निदा रहमान की कविताएं

एक

ना चाहते हुए
रोज़ उग आती हैं
तुम्हारे इश्क़ की ख़्वाहिशें
रोज़ाना सुबह दफना देती हूँ
हर वो हसरत
जो मुझे तुम्हारे लिए बेचैन करती है..
रात नागिन सी हो जाती है
जो डसती, तड़पाती है
तुम्हारे लिए बगावती बनाती है…

शामों में छाई उदासी
बंजर ज़मीन सी नज़र आती है
जहां दूर-दूर तक तुमको खो देने का अंधेरा है…
रूखापन ख़ुद के मिज़ाज में भी आ जाता है
अजीब सी बेचैनी होती है
और मैं खुले आसमान के नीचे घूमती रहती हूँ घंटों
तलाशती रहती हूँ तुम्हारे एहसास की नरमी को
वो नरमी जो चौदहवीं के चाँद में भी तपिश ला दे…
तमाम कोशिशों के बावजूद
मुझे घोंट देना है गला हर उस उम्मीद का
जो मुझे तुम तक ले जाती है…

सालों से यही सिलसिला जारी है
मैं हर रात तुम्हारे इश्क़ में जन्म लेती हूँ
और सुबहा होते ही कर देती हूं ख़ुद को ज़मींदोज़..

दो

ये ख़्वाब नहीं
बस ख़्वाहिश है
कि तुमको महसूस करूँ
छू लूँ तुम्हें ऐसे
कि तुम्हें ख़बर ही ना हो,
बहुत पाकीज़ा सी मोहब्बत
जिसमें शर्मिंदगी नहीं
बस चाहती हूं इतना
कि तुम्हारी छुअन रहे

मेरे साथ उम्रभर,
मेरे गेसुओं में तुम्हारी उँगलियाँ
तुम्हारे सीने पे मेरा सर
ख़ामोश लब हों
लेकिन धड़कनें बयां कर रही हों हाले दिल,
तुम्हारी मुस्कराहट जो मुझे देख के आती है
मेरी खिलखिलाहट जो तुम्हारी आवाज़ से चहक जाती है
सब देखना चाहती हूं अपनी आंखों से
सुना है खुली आंखों से देखे गए ख़्वाब हक़ीक़त बन जाते हैं…
 

तीन

हाँ, हम जैसी
औरतें होती हैं बेबाक़
बेख़ौफ़,और बेदिल भी,

हाँ हम जैसी
औरतें डरती नहीं हैं
खामोश नहीं रहती
बोलती हैं हक़ की बात,

हाँ हम जैसी
औरतें शर्माती नहीं हैं
आँख से आँख मिलाके
बात करती हैं
सर उठाके जीती हैं
चीखती हैं,चिल्लाती हैं
बदतमीज़ कहलाती हैं,

हाँ हम जैसी
औरतें अपने लिए
कविताएं लिखती हैं
ज़ोर से हंसती हैं
दरवाज़े पे खड़ी होती है
लड़कों से बातें करती हैं
अपने जिस्म को सिर्फ
गोश्त का टुकड़ा नहीं
समझने देतीं,

हाँ हम जैसी औरतें
घरों से निकलती हैं
दफ्तरों में काम करती हैं
सड़कों पर घूमती हैं
क्या पहनना है
ख़ुद तय करती हैं
हाँ हम जैसी
औरतें तुमसे चरित्र का
प्रमाणपत्र नहीं चाहती।

चार

उसके कमरे में
हर चीज़ बेहद करीने से सजी थी
दीवारों पर खूबसूरत वॉल पेपर थे
जिन पर अचानक ही ठहर गई थी नज़र,
मैंने उसके कमरे को उसकी ही नज़र से देखा
मोहब्बत और अपनेपन से सराबोर इक इक कोना,
एक एंटीक मेज़, सौ साल से भी पुराना संदूक
सबको ऐसे संजो रखा था जैसे वो साँस ले रहे हों,
वो कहता ये कमरा नहीं दुनिया है मेरी
यहां सूरज भी मेरी मर्ज़ी से झाँक पाता है
उसे रौशनी से उलझन होती थी
लेकिन उसकी आंखों की चमक किसी को भी चौँधियां दे
कोई झाँक नहीं सकता था उसके अंदर
कि उसका वजूद आफताब सा था,
उसे ख़ामोशी रास आती थी
लेकिन जब भी उदास होता
फुल वॉल्यूम में सुनता म्यूज़िक,
उसे ज़माने की परवाह नहीं थी
फिर भी परवाह करने लगा था मेरी
और मैं उसे दिल के किसी कोने में छुपाए बैठी थी,
सच ये है कि
बेहद करीने से रहने वाले लोग
असल में होते हैं बेतरतीब
वो जीते हैं अपनी बनाई दुनिया में
जहां इश्क़ भी उनकी मर्ज़ी से आता है….

पांच

ख़्वाहिश की
कोई लंबी लिस्ट नहीं
हर ख़्वाहिश की डोर
इश्क से होते हुए
तुम तक पहुंचती है,
इस लिस्ट में तुम्हें हासिल करना
तो कतई नहीं
ना तुम्हारे साथ जिंदगी
बिताने का कोई ख़्वाब,
ख़्वाहिशमंद हूं इक शाम की
जिसमें हों बस हम तुम
कॉफी और हल्की आवाज़ में
चलती हुई गज़ल,

आख़िरी ख़्वाहिश
ये कि मेरी कब्र पर
मेरा नाम ना हो
ना पैदाइश की तारीख
ना मौत का वक़्त
बस लिखा हो
इश्क़ इश्क़ और इश्क़,

हाँ चाहो तो और
जब तक दिल करे
वहाँ रखते रहना
सुर्ख़ लाल गुलाब

ये वही लाल गुलाब हैं
जो तुम्हारे इंतज़ार में
मैंने ख़ुद से ख़ुद को दिए थे….

छह

जितनी भी
नज़्में हैं
वो सिर्फ़ लफ़्ज़ नहीं
ना ही महज़ नज़्में
वो लम्हें हैं तुम्हारे मेरे,
उनमें दर्ज है
एक एक किस्सा
हमारी बातें
हमारा दर्द
हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा…
अच्छा सुनो
ये नज़्में मेरी जमा पूंजी हैं
जिनका वारिस तुम्हें बनाया है
मेरे हर लफ़्ज़ की वसीयत तुम्हारे नाम है,
मेरे इस बेनाम ज़िन्दगी के तुम हिस्सेदार हो
लफ्ज़ भले मेरे हैं लेकिन
ये तुम्हारी अमानत हैं

जिन्हें तुम्हें सौंपकर मुक्त हो जाऊंगी
हर बंधन से
मेरे पास ना तुम होगे
ना ही शब्दों में क़ैद किया हुआ वक़्त,
मैं इत्मिनान में रहूंगी
जानती हूँ तुम संजो के रखोगे
मेरी इक इक नज़्म
हर इक ख़त
हर लफ्ज़…
तुम्हारी सबसे पसंदीदा दराज़ के
इक कोने में दबे होंगे वो सारे कागज़
जिन्हें तुम चाहो तो दुनिया के सामने लाओ
या फिर दफ्न ही रहने दो
तुम्हारे मेरे बीच,
मैंने तुमसे जो पाया
वही लौटा दिया
इस जहाँ से जाने पर
कोई कर्ज़ नहीं होगा
मुझ पर…

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निदा रहमान
छतरपुर मध्यप्रदेश
एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.
वर्जनाओं से बाहर साझा कविता संग्रह