डॉ शंभुनाथ की कविताएं

भूख पर 2 कविताएं

  1. भूख में सपने बहुत आते हैं

भूख का नामोनिशान नहीं होता
विज्ञापनों के संसार में
मॉल में भी वह चर्चा के बाहर है
कंपनियों के व्यापार कोश में नहीं है यह शब्द
बाहर है कैफे से संसद से
शिखर वार्ताओं से भी पूरी तरह बाहर
भूख फैल रही है शहर-शहर
भूख में फैल रहा है भय का आकाश
भटकाती है भूख प्रेतात्मा- सी
इस दुस्समय में
भूख का न है कोई रंग न कोई स्वाद
भूख का नहीं है अपना कोई देश
वह कहीं भी हो सकती है
कहीं शर्म और कहीं साहस की पोशाक में
मुश्किल है
भूख में सपने बहुत आते हैं!

भूख में
लोग बताए जाने लगते हैं बलशाली
निकलती हड्डियों के बीच भी
क्योंकि ये होती हैं दधीचि की हड्डियां
जिनसे बनती हैं टैंक-भेदक मिसाइलें
आसमान में गड़गड़ाते हैं युद्धक विमान
फौजें चढ़ती हैं सरहदों पर
कभी सभ्यता के नाम पर
कभी लोकतंत्र के लिए
कभी अपनी जनता को रखकर बंधनों में
कहती हैं अपने को जनमुक्ति की फौजें
देशों के भद्र नागरिक शांत हो जाते हैं
जब टीवी से लगातार घोषणा होती है-
सरहद पर युद्ध है
युद्ध बढ़ा देता है भूख
भूख में सपने बहुत आते हैं !

2.

भूख में
सपने बहुत आते हैं
भूख का होता है अपना आसमान
जिसमें आज चांद है बड़ा उदास
वह आरे आता है पारे आता है
नदिया किनारे आता है
लेकिन नहीं ला पाता
बेरोजगार हो चुके पिता के घर
बच्चे के लिए दूध-भात
चांद है अब एक खाली कटोरिया
उसकी चांदी से बन गई है
मंदिर की ईंटें
भूख में अच्छा  लगता है
बनता भव्य मंदिर
मूर्तियों पर गर्व होता है
जब वो होती हैं ऊंची से भी अधिक ऊंची
मन खुश हो जाता है
जब तर्की में 1500 साल से शोभित
सोफ़िया का चर्च फिर मस्जिद बन जाता है
कुपोषित बच्चों के लिए
बाइबिल से निकलती हैं सूखी प्रार्थनाएं
अब ईश्वर नहीं आएंगे राम बनकर
अब ईश्वर नहीं आएंगे कृष्ण बनकर
नहीं भेजे जाएंगे अब पैगंबर
ईश्वर रोटी के अवतार में होंगे इस बार।

  1. सकुशल हूं

कोई पूछता है – कैसे हो?
मकानों और शहरों के पार बहुत दूर से
यही कहता हूं-अच्छा हूं सकुशल हूं

जंगल के पार देखना चाहता हूं
सड़क पर है कितनी आवाजाही कितना सन्नाटा
बादलों के खांसने पर छिप गईं हैं चिड़ियां
तारे भी कर रहे हैं लुकाछिपी
अभी-अभी लगाई है पुलिस दल ने गश्त
हवा धीमी है दहशत में
पेड़ पर लटकते हैं आम बिना दूरियों के फिर भी
दो बच्चे देख रहे एकटक थामे हाथ में लग्घी
तभी कोई पूछता है-कैसे हो?
खिड़की से झांकते हुए निकट पड़ोस से
यही कहता हूं-अच्छा हूं सकुशल हूं

मंदिर में होते मंत्रोच्चार, होती आरती, बजते घंट
सामने पड़ी रहती है प्रसाद और रोड़ी की थाल
होते रहते अज़ान, गुरु ग्रंथ साहिब के पाठ
प्रार्थनाएं होतीं चर्च की खाली कुर्सियों के सामने
ईश्वर तो ट्रक पर लदा जा रहा होता अपने गांव
ट्रेनों में बैठा गुमसुम सा जा रहा होता अपने शहर
कभी वह चूल्हे के करीब खोजता चाय पत्तियां
कभी भूआ सा उड़कर चला आता सामने
तभी हठात बज उठता मोबाइल
कोई पूछ बैठता-कैसे हो?
यही कहता हूं-अच्छा हूं, सकुशल हूं।

मृत्यु जब इस तरह मंडराती है आसपास
कम बोला जाने लगता है झूठ
कम हो जाता है शोर टीवी पर
बिक्री घट जाती है घृणा की
होड़ बदल जाती है करुणा में
इतिहास तब होता है एक जेल की तरह
टूटने लगते हैं जेल के कपाट
क्या दिखता है अंधेरे में कोई सूराख
जब ज़िन्दगी बन चुकी है सबसे बड़ी जंग?
अब रंग कम होने लगे हैं इंद्रधनुष में
आशा होती जा रही है फटा ढोल
जब आंकड़ों में होती है
जीरो की सिर्फ लंबी कतार
मृत्यु से बड़ी हो जाती है एक अदृश्य आहट
हरेक का पीछा करती है एक दहशत
हरेक के पास बची होती हैं सिर्फ दूरियां
सभ्यता की सबसे बड़ी महामारी होती हैं दूरियां
कोई पूछता है-कैसे हो?
मुस्कुराट के गीले अक्षरों के साथ
यही कहता हूं-अच्छा हूं, सकुशल हूं।

  1. सभ्यता

नदियों ने कहा : अपना प्रवाह दो
वे घाट पर बैठ गए
फूलों ने कहा : दो अपनी कोमलता
वे बंदूकों से गरज उठे
हवाओं ने कहा : गंध दे दो
उन्होंने डियो का इस्तेमाल किया
ईश्वर ने कहा : अपना दिमाग दो
वे धर्मस्थल खड़े करने लगे।
राजाओं ने कहा : जयजयकार करो
उन्होंने विचारों को अलविदा कहा
इस तरह मनुष्य सभ्य हुआ।

  1. कवि

कवि गोताखोर है
भय में डूबकर
ले आता है साहस
सच को
मुक्त करता झूठ से!

  1. पाठक

पाठक तैराक है
बहता नहीं
तैरता है शब्द-शब्द
मृत्यु से
छीन लेता जीवन!

—–

डॉ शंभुनाथ
वरिष्ठ आलोचक, पूर्व प्रोफेसर, हिन्दी विभाग कोलकाता
निदेशक, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता
संपादक : ‘वागर्थ’

1 Response

  1. Anonymous says:

    भूख, बाजार , सपनों और इंसान के रिश्तों पर जरूरी कविताएं…

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