प्रणव प्रियदर्शी की कविताएं

  1. अकेले आदमी की मर्जीवह वक्त की आग पर से
    विद्रूपता का राख हटा
    बढ़ता है आगे
    जूझने को सारी विषमताओं से।

    जब वह
    अपने भीतर उतरता है
    तो समाज उसे
    अनुपयोगी सिद्ध कर देता है
    देखता है वह सामने
    सूखे कचनार का पेड़
    और ठिठक कर
    खड़ा हो जाता है बीच सड़क पर।

    जब दूसरे को
    जगाने का प्रयास करता है
    हाट में होने लगता है उसका मोलभाव
    सभी अपना झंडा
    रखना चाहते हैं उसके हाथ में
    निकल आते हैं बाहर
    सारे आधुनिक हथियार
    जिसकी जीत होगी
    उसी के साथ उसे जाना होगा
    नहीं तो मरना होगा

    सामने देखता है वह गहरी खाई
    और झट से उसमें कूद पड़ता है।

    जगह-जगह इश्तेहार चिपक गया है-
    अकेले आदमी की नहीं होती है कोई मर्जी
    संगठन की मोटी चमड़ी
    और बाहुबली की मदनभेड़ी से
    चलता है सारा कारोबार
    सधता है संसार।

    2. साजिश के विरुद्ध

    हमारे मन में
    सुराख करके रखते हैं वो
    ताकि निचोड़ा जा सके सारा रस
    जैसे खान से निकाला जाता है खनिज
    जैसे जानवर के थन से दूध

    यह एक साजिश है
    जो सदियों से चली आ रही है
    अलग-अलग वेश में
    मनुष्यता के खिलाफ

    मैं अपने मन की जमीं पर
    शिकारी नजरों से दूर
    हर साजिश के विरुद्ध
    उगाना चाहता हूँ दूब
    क्योंकि संतुलन का नाम है जीवन
    और इसे खिलना चाहिए
    अपने ही अर्थ में
    अपने ही आनंद में
    जैसे खिलते हैं फूल।

    3. जंजीरें

    सुविधाओं के गुलाम हो चुके हैं हम सभी
    जंजीरें बाहर दिखतीं नहीं
    वह हमारी आत्मा पर पड़ी हैं
    इसलिए जब जो चाहे
    हमें अपने हक में इस्तेमाल कर सकता है
    शायद इसे ही कहते हैं राजनीति

    लेकिन हम समझ नहीं पाते
    कि सरकार का गिरना और बनना
    महज एक दिखावा है
    गिर रहा है आज हर आदमी
    उस फरेबी जाल में
    जहाँ वक्त है डीजल
    और जीवन है महंगाई।

    4. मुहूर्त देख कर

    मैं भी
    प्रतिष्ठित हो सकता था
    अपने समाज में
    अगर परंपरा के नाम पर
    एक डर भीतर पाले रखता
    और कभी-कभी
    उसकी लाठी से
    दूसरों को हाँक दिया करता।

    मुझे भी
    सम्मान मिल सकता था
    अगर अपनी भावनाओं का कत्ल कर
    उससे रिसे खून
    पुरुखों को कुल्ली करने के लिए
    अर्पित कर दिया होता।

    मैं भी
    महान बन सकता था
    अगर किसी बिल्ली को
    सामने देखकर
    रास्ता बदल लिया करता
    अथवा मुहूर्त देख कर
    जन्म लिया होता।

    5. पहाड़ का गायब होना

    बालू घाट की नीलामी के मुद्दे पर
    कल चिड़ियों की पंचायत लगी थी
    फैसले के बाद सभी
    शाम के बदले दिन में ही
    लौटने लगीं अपने-अपने घर
    उसके बाद फिर कभी
    वे मैदान में भी नहीं दिखीं।

    नदी किनारे पर लेट गई
    पानी उकड़ू होकर बैठ गया
    हवा नमकीन हो गई
    और एक के बाद एक
    पहाड़ गायब होते जा रहे थे।

    अब पूरी धरती हो गई है समतल
    कहीं से भी पकड़ो एक ही रूप
    कहीं से भी देखो एक ही रंग
    कहीं से भी चखो एक ही स्वाद
    विविधताएँ जो बच सकी थीं केवल प्रकृति में
    वे भी खत्म हो चुकी हैं
    अतिक्रमण के बनते-बिगड़ते खेल में
    जगह हड़पती जा रही हैं अट्टालिकाएँ।

    चारों तरफ शोक मनाती
    धूसर अंधकार की स्मृति में
    लिखा पड़ा है कि
    सिर्फ यहीं था कभी जीवन।

    6. सूखी भावनाओं का लाल जंगल

    जो कहना था
    आज तक कहा ही नहीं
    और जो नहीं कहना था
    उसे हजार-हजार तरीके से
    कहने की कोशिश करता रहा।

    कहना था कि
    मेरे लिए जिंदगी
    बजती धान की बालियाँ हैं
    जिसे समय के ऊखल में
    हर रोज कूटना है
    दाने को रखना है
    भूसे को हटाना है
    कंकड़-पत्थर चुन कर फेंकना है।

    कहना नहीं चाहिए
    लेकिन कहना जरूरी है कि
    जीवन के आधे हिस्से को
    कामनाओं के सूप में फटक लेने के बाद
    मुझे सबकुछ
    केतारी की सिट्ठी जैसा लगने लगा है।

    किससे कहूँ कि मेरी चारों तरफ
    मुँह बाई सूखी सुराही है
    निराशा में खुलता और बंद होता दरवाजा है
    शोर करती खिड़कियाँ हैं
    भीतर आग है
    बाहर ताप है।

    अजगर की तरह मेरी आत्मा पर
    पड़ा रहता है चितकबरा सन्नाटा
    शिथिल रहने को बाध्य करता है
    दूर तक फैला सूखी भावनाओं का लाल जंगल।

    फिर भी हार मानने के बदले
    मेरा ‘कल’ आज से बेहतर होगा
    जैसी उम्मीद के लड़खड़ाते तिनके को पकड़
    दिन को पीछे धकेलता हूँ
    लेकिन ‘कल’ और अधिक ठूँठ बनकर
    भोर की गोद में बैठा
    मेरा इंतजार करता रहता है।

    फिर…फिर
    मशीन के फीते की तरह
    लोहे जैसे वक्त पर घिसता-पिसता हूँ।

    कभी किसी दूसरे से
    या कविताओं से भी
    ये बातें मैंने नहीं कही कि
    इन सबसे उबरने के लिए
    लोग जो करते हैं
    मैंने भी किया
    लेकिन झरिया में खाली हो चुकी
    बेडौल खदान की तरह
    और अधिक निराश होकर लौटा हूँ।

    उम्र गुजरती जा रही है
    हर तरफ से रास्ते मुड़ते जा रहे हैं
    हवाएँ कब्र में लुढ़क रही हैं
    समंदर के उस पार
    एक यात्रा शुरू हो रही है
    और एक यात्रा का अंत हो रहा है।

    एक मैं हूँ
    जो वर्षों या युगों से
    वहीं खड़ा हूँ
    जहाँ शुरुआत और अंत के बीच
    कोई फासला नहीं होता।

    (झरिया: झारखण्ड राज्य अंतर्गत धनबाद में स्थित जगह। यह समृद्ध कोयला संसाधन के लिए प्रसिद्ध है।)

    —————–
    प्रणव प्रियदर्शी
    जन्म तिथि: 12-01-1984
    शैक्षणिक योग्यता
    स्रातकोत्तर (पत्रकारिता एवं जनसंचार)
    संप्रति
    ‘हिन्दुस्तान’ राँची के संपादकीय विभाग में कार्यरत।
    प्रकाशित किताब
    सब तुम्हारा (कविता संग्रह ) वर्ष 2015 में विकल्प प्रकाशन से प्रकाशित।
    लेखकीय उपलब्धियाँ
    वागर्थ, कथादेश, वर्तमान साहित्य, सनद, देशज, परिकथा, साहित्य अमृत, साहित्य परिक्रमा, विभोम स्वर, सृजन सरोकार, हिन्दी चेतना, कादंबिनी, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और प्रभात खबर सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

    संपर्क

मकान नंबर: 51, न्यू एजी कोऑपरेटिव कॉलोनी,
कडरू, राँची-834002 (झारखण्ड)
मोबाइल: 09905576828, 07903009545

10 Responses

  1. हार्दिक आभार सर। आपके प्रोत्साहन के बिना ये संभव नहीं था।

  2. हार्दिक आभार सर। आपके प्रोत्साहन के बिना ये संभव नहीं था।

  3. हार्दिक आभार सर। आपके प्रोत्साहन के बिना ये संभव नहीं था।

  4. कमलेश says:

    शानदार कविताएं। प्रणव को बधाई।

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