इंतजार में
जिनका आना ही ,उगना है सूर्य का, उन सबके लिए

उनका न आना ,याद दिलाता है उसे
पड़ोसी प्रकाश के घर का धुआँ रहित आँगन
उसकी बिटिया का मुरझाया चेहरा
जिसे सोचकर ही जमने लगता है लहू

सहसा बोलने लगती है चमचमाती कार
गिड़गिड़ाता है उसके सामने
फिर दौड़ता है निर्देशानुसार पीछे नापते हुए जमीन
और पहुँचता है जब तक दुनियाँ के आठवें अजूबे तक
धड़क उठता है इंजन की तरह

गाड़ता हुआ आँखों को जमीन में उतर जाता है अजूबे में 
और करता है मुठभेड़ फावड़ा ,पत्थर और सूर्य से
वातानुकूलित कमरे के बगल में

जब जलने लगता है शहर
तब सूरज की आग को जेब में रख
लौट चलता है घर
ताकि फिर ला सके कल
आज के सूरज को बन्द कर टिफिन में ।

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अरविन्द यादव
जन्मतिथि–  25/06/1981
शिक्षा-  एम.ए. (हिन्दी), नेट , पीएच-डी.
प्रकाशन – समाधान खण्डकाव्य 
पाखी , समहुत, कथाक्रम , सोच विचार, तीसरा पक्ष, ककसाड़, प्राची, दलित साहित्य वार्षिकी, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, निभा, मानस चेतना, अभिव्यक्ति, ग्रेस इंडिया टाइम्स , लाेक तन्त्र का दर्द ,शब्द सरिता आदि  पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
सम्पादक– “व्यंजना” काव्य केन्द्रित पत्रिका
सम्प्रति– असिस्टेंट प्रोफेसर – हिंदी,
जे.एस. विश्वविद्यालय शिकोहाबाद ( फिरोजाबाद), उ. प्र.।
पता- मोहनपुर, लरखौर, जिला – इटावा (उ.प्र.) 
पिन –206103
सम्पर्क सूत्र9410427215
Email- arvindyadav25681@gmail.com

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