गुंजन श्रीवास्तव की कविताएं

  1. ऊँचे होने का नाटक

आदमी पैसों को गिनता हुआ
नहीं देखता

कि इससे पहले ये
क्षत्रीय के हाथों में थी
या किसी शूद्र के!

न ही वो
पूछता है
एक वेश्या से
उसे भोगने से पहले उसकी जात!

आदमी ऊँचे होने का नाटक करता है
सभी के बीच

तन्हाई में वो जानता है
अपनी असली औकात!

  1. ज़िंदगी के गणित का राक्षस

गणित में बहुत बुरा रहा हूँ
त्रिकोणमिति का राक्षस मुझे डराता है
आज भी अपनी भुजाओं से!!
 
यहाँ तक कि मैं इनकी संख्याओं को भी
अक्षरों में लिखता हूँ 
एक, दो, तीन की माफ़िक़
 
मुझे डर है कहीं ज्यामिति का कोई  खम्बा
किसी रात मुझपे गिर न पड़े
 
डरता हूँ मैं कि कहीं कोई क़ातिल मेरी जिंदगी से
जोड़ घटाव का खेल न खेलने लग जाए!
 
बरसों से चिंतित हूँ कहीं ये दुःख मुझे 
अपने गुना का अंक न मान लें!
 
 मैं इतना भी नहीं बता सकता कि
 कितना गिर सकता है कोई इंसान
 
कितना अवसरवादी हो सकता है वो
अपनी एक जिंदगी में
कितना झुका सकता है अपनी रीढ़ की हड्डी को
या कितनी अंदर तक धंस सकती है
हैवानियत के दलदल में उसकी इंसानियत!
 
पर मैं यह जानता हूँ कि
 कोई आंकड़ा चाहे जितना बड़ा क्यों न हो
 सौ फीसदी से बाहर नहीं हो सकता!
 
और मुझे ये फिक्र सताती है मेरे दोस्त
कि जब तुम्हारे तरक्की के सारे द्वार नीचता की
एक सीमा से टकरा कर बंद हो जाएंगे
फिर तुम अपनी तरक्की के लिए
 नया क्या करोगे ?

  1. उस सुबह देखा मैंने

इस दुनिया को बदलते
पृथ्वी के वृताकार को सिमटते
सूरज को बिंदी और
चाँद को एक मुखड़ा बनते

देखा जुल्फों को उस मुखड़े की तरफ
ज्वार सा उठते

और उसके दुपट्टे से चढ़ते उतरते
तमाम ऋतुओ को!

उगते देखा इस पृथ्वी के
दो हाथ-पैर
और दो कजरारी आँखों को!

उस रोज मैंने ग़ौर किया
पृथ्वी निरंतर घूमती ही नहीं
ये कहीं कभी किसी सीढ़ियों पर बैठकर
चाय भी पीती है
उस लड़की की तरह!

  1. चुप्पी भाषा की बेइज़्ज़ती है दोस्त

अन्याय देखकर भी
तुम्हारा चुप रह जाना
केवल तुम्हारी अभिव्यक्ति ही नहीं
भाषा की बेइज़्ज़ती भी है दोस्त!

उस भाषा की बेइज्जती
जिसकी मदद से तुम कहा करते हो
अपने प्यारे मुल्क को महान

और गुमान से जिसकी मदद से
गाते हो तुम
अपने प्रिय मुल्क का राष्ट्रगान!

तुम्हारी चुप्पी देशभक्ति नहीं
मुल्क के दलालों की
शक्ति है
जिसकी खामोशी
तुम्हें शोषित
और राजा को
शोषक बनाये रखती है!

  1. एक तुम

गणित की अनंत तक
फैली भुजाओं
अंकों पर शून्यों की बेशुमार सजावट
उनके अनगिनत विकल्प
और संख्याओं के
बीच तुम
बताती हो मुझे :

‘एक’ का महत्व,
मेरी इस तन्हाई में!

—-

गुंजन श्रीवास्तव

जन्मतिथि-24 मार्च 1995
जन्म स्थान- ग्राम तेघरा,जिला बेगूसराय(बिहार)
स्नातक- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

MA-राजनीति विज्ञान
मेल- Vidhan2403@gmail.com

बहुमत,समकालीन जनमत,नव किरण,नया साहित्य निबंध, पहली बार,कारवां,हिंदीनामा,पोषम पा,हस्ताक्षर समेत कई ब्लॉगों पर कविताएं प्रकाशित

4 Responses

  1. दिनेश अत्रि says:

    गुंजन की कविताओं की गूँज सुनाई देने लगी है। वे कोई एक बात बताते हैं कि यह उन्हें नहीं आती। फिर वे बताते हैं कि क्यों नहीं आती। इसी बीच कविता रच जाती है। अंकगणित और ज्यामिति के उपरांत मैं इंतज़ार कर रहा हूँ कि उन्हें बीजगणित भी नहीं आती।

  2. Keshav Sharan says:

    अच्छी कविताएं। कवि और लिटरेचर प्वाइंट को बधाई !

  3. बरुण प्रभात says:

    गुँजन की कविताएं जीवन के यथार्थ को हूबहू उतार कर रख देती है,, जहाँ आप खूद को देख सकते है, परख सकते है। समय से संवाद करती कविताएं सहमी नही होती ना डरी होती है,, गुँजन इसमें खरे उतरते है। शुभकामनाएं छोटे भाई को। कलम और धारदार हों।

  4. Gunjan says:

    हार्दिक आभार आपका😊🙏

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