डॉ नितेश व्यास की कविताएं

  1. शब्द का सपना

कविता में जीवन

के ढंग को तलाशता हूं

मैं खोजता हूं शब्दों में

इन्द्र धनुष के बाहर‌ का कोई रंग

कोई ऐसी वर्णमाला

जिसे पहनकर मैं अदृश्य हो सकूं

मैं एक आरामदायक कमरा खोजता हुआ

कविता की पुस्तक तक पहुंच जाता हूं

मैं ढूंढता हूं एक गोद किसी खुली डायरी सी

और शब्द की तरह उसमें सो जाता हूं ,

मैंने शून्य के लिए शब्द को चुना

शब्द ने आकाश को,

क्या शब्द मुझे भी सौंप देंगे आकाश को

या कि सारा आकाश सिमट कर

एक शब्दल भर होकर तैर जाएगा मेरी आंखों में

जहां मैं फिर कविता की आंख से देखूंगा

शब्द का सपना।

  1. शब्द-नि:शब्द

जो अखण्डित भासती है

शब्द की मैं वो तितिक्षा

जो निरर्थक से निकल कर

सार्थक होने को आतुर सी खडी

मैं अर्थ की वो ही

प्रतीक्षा

हूँ भटकता शब्द अब

जिसको न मिल पाया

अभी तक

उच्चरित होने का कोई

कंठ-तालु-दन्त-जिह्वा

की पहुंच से दूर का स्थान कोई

कभी हूँ वाक्य ऐसा

कि जहाँ दिखती नहीं है

योग्यता-आकांक्षा-आसक्ति की कोई अपेक्षा

मैं अपनी बोलती भाषाओं से

विश्राम लेकर

मौन में होकर समाहित

श्वास के भीतर ठिठकता

शून्य होना चाहता

पर

दमित वाचलता होती मुखर

आतुर त्वरा से

मैं विवश

फिर शब्द होकर

खर्च होता जा रहा

अविरल प्रवाह से।।

  1. वमन करता हुआ धर्म

भूमि पर नहीं टिकते देवताओं के पांव,

नहीं टिकते यक्षों-राक्षसों के भी

धरती से कुछ ऊपर उठता जा रहा है मनुष्य भी

क्यों कि अब वह परम धार्मिक हो गया है

और देवता बनने ही वाला है

उसने दिव्य शक्तियां जो प्राप्त कर ली है

उसकी कठोर तपस्या के बाद प्रकट हुए देवों ने

उसे दे दिये हैं सारे दिव्यास्त्र

जो सहायक हैं धर्म की रक्षा में,

अपने को कभी मत बचाना,

यह वचन था देवताओं का

तुम बचाना मात्र धर्म को कि वह करेगा तुम्हारी रक्षा

रहेगा तुम्हारे बाद भी

हम करते रहे प्राणपण से

धर्म की रक्षा,

और तो और

हमनें खेतो में उगाया धर्म

और समय-असमय  काटी उसकी फसलें

जो बिना बारिश ही लहरायी

सदियों तक

अब हमारे घरों में मुठ्ठी दो मुठ्ठी अनाज मिले ना मिले

हमारे गोदामों में

मुंह तक भरा है

वमन करता हुआ धर्म।।

  1. हे क्रियाओं

कहीं दूर

भरभराकर गिरते हैं पहाड़

एक चट्टान दरकती है

मेरे भीतर

मैं वही तो नहीं ?

कहीं बहता है जल

पागल और बेकल

डूबता जाता मेरा भी कुछ कहीं

मैं

कुछ

तो नहीं?

हवाएं बहकाती भोलीभाली रेत को

कहीं को कहीं

उड़ा ले जाती

मैं

कहीं

तो नहीं?

गिरना,डूबना और उड़ना

हे क्रियाओं !

मैं तुम्हारा

दत्तात्रेय तो नहीं?

  1. पानी

पानी होता है चिर युवा

जब तक वह

नहीं पाता

तुम्हारा स्पर्श

छूते ही तुम्हारे

वो हो जाता

अति वृद्ध

जैसे चेहरा नहीं

झुर्रियों की चल-समाधि।।

  1. ऊन के गोले

कहाँ गये वो ऊन के गोले

जिनमें धंसा के रखती थी माँ दो सलाइयां

जहां भी जाती,साथ ही रखती

रोज़ दुपहरी चौक में बैठी

धूप के धागों से वो बुनती थी गरमाहट

जैसे अंगुलियां वादक की

वीणा पर है किसी राग को बुनती

वैसी ही गति से,लय से

तुम भी अपना सपना बुनती थी

सोचता हूँ मैं

इससे तेज क्या बुनता होगा

ब्रह्मा सृष्टि के धागों को

पूरा होने पर स्वैटर के

घर में हमारे उत्सव होता

पहन के उसको मैं इतराता

सबको दिखाता

पांव न होते ज़मी पे मेरे

मानो माँ ने उस स्वैटर में पंख लगाए

हम चार थे

चारों के बारी-बारी से

पहने जाने पर भी

कुछ कम ना होता उसका नयापन

और जो गरमाहट चारों की

एक ही कोख से जन्मी थी जो

कैसे कम हो जाती उसमें?

अब तो बहुत से स्वैटर

घर में भरे पड़े हैं

पर कहीं न दिखते

ऊन के गोले,चारों भाई और सलाई

पर माँ ?

  1. भीमबेटका

भीमबेटका के भित्तिचित्रों से

निकल आया एक चित्र

हो गया

किंकर्तव्यविमूढ़

देख कर

बिना चित्रों के चलती-फिरती दीवारें

और

बग़ैर दिवारों के चलते-फिरते चित्र।

  1. अंधेरा था

अंधेरा था

और उन्हें बांटे था रहे थे शरीर

आगे की यात्राओं हेतु

उनमें से किसी ने

चुरा ली

मेरी देह।


डॉ नितेश व्यास

संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में लेखन।

मधुमती, किस्सा कोताह ,हस्ताक्षर,रचनावली आदि पत्रिकाओं एवं पोषम पा,अथाई,संवाद सरोकर,काव्यमंच,रचणिता the creater, the purvai blog आदि ब्लाग्स् पर,दैनिक नवज्योति,दैनिक युगपक्ष आदि समाचार पत्रों में कविताएं प्रकाशित

संप्रति : जोधपुर में संस्कृत विषय के सहायक आचार्य पद पर कार्यरत हैं ।

पता- गज्जों की गली,पूरा मोहल्ला,कबूतरों का चौका,जोधपुर (342001)राजस्थान

मो-9829831299

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