ज्योति रीता की कविताएं

गरीब औरत

गरीबी में लिपटी औरतों की तकलीफें
तब दुगुनी हो जाती है,
जब सुबह कुदाल लेकर निकला पति
शाम ढले हड़िया(देशी शराब) पीकर लौटता है,
बच्चे माँ को घूरते हैं
बापू आलू-चावल क्यूँ नहीं लाया?
माँ बदहवास -सी घूरती है
खौलते अदहन
और शराबी पति को…

होठों पर सूखी पपड़ी को
जीभ से चाटती
हर माह
बचाती है पगार से सौ रूपये के नोट
और छुपाती है
मायके से मिले
टिन के बक्से में ,
नहीं खाती दाल
नहीं पीती दूध
ना ही नहाती है गमकौवा साबुन से
हर दूसरे दिन
गिनती है पैसे
और लगाती है हिसाब
ठिठुरते बच्चे के लिये
कंबल लेनी है इस बार…

शुभदीपोत्सव

रोशन घरों के पीछे
होती है
अंधेरों में डूबी झोपड़पट्टियाँ
तंग गली में
नंग-धड़ंग बच्चे
माई-बापू के इंतजार में
मनाते हैं दिवाली
फूटते पटाखों के बीच
धुंए-सी जिन्दगी
ना दीया
ना तेल
ना पकवान
ना पटाखे
इस दिन
वे जलाते हैं जी
वे रोटी में नमक रगड़कर
खाते हैं पकवान
और फोड़ते हैं
अपनी किस्मत…

पहाड़ हो तुम

इन दिनों
पहाड़ सा उग आए हो तुम
मैं ग्लेशियर से पिघल रही हूँ
जब भी सुकून तलाश हुई
तुम तक जाती हूँ
तुम्हारे कठोर वक्ष पर सर रख देती
पतंगा बन उड़ती
पनाह में तेरे
पराकाष्ठा भर डूबती
श्वास में भरती
श्रद्धालु सा नतमस्तक होती

तुम्हारे दो पाटों के बीच
प्रवाहित प्रपात हूँ मैं

इन दिनों
पहाड़ हो तुम
और ग्लेशियर हूँ मैं।।

ज्योति रीता

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