आशाराम ‘जागरथ’ की 5 कविताएं

1. ढहता हुआ दुर्ग
 
उन्हें बचाना है
अपना ढहता हुआ
वह सनातन दुर्ग
जिसके प्राचीर में चुनी हैं
शोषित पुरातन हड्डियाँ
नींव में दमित स्वाभिमान
जहाँ भटकती हैं 
वंचित न्याय की मारी
सायं-सायं करती आत्माएं
खूनी पंजों से लिपे-पुते
प्रांगण के बीचोबीच
मंदिरनुमा कैदखाने में
जहाँ कैद है उनका भगवान्
जीर्ण-शीर्ण आयुधशाला के बगल
दबी हैं जहाँ लाखों-लाख
मादा अस्मिताएं
वीणा की झंकार में जहाँ
बांटती हैं उनकी देवी
अपनों को चुन-चुन कर
ज्ञान की कुटिलाताएं
जहाँ धन-वैभव की देवी
कराती हैं
संचयी-भावों की गलाकाट प्रतियोगिता
वहाँ से चले जाते हैं वे
बेहिचक बेधड़क
वर्चस्वता के मद में
सुदूर दूर-दूर तक
सीमाओं से परे
अपनी सीमाओं तक
बचाने को यह दुर्ग
जिसके लिये करते हैं इस्तेमाल
सारे प्रछन्न-प्रत्यक्ष हथियार
नहीं बख्शते किसी की भी जान
जानकर भी
कि असंभव है अब
उनके लिए बचा पाना 
इस दुर्ग को ढह जाने से
मादा अस्मिताओं के कसमसाने से
दमित वेदनाओं के ललकारने से
और बूढ़ी हड्डियों में जान आने से
 
 
2. तुम्हारी खूनी खेती
 
पसर जाता है सारा कथा-भागवत
हमारी व्यथा-कथा पर
करने पर सवाल
तुम्हारे दु:ख की घड़ी में
दु:खती राग पर 
तुम्हारे द्वारा
सायास ओढ़ रखी गयी 
असामाजिक विसंगतियों पर
जान और जान के भेद पर !
बीदुर काढ़े तब तुम
पढ़ाते हो पाठ
सामाजिक सौहार्द का
समताहीन ‘समरस’ समाज का
और जब तुम करते हो
सनातनी वध
इंसानियत का
तब दुहाई देते हो
धर्म और राष्ट्र की
बजबजाती संस्कृति की
मानो बस-
तुम्हारा ही खून खून है
और हमारा खून सिर्फ पानी
सींचने के लिये
तुम्हारी पारम्परिक खूनी खेती
 
 
3. आओ चलो चलते हैं
 
बस मुस्कुराती थी रचना जहाँ भी जाती
निहारती धरती चूमती आसमान
मचल गई थी झाँसे में जब मनचला छायावादी
बहाने से छेड़ा था उसे अकेली पाकर शब्दों के संजाल में
झल्लाकर फिर पिंड छुड़ाकर
जल्दी ही शांत हो गई थी वह
और पलट कर एक बार फिर मुस्कराई थी
तब भी मुस्कराई थी जब सदाबहारी चौराहे का मंचीय कवि
ऐलानियाँ कहा था उसे
आवारा-बदचलन-घमंडी-बिगड़ैल-चालू
और न जाने क्या-क्या
फिर एक दिन पूरी विरासत पर मुस्कुराते
आधुनिक कविता के फैशन से होकर
गुजर ही रही थी एकान्त वन में अनुभव-गाथा कहने
कि कविता होने के भ्रम में
सनातनी आधुनिक कवियों के राष्ट्रवादी हुजूम में
सत्ता के गलियारे में लिंचिंग की शिकार हो गयी
तब से वह ना मुस्कुराती है न मचलती है और न ही झल्लाती है
बस निहारती है लहूलुहान एकटक
बैठी क्षत-विक्षत कविताओं के ढेर पर
कि कोई तो आयेगा एक गँवारू गीत
जो उँगली पकड़ कर उठायेगा
और कहेगा आओ चलो चलते हैं
दूर...देस ... से मुस्कराया जाये।
 
4. स्याही और कलम
 
सूख जाती है स्याही जब बिक जाती है कलम
परन्तु लिखती जाती है खरोंच कर कागज पर
क्योंकि खरीददार को पसंद है गोदागाई-कट्टमकुट्टा
जिसे वह पढ़ भी सकता है
और पढ़ा भी सकता है
और आरामतलब कलम में
उल्टी और दस्त बन जाती है स्याही
फैल जाती है कागज पर
सघन,जटिल और शाष्त्रीय हो जाती है
फिर ज्ञान बघारती है बिकी हुई स्याही
कोरे कागज पर
और कोरा कागज भागता है घबराकर
आरामतलब कलम से
बर्दाश्त करता है खरोंच
स्याही को स्याही होना चाहिये
और कलम को बस कलम
हर कागज कोरा होता है
बस चाहिये उसे अच्छी और साफ लिखावट
और प्यार भी
जो मिटा दे गोदागाई और कलंक स्याह
और मरहम लगाकर सँवार दे खरोंच
बना दे उसे किताब का पन्ना
जिस पर लिखे हों
मुक्ति के गीत।
 
 
5. रेत का स्मारक
 
प्रमाण देने की आवश्यता नहीं
सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है
मेरा जन्मस्थान- पाहीमाफी
वहीं पैदा हुये थे मेरे पुरखे भी
घर वही, गाँव वही
जगह और कोठरियाँ अलग हो सकती है
परन्तु अब नहीं है वह ज़मीन
मेरा और मेरे पुरखों का जन्मस्थान बिला गया है
नदी के कटान में उच्छिन्न हो गया है
बहती है वहाँ घाघरा की मुख्यधारा
बहाकर खेत-खलिहान-सीवान
परन्तु बहा नहीं सकी है वह
लाख कोशिशों के बाद भी
मेरी स्मृतियाँ और जन्मभूमि के प्रति मेरा सरोकार
वे सुरक्षित और संरक्षित हैं मेरे दिलोदिमाग में
तुम कहते हो - स्मृतियों को श्रुतियों में गाऊँ
आस्था का केंद्र बनाऊँ
वहाँ एक भव्य स्मारक बनाऊँ
ठीक उसी जगह जहाँ पैदा हुआ था मैं
और जहाँ बहती है घाघरा की मूल धारा
तो फिर खड़ा कर दो अपनी औलादों को
बीच मझधार में
रोक दो नदी के बहाव को, मोड़ दो धारा
भोली श्रद्धा और संवेदनाओं को आस्था बना दो
नारे लगाकर,तिलक लगाकर
गाड़ दो त्रिशूल घाघरा के सीने में
बैनामा करा दो नदी के पाट को मेरे नाम
मिल जायेगी मुझे रेत की ज़मीन
मैं रेत का स्मारक बनाता रहूँगा वहाँ
तुम बिगाड़ते रहना बार-बार
बारम्बार ।
आशाराम 'जागरथ'
जन्म: 10 जनवरी, 1965; ग्राम पाहीमाफी (पहिया); पोस्ट अमोढ़ा; जनपद बस्ती (उ प्र)
शिक्षा : एम ए (मध्यकालीन इतिहास)
प्रकाशित पुस्तक : कविता कलाविहीन (कवितासंग्रह)
अप्रकाशित :
पाहीमाफी (अवधी ग्रामगाथा-1)
तीत बतिया (अवधी ग्रामगाथा-2)
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और आलेख प्रकाशित। सामाजिक सरोकारों से सतत सम्बद्ध ।
सम्प्रति न्यू इंडिया एश्योरेंस में कार्यरत
सम्पर्क :
जे बी पुरम, मोदहा दक्षिणी,
फैज़ाबाद जिला -अयोध्या (उ प्र)
मोब : 9415717094

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