मीरा मेघमाला की कविताएँ

  1. कैसे मर जायें झट से!

ऐसे में गर मरने को कहा जाए
तो कैसे मर जायें झट से!

अंतिम दर्शन के लिए
आये लोग हंसेंगे,
झाड़ू-पोछा नहीं लगाया है
बर्तन, कपड़े नहीं धोये हैं
साफ़ नहीं कर पाई घर का शौचालय
पेड़ पौधों को भी पानी नहीं दिया है
कुत्ता और बिल्ली भूखे बैठे हैं
कल के नाश्ते के लिए
अब तक नहीं सोचा है।
तो कैसे मर जायें झट से!

बेटे और पति को
घर में आते ही
घर की मालकिन को
ढूंढने की आदत पहले भी नहीं थी।
घुस जायेंगे रसोई में
खाना अब तक बना नहीं।
भूखे आदमियों का गुस्सा
आप ने देखा नहीं!
तो कैसे मर जायें झट से!

बेटी की प्रसूति नहीं हुई है
पाल-पोस कर बड़ा नहीं किया है
नाती-पोतों को।
बेटे की परीक्षा अभी नहीं हुई है
पति की रूटीन चेकअप की तारीख
अभी दूर ही है।
तो कैसे मर जायें झट से!

एक गृहिणी की आवश्यकता
अब तक खत्म नहीं हुई है
काम वाली का मिलना भी
आजकल मुश्किल सा ही है।
यह भी मैं जानती तक नहीं
कि बूढ़े पति
दोबारा शादी करेंगे या नहीं।
और
ऐसे में गर मरने को कहा जाए
तो कैसे मर जायें झट से!

  1. तड़प

शिकार होने वाली बेचारी को
इससे पहले कहाँ पता था कि
जिसे वो इन्सान समझती थी
वह एक जानवर है!

उस वक्त वो
सूखे पत्तों के ढेर में छिप कर
सूखा पत्ता बन बैठा था।
घास के पीछे बैठ कर
हरियाली सा दिख रहा था।
धीरे से सरकते सरकते हवा में
एक अजीब सी आवाज़ बन गया था।

और|
अचानक बिजली बन कर
उसने एक ही छलांग लगाई
शिकार का आधा शरीर खाते ही
उसकी भूख भी मिट गयी!

नोच-नोचकर, काट-फाड़कर
खाने वाले बेदर्द जानवर में
जान लेने की दया भी अगर होती
तो कितना अच्छा होता!

  1. तकिया

मैं बार बार सिर्फ तकिए का
कवर बदल लेती हूँ
बाक़ी सारे आँसू
तकिया छुपा लेता है।

सारे बच्चे अपनी
माँओं के सीने में
चिपक कर सो गये
मैंने तकिये में
मुंह छुपा लिया।

जब तक जागे थे तब तक
एक तकिये के लिए
लडते-झगड़ते रहे वह दो बच्चे
अब सो गये हैं
तकिये के बिना!

यह तकिया भी
न जाने कितने रहस्य
छुपा लेता है अपने आप में 
पहले वह लड़की 
तकिए में प्रेम पत्र छुपाती थी
अब अलमारियों की चाबियाँ।

हल्के से चाँपने से भी
सिकुड़कर मुरझने वाले
हम-तुम जैसा नहीं है यह तकिया 
विरहन के हाथों मलने पर भी
सीना फूला कर
खिल उठता है यह बहरूपिया।

यूँ आँखें बंद करके
इतनी कोमलता पर
कभी यकीन न करना
एक वक्त ऐसा भी आएगा
इतना नरम-नाजुक तकिया भी
उतना कठोर बन सकेगा
कि दम घोंट कर जान ले लेगा!

  1. सुगंध की गलियाँ

सांझ के समय
उन सुगंध के गलियारों में से
होकर गुज़रती हूँ तो
एक कविता आँखों में चिपकती है।

पेट पर लात मारते हुए
सूखा थन चूसता दुधमुँहा बच्चा
खिलौने की ज़िद करता
पीट पर लटक कर रोता हुआ पोता
ऊंची शिक्षा की उम्मीद लेकर
छाती पर बैठी कालेज जानेवाली बेटी
बाइक की मांग करके
सर चढ़कर नाचता उतावला बेटा
बेवक्त हवस बाहों में निचोड़ता पति
नोच-नोचकर खाने वाली बीमारियाँ
क्षुधा बाधा से चीखता छेद तल का उदर
चिंताओं से घिरी इंद्रियाँ
अकाल जैसे सूखी आँखें

और
तेज़ी से चमेली की कलियों को
धागे में गूंथने वाली चतुर उंगलियां
घर-घर के आंगन में…

और इस तरह
सांझ के समय
उस सुगंध के गलियारों में से
होकर गुजरते वक़्त
एक कविता आँखों से उतर कर
दिल में चुभ जाती है
और आँखें नम हो जाती हैं।

  1. एक शव संस्कार

वो बृहत कंपनियों का मालिक था
हवाई जहाज़ों में घूमता-फिरता था
स्टार होटलों में खाता था
राजमहलों जैसे बंगलों में रहता था
इतना बड़ा आदमी
एक दिन अकस्मात  
खेल रही एक छोटी सी बिल्ली से
टकरा कर गिरा और मर गया।

मेज़ पर
छोटे से कांच के बर्तन में
दो सुंदर मछलियां
अपनी खूबसूरत पूंछ को
हिलाते-झुलाते खेल रही हैं।
होठों पर सिगरेट चिपका कर
वो जब भी उन्हें देखता था
उसे यही लगता था कि
वो उसका मनोरंजन कर रहीं हैं।
मछलियां तो अब भी पूंछ हिला रही हैं
ऐसा लग रहा है कि
मालिक की मृत्यु की हंसी उड़ा रही हैं!

पति के जनाज़े के पास
सफेद कपड़ो में मौन-म्लान 
बैठे हैं पत्नी और बच्चे।
उनको देखते ही काम वाली बाई
यादों में खो गयी।
अपने पति के मृत्यु में
वो जोर जोर से चीखी थी,
चिल्ला चिल्ला कर रोयी थी,
बार बार बेहोश गिर पड़ी थी
वह सब कुछ याद करके
एकाएक शर्माने लगी।

शव पर सज रहे
गुलाब, सेवती, चंपक, चमेली
इन फूलों का अहंकार तो देखिए
शहर के बड़े आदमी कू
मृत्यु के लिए 
रत्तीभर दुःख प्रकट करने के बजाए
खिलकर हंस रहे हैं!

शव संस्कार की शाम,
चंदन की लकड़ियों पर रखे शव को
आग की शिखाएँ चाटने लगीं।
मृत्यु की सुगंध लेपित कहानियाँ
तूफ़ान की तरह शहर में घुसने लगीं।

  1. रोशनी

जब मुझे पता चला कि
तुम मुझ में
रोशनी बन कर बह रहे हो
मैं एक खिड़की बनी।

समय सरकते सरकते
अपने छोटेपन का
एहसास होने लगा था मुझे
और शर्म से मुरझाई मैं 
सलाखों को उतार कर
शीशा बन गयी।

अब तुम
कड़ी बिजली बनकर
तोड़ देना मुझे।
तुम्हारी रोशनी को
अँकवारने की खातिर 
सीना खोलकर लेटा हुआ
एक मैदान बनना चाहती हूँ मैं।

  1. संगमरमर की कब्र

मेरे पापा दिन भर
घर के सामने सिमिट्री में
कब्रों के इर्द-गिर्द
समय बिताते रहते थे।
और एक दिन वहीं उनकी कब्र बनीं।
मेरी जानकारी के अनुसार
पापा के सीने में
एक शानदार राजमहल था
उसके सिंहासन पर
मैं थी इकलौती राजकुमारी।

घर की छत पर खड़ी होती हूँ तो
दिखने लगती है
सफ़ेद संगमरमर से बनी
पापा की सुन्दर कब्र।
और उस पर लिटाकर रखी गई
पापा की एक तस्वीर
पापा हंस रहे हैं
क्या वह यही कह रहे हैं
कि मैं अंदर कहाँ हूं?

भाई ने बनवाई पापा की
सफेद संगमरमर की सुन्दर कब्र पर
मेरी कविता की दो पंक्तियाँ!
‘बच्चों ने पिता की कब्र बनवाने में
ना जाने कितनी मेहनत की।’
गाँव वालों की तारीफ के पुल!
कितना अच्छा होता
कि गाँव वाले यह पूछते,
‘कितनी मेहनत की बच्चों ने
अपने पिता को
मरने से बचाने में!’

मरने से ठीक एक दिन पहले
पापा ने कहा था कि
‘मुझे अपने पास ले चलो!’
अब यही बात हर दिन
मैं पापा से कहती हूँ
पापा इनकार कर देते हैं
मेरे पापा मेरी ही तरह बहुत जिद्दी हैं।

पापा की कब्र के पास जाते वक्त भी
फूल चढ़ा कर
घुटनों पर बैठकर
पापा का ध्यान करते वक्त भी
और सिमिट्री से
वापस घर लौटते वक्त भी
यही लगता है कि
पापा ही मेरी उंगली पकड़ कर
चल रहें हैं मेरे साथ साथ!

———

मीरा मेघमाला

मीरा मेघमाला कन्नड़, कोंकणी और हिन्दी में  लिखती हैं। कर्नाटक के कन्नड़ साहित्य क्षेत्र में कादम्बिनी रावी नाम से 2014 से लिखना शुरू किया था। “हलगे मत्तु मेदुबेरळु” नाम का  कविता संकलन 2017 में गीतांजलि पब्लिकेशन, कर्नाटक ने पब्लिश किया। 2018 में बैंगलोर के सुन्दर प्रकाशन ने “काव्य कुसुम” कविता संकलन पब्लिश किया। 2019 में मेघमाला प्रकाशन से “कल्लेदेय मेले कूत हक्कि” कविता संकलन पब्लिश हुआ। 

इतिहास में मैसूर यूनिवर्सिटी से एम ए की पढ़ाई की है। कन्नड़ और कोंकणी की कई सारी पत्रिकाएं और वेब पोर्टल्स में कविताएँ, कहानियाँ, और लेख लिखा है। अब हिन्दी में भी कविता लिख रही हैं। फिलहाल, कर्नाटक में महिला और बाल विकास  डिपार्टमेंट के एक रेस्क्यू सेंटर में काम करती हैं।

 

1 Response

  1. बहुत सुंदर कवितायें “तकिया ना जाने कितने राझ छुपा बैठा है.. आप से और बहुत सारी कविताओ कि कामना..

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