निर्मल गुप्त की कविताएं

  1. मेज पर रखा सफेद हाथी

लिखने की मेज़ पर सिरेमिक का सफ़ेद हाथी है
उसके हौदे पर उगा है
हरेभरे पत्तों वाला मनी प्लांट
वह तिरछी आँखों से देख रहा
मेरी उँगलियों से उगते कविता के कुकरमत्ते
जल्द ही यहाँ उदासी की फ़सल पनपेगी.

गुलाबी फ्रॉक पहने एक लड़की टहलती चली आती है
रोज़ाना मेरी  बोसीदा स्मृति  के आसपास
मैं उसका नाम लिए  बिना
पूरी शिद्दत से उसे पुकारता  हूँ
वह देखते ही देखते तब्दील हो जाती है
किताब के पन्नों के बीच  रखे बुकमार्क में.

मेरे इर्दगिर्द न जाने क्या-क्या है
प्यार की दीगर स्मृति जैसा कुछ
कभी किसी उदास उचाट दिन
कागज पर खींची  बेतरतीब लकीरों का ज़खीरा
ख़ुद को याद दिलाते रहने  के लिए
कूटभाषा में यहाँ वहां दर्ज़ चंद हिदायतें.

कोई समझा रहा
मेज पर हाथी पर सवार मनी प्लांट नहीं
लकी बैम्बू सजा या
जेड प्लांट या शमी का पौधा लगा लो
या  घोड़े के नाल के आकार वाले  पेपरवेट के नीचे  
अपना मुकद्दर  दबा  कर रख लो.

लैपटॉप के भीतर रखे पन्ने
भूल चुके  हैं हवा में फड़फड़ाना
उसमें सहेज कर रखी किताबें
कब करप्ट हो जाएँ,पता नहीं
मेज पर रखा सफ़ेद हाथी बिना हिलेडुले
शरारती  बच्चे सा हौले से हंसता है.

  1. मेरे पास

 मेरे पास छोटे छोटे सपने हैं 
या कहूँ बेतरतीब ख्वाहिशें 
इनके पीछे पीछे दौड़ते
मन तो नहीं भरा

भर आईं पिंडलियाँ
देह में खिंची रहती हैं सीमा रेखाएं.
मेरे पास उमंग है
या कहूँ दीवानापन
इसने कभी थकने न दिया
पूरी शिद्दत के साथ जिया
जीने का कोई तयशुदा
प्रारूप नहीं था फिर भी.
मेरे पास उतावलापन है
या कहूँ अधैर्य
धीमी रफ्तार वाला घटनाक्रम
खीझ से भर देता है
फास्ट फॉरवर्ड मोड में
आती हैं फर्जी तसल्लियाँ .

मेरे पास उत्सुकता है
या कहूँ उम्मीद के चंद कतरे
इनके जरिए कुछ नहीं होता
निराधार बतकही के अलावा
बंद कमरे में बहसियाते कापुरुष
क्रांति के सूत्रधार नहीं बनते.

मेरे पास घटाटोप अधेरा है
या कहूँ चकमक पत्थर
जिसमें चमक का उठना निश्चित है
अँधेरा जितना सघन होगा
रौशनी उतनी अधिक होगी
कालिमा देर तक नहीं टिकती.

मेरे कोई निजी एजेंडा नहीं
या कहूँ खामोख्याली
मेरे भीतर कोई अजायबघर नहीं
न उसमें सजाने लायक कोई स्मृति चिन्ह
मूर्खताओं को ऐतिहासिक कह उन्हें संरक्षित करना
मसखरेपन के सिवा  कुछ भी नहीं .

  1. पेंसिलों वाला सपना

एक अजीब –सा सपना रोज देखता हूँ
मेरे पास है चिकने पन्नों वाली डायरी
साथ हैं  बेहद सलीके से तराशी हुई चंद पेंसिलें  
जिनमें से आती कच्ची लकड़ी की गंध
पेन्सिलों के पृष्ठ भाग में नत्थी है एक रबर
वक्त द्वारा खींच दी गयी  हर अवांक्षित लकीर  को
आराम से मिटाते चलने के लिए.

ऐसी पेंसिलें अब चलन में नहीं
जिनका ग्रेफाइट टूट कर क़ागज पर बार बिखरता हो  
पेन्सिलों का खुदरा दुकानदार बताता है
पूछना चाहता हूँ  कि क्यों
क्या अब कोई कहीं कुछ गलत नहीं लिखता
कि उसे दुरुस्त कर लिया जाये.

चाह कर भी कुछ न पूछ पाया
चुपचाप उचक कर साइकिल पर हुआ सवार
चला गया शहर के उस कुख्यात चायघर की ओर
जहाँ लोग निरंतर चाय पीते  
क्रांति का अमूर्त रोडमैप बनाते
एक दूसरे को दिखाते रिझाते
लोटपोट हुए जाते हैं
वहाँ हरदम सघन सफ़ेद धुआँ
और अदृश्य कोलाहल भरा रहता है.

कहने को तो हमारे समय की पेंसिलें बहुरंगी हैं
पर इनसे हरेभरे पेड़, नाचता हुआ मोर
कलकल करता नीला चमकीला जल या
सुरखाब के पर कोई नहीं रंगता
नसे अब कोई नहीं सजाता स्वप्निल ड्योढ़ी.

बेतरतीब काली भूरी बैंगनी आकृतियां
हमारे वक्त का सम्भावित मुकद्दर हैं
उदास पन्नों के बीचोंबीच फंसी नुकीली पेंसिलें   
जब तब बरछी बन कलेजे में गहरे तक धंस जाती है.

  1. कुछ नहीं पता

पता नहीं कैसे दिन आ गये
सघन निस्तब्धता के बीच
सेवन सिस्टर्स* ने बंद किया
बगीचे में आ औरतों की तरह बतियाना
वे लौट जाने की जल्दबाजी लिए
अब कभी कभार चुपचाप आती हैं.

बोसीदा मकान के कंगूरों पर
टहलती हैं हष्टपुष्ट बिल्लियाँ दबे पाँव
अब कहीं दूध दही भरी हंडिया
छीके पर लटकी न दिखती
बिल्लियों को हरदम तलाश रहती है
भरपेट दाना चुग ऊँघते कबूतरों की.

काम की तलाश में निकला मंगलू
लौट आता है मुस्कराता बीच रास्ते से
पुलिसिया बेंत का निशान कमर पर लिए
बताता हर आते जाते को गर्व से
वह यदि इतना फुर्तीला न होता तो
आज होती जमकर पिटाई .

कुछ लोग बॉलकनी में बैठे
दिन भर ऊँघते रहते
इस बीच कतिपय सयाने कर आते
मौका ताड़ झटपट कैटवॉक
उनके लिए वॉक महामारी के ख़िलाफ़
उनके हिस्से की फैशनेबल जंग है.

पता नहीं कभी निविड़ अँधेरे को चीर
उजियारे दिन धरा पर आ भी पाएंगे.

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निर्मल गुप्त,
208, छीपी टैंक ,
मेरठ-250001
मोबाइल-08171522922 

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