राजेश’ललित’ की कविताएं

बुद्ध

मैं आत्मा घर
रख आया बस
यूँ ही शरीर 
लेकर निकल पड़ा
कभी इस डगर
कभी उस नगर
आत्मा साफ़ हो
तो ठीक
बाहर रोगी हैं
वृद्ध हैं
बाहर निष्प्राण हैं
मैं कोई बुद्ध नहीं
कोई वट वृक्ष नहीं
हाँ,पत्नी को बता आया
वो साफ़ रखेगी आत्मा
संदूक में कपड़े में लपेट कर
जब तक मैं शरीर लिए
घूम रहा कभी 
इस डगर
कभी उस नगर 

  1. बया का घोंसला

उड़ बया
यहाँ से जा
कहीं और         
घोंसला बना
यह सुंदर सा
कोटर नुमा
गोल सा 
गुम्बद का
आकार लिये
तुम अपना
परिवार लिए
रहती थी
तुम्हारी मां 
न कहती थी
यह जंगल का
शासन है
शेर जंगल का
राजा है
गीदड़ सियार भी
रहते हैं
गिरगिट भी
रंग बदलते हैं
साँपों के अरमान
मचलते हैं

उड़ जा बया।                                      
नये राजा
का आदेश नया
जिस पेड़ पर
बया रहती है
वह पेड़ कल
कट जायेगा
राजा है
कारण नहीं बतायेगा
तो  जहां छल है
जहाँ बल है
सत्य कहाँ चल पायेगा।

बया उड़ जा
जिस डाल पर 
तुम बैठी हो
कांट छांट में
कट जायेगा
या बच पायेगा
वक़्त की अदालत है
हाँ,सत्य ही बच पायेगा।

2 क्षणिकाएँ 

कुछ के स्वारथ
सिद्ध हो गये

नोंच नोंच कर
गिद्ध हो गये
खाली रह गई
जगह उनकी
कभी न भरेंगे
घाव दिये जो
स्थान रहेंगे यूँ ही
वो जो रिक्त हो गये 

2.

सूरज तुम 
छिपा लो मुँह अपना
क्षितिज के पीछे जाकर
मेरे पास अँधियारे 
अभी और भी हैं
तुम घूमना
अपना मूंह उठाये
दिन भर
भटकना नये उजालों 
की तलाश में

1 Response

  1. Rakesh shastri says:

    Bahut hi bariya

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