डॉ सांत्वना श्रीकांत की प्रेम कविताएं

  1. मुझमें हो तुमजब लौट जाते हो
    तो आखिर में थोड़ा
    बच जाते हो तुम मुझमें।
    मेरी आंखों की चमक
    और नरम हथेलियों के
    गुलाबीपन में
    या निहारती हुई
    अपनी आंखों में
    छोड़ जाते हो मुझमें
    बहुत कुछ-
    जो एकटक तकती रहती हैं
    मेरे होठों के नीचे के तिल को।
    कभी श्यामल, कभी श्वेत,
    तो कभी लाल रंग तुम्हारा,
    रह-रह कर रंग देता है
    मेरी रूह को।
    आंखें मूंद कर भी
    तुम्हारी छुअन ही टटोलती है
    मेरे अंतस को,
    जाते-जाते आखिर में तुम
    थोड़ा बच जाते हो मुझमें।
  1. ये सिर्फ तुम हो

मैं तुम्हें शब्दों में
नहीं समेट सकती,
एक आकार ले चुके हो तुम
उस ब्रह्म का-
जिसे मैं हमेशा से पाना चाहती हूं,
समझा नहीं पाती तुम्हें
कि-
अपने स्वप्न को छोड़ कर
यथार्थ जीने का द्वंद्व
सच में कितना भयावह है।
नकार भी देती हूं
सामाजिकता और सांसारिकता,
आस्तिक से नास्तिक की ओर
करवट लेती हूं,
फिर भी-
तुम्हारा आकार नहीं ले पाती।
वृहद या सूक्ष्म होकर तुम
सागर बनते हो तो कभी सूर्य,
कभी बुद्ध तो कभी शिव।
और हां,
कभी-कभी तो
हवा बन चलते हो साथ और
सहला देते हो मेरे गाल,
ये सिर्फ तुम हो।
तब अनायास ही मैं
अंकुरित हो जाती हूं
तुम में वृक्ष बन जाती हूं,
मेरी जड़ें छितरी हैं
तुम्हारी धमनियों तक।
तुम्हारा होना ही प्रेम की
निष्कलंक परिभाषा है,
जिसे गढ़ा है तुमने
और जिसे जीती हूं
मैं खुद में हर पल।

  1. मौन से संवाद

मेरे मौन से की गई
तुम्हारी बातों का स्वाद
जुबां से उतरता नहीं,
मुझ बंजर पर उगे हो
तुम दूब जैसे।
नौनिहाल मेरा प्रेम
प्रेषित होगा तुम तक
दसों दिशाओं से।
और आंखें मूंद
तुम छूना मुझे।
अंतस से-
अपना स्पर्श
रख देना तुम
मेरी हथेलियों पर,
जिसकी गरमाहट
समय पर पड़ी बर्फ को
पिघलाती रहे।