पल्लवी मुखर्जी की कविताएं

  1. विलुप्त होती स्त्रियाँ

उसने जी लिया था
अपने हिस्से का जीवन
शायद…

उसके पैरों के निशान
पगडंडियों पर
मिल जायेंगे
तुम्हें

उसके पंजों का
छापा भी
दीवार पर
तुम्हें मिलेगा
जिसे उसने
पाथा था उपले थापते हुए
बड़े प्रेम से
बड़े जतन से
बड़े  इत्मीनान से

घर के फर्श को
लीपते हुये भी
छोटे-छोटे पैरों के चिह्न
छूट गये थे
जो तुम्हें
नहीं दिखाई देंगे

उसने कोई निशान
ढिबरी  बारते हुये भी
छोड़ा  होगा
जब सूरज
डूब रहा होगा चोरी-चोरी
अस्ताचल की ओर

सूरज की
लुकाछिपी का खेल
उसकी  लटों से
खेलते हुये
उसके चूल्हे की हांडी में
झांका होगा

खोली के भीतर की उदासी को
बचाया होगा उसने
पूरी शिद्दत से

एक स्त्री
इसी तरह
बचाती रहती है
तमाम उदासी,थपेड़ों
और  उन अंधेरों को
जिसमें सीलन होती है
दीवारों पर
लगी होती है काई

स्त्री
खरोंचती है
तुम्हारे भीतर की काई भी

स्त्रियाँ
इसी तरह
विलुप्त हो जाती हैं
छोड़ जाती है एक
निशान प्रेम का
जो
तुम्हारे माथे पर
अंकित होता है

     

  1. हवा के कानों में

उन्होंने उस वृत के चारों ओर
चक्कर काटना छोड़ दिया है
जहाँ खड़े हो तुम
गठरी की तरह
बैठी हुई वे
उतार रही हैं

अपने जीवन के
उन तमाम दुःखों को
जो अनंत काल से
खरोंचे जा रहे थे

उन घावों की तरह
वे नहीं चाहती भरना इन्हें
जो टीसते रहते हैं
अर्धरात्रि में
जब आँगन का पारिजात
भीगता रहता है ओंस में

वे इन झुरियों के भीतर
धंसी हुई पीड़ाओं को
धकेल देना चाहती हैं
किसी ब्लैक होल के भीतर
और खुद को
झटककर
आ जाना चाहती हैं बाहर

नीले आकाश के नीचे
बुलबुलों के साथ
छेड़ देना चाहती है मालकौंस

तमाम मायूसियों और
उदासियों को खूंटी पर टाँग
वे निकल पड़ी हैं
आकाश के कैनवास पर
काढ़ने के लिये
तमाम रंग -बिरंगे फूल

हवा के कान में
झूल रहे है
खुशबुओं के झुमके

3. मछली और स्त्री

क्या एक
मछली का
दुःख समझ पाओगे ?
जो
अपनी देह के भीतर
काँटों को जज्ब किये हुये
तुम्हारी आँखों में
हँसी छोड़ जाती है

और तुम

मचल जाते हो

उसकी देह को

स्पर्श करने के लिये

उसके होंठों पर

एक चुंबन अंकित करने के लिए

मछली

समुद्र के आभिजात्य के भीतर

जलपरी सी

तैरती हुई

दिखाई देती है

तुम्हें

शार्क और आक्टोपस के

आंतक से

अपने को

निरापद मान

तुम्हारी आँखों में 

जादू सा कर देती है

मछली और

स्त्री के दुःख में

फर्क कहाँ?

  1. स्त्री का हाथ

देखो इन हाथों को

यह एक स्त्री का हाथ है

हाथ

जिसने 

शिशु को थपकियाँ दी

गहरी नींद में भी

शिशु

जानता है

इन ऊंगलियों का रहस्य

हाथ

जिसने

बेली रोटियाँ

गोल गोल

तपते अंगारों में

कई बार जली

उसकी ऊंगलियाँ

जली ऊंगलियों की गंध से

क्या तुम्हारी आँखों के कोर

नम हुई ?

हाथ

जिसने

तोड़ा पत्थर

सड़क पर

हाथों पर उभरे खरोंचों से

रिस रहा है खून

खून के धब्बे

बिखर गये हैं

अखबार में

हाँ

यह एक

स्त्री का हाथ है

हाथ

घूम रहा है निरंतर

बिना थके

बिना रुके

मृत्यु के

अंतिम छोर तक

       

  1. सीरिया की रोटी

नहीं चाहती

कि तुम्हारी रोटी का

निवाला

जला हुआ हो

जैसे कोई शहर

जलता है

सीरिया की तरह

बदहवास से भागते

खून से लथपथ

बच्चों की शक्ल

उभर जाये

उस रोटी में

एक बार 

जल जाने के बाद

दुबारा

उस स्थिति में

लौटना

कहाँ संभव होता है

कहाँ गये

वे तमाम बच्चे

जो बंदूकों और बारूदों की

भेंट चढ़ गये

बारूदों की आँखों में

पट्टी होती हैं जो

मसूम बच्चों के

चिथड़े उड़ा देती है

सीरिया की व्यवस्था

बच्चों के फटे हुये 

कपड़ों की तरह

दिख रही है

एक अदद

फूली हुई रोटी की

करती हूँ कवायद

ताकि धरती

बची रहे

सीरिया बनने से

————-

पल्लवी मुखर्जी

जन्म -26  नवंबर

रामानुजगंज (अंबिकापुर ,सरगुजा )

शिक्षा -स्नातक, संगीत विशारद

प्रकाशन– दोआबा, बिजूका ब्लाग, हिंदीनामा,पोषम पा, समकालीन परिदृश्य, लेखनी,जनसंदेश, बहुमत,छपते छपते,छत्तीसगढ़ आस पास,दुनिया इन दिनों में कविताएं प्रकाशित, तीन साझा संकलन प्रकाशित
संपर्क : मकान नंबर-88, जे. पी.विहार

मंगला, बिलासपुर

छत्तीसगढ़

495002

2 Responses

  1. दिनेश अत्रि says:

    पल्लवी की कविताएँ अधिकांशतः स्त्री केन्द्रित कविताएं हैं। स्त्री यातना को समाज द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाने का दंश झेलती संवेदना में डूबी कविताएँ हैं। वे उत्तरोतर अच्छा लिख रही हैं। उन्हें बहुत सारी शुभकामनाएं ☘️🌹☘️

  2. सौरभ दत्ता "जयंत " says:

    बहुत सुन्दर रचनाएँ

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