विवेक चतुर्वेदी की कविताएं

  1. पिता

बार-बार दिख रहे हैं पिता आजकल
रेलवे स्टेशन पर दिखे आज
एस्केलरेटर की ओर पैर बढ़ाते और वापस खींचते
प्लेटफार्म पर पानी की जरूरत
और रेल चल पड़ने के डर के बीच खड़े…
फिर डर जीत गया
कल चौराहे पर
धुंधलाती आंखों से चीन्हते रास्ता
डिस्पेंसरी के बाहर धूप में
कांपते पैरों से लगे कतार में
एक दिन सुबह बैठे दिखे
बीड़ी फूंकते निर्जन मंदिर की सीढ़ियों पर
जब  भींचे जा रहे हो घरों में
रोशनदान और दरवाजे
तब पिता और गौरेया होने की जगह
और जरूरत एक साथ खत्म होती जाती है
पढ़े जा चुके पुराने सलवटी अखबारों की तरह
बैठक से बाहर किए गए पिता की जगह
सीलन और धूल भरे बरामदे में है
उनकी खांसी सबसे अप्रिय ध्वनि की तरह सुनी गई है
पुराना पड़ चुका अपना चश्मा पोंछते पिता
एक अज्ञात मंत्र बुदबुदा रहे हैं
जिसमें हल बैल है, तालाब है
खेत और उसकी मेड़ है
चिड़िया डराने के धोखे हैं, साइकिल है
भौंरा है गपनी है मेला मदार है
गौना है होली है घर लौटने पर घेरते बच्चे हैं
कंक्रीट के भयावह जंगल में
वह मंत्र खो गया है
फुटपाथ पर झरे सूखे पत्तों पर
चलते हुए पिता
कांपती आवाज में पुकार रहे हैं
और…
एक पूरी पीढ़ी अनसुना कर
बेतरह भागी जा रही है।।                     

 2. इस सदी में

आ खड़ा हुआ है स्कूल के पास
एक बांसुरी वाला
देखना अभी छूटेंगे बच्चे
घेर लेंगे दौड़ कर इसे
बस्ते फेंक देंगे
ढूंढेंगे बाप के जेब की
तलहटी से रेजगारियां
मां का बटुआ
पलटा के लूट लेंगे
बेसुर में अपने-अपने
बजाते बांसुरी घर जाएंगे
सुनो…यह दृश्य था
पर स्वप्न हो गया है इस सदी में।।                                      

  1. अभी तक तो…

स्त्रियों ने प्रेम करने से
मना कर दिया है और
बंजर होती जा रही है भूमि
कैक्टस उग आए हैं
धान का नींदा लगाते
सहसा थम गए हैं स्त्रियों के गीत और
एक पूरी दुनिया के बच्चे
महाभूख चिल्ला रहे हैं
स्त्रियां पांव मोड़ कर लेट गई हैं और
बिना बटनों की कमीज पहने
भागे जा रहे हैं बदहवास पुरुष
स्त्रियां लिपटे बिछावन लिए
बैठ गई हैं और एक पूरी सदी
हो रही है उनींदी
आज नहीं खींच रही है
स्त्री कुंए से जल और
सूखे घड़े दरकते जा रहे हैं
किसी सुबह सहसा चौंक कर जागेंगे
इस महा भय के साथ
फिर… रुकी हुई सांस लेंगे कि
अभी तक तो ऐसा कुछ नहीं हुआ है।।                

  1. कविता कहां है?

चिड़ियों की तरह
सताए जा रहे हैं बच्चे
छीन लिए गए हैं
उनके खेल के मैदान
बालकनी में सूखते कपड़ों के साथ
वे टंगे हैं उदास…
गुम हुई है
तिनके बुनने की जगह
भिंचे रोशनदानों को
चोटिल चोंच से
खटखटा रही हैं थकी गौरेया
नदियों सी पीड़ित हैं स्त्रियां
उन्हें घुटे घरों और क्रूर बांधों में
बांधा जा रहा है
बिजली और बच्चे जनने के लिए
वे जिन रास्तों से खदेड़ कर लाई गई हैं
वहां हरे जंगल पानी में डूबकर भी सूख गए हैं
पेड़ दलितों की तरह
खोते जा रहे हैं अपने खड़े होने की जगह
उन्हें थामती मिट्टी विदा हुई है
दीखने लगे हैं जड़ों के हाड़ कंकाल
बूढ़े और पहाड़ एक ही तरह से अकेले हुए हैं
घिट दिए गए हैं उनके कद
छीज रहा है उनका होना
वहशी जरुरतों से उन्हें गिट्टी कर
शहर ढोया जा रहा है
हैरान… ऐसे समय में
पूछ रहा है एक बूढ़ा पहाड़
कविता कहां है
क्या मुलायम मिट्टी ओढ़ कर
सो रही है?

  5. वो आदमी

छाते की टूटी कमाची को
हाथ से सहलाएगा
छिपकर छज्जे में किसी
देखेगा भीगती अपनी साइकिल
पोंछेगा गमछे से बार बार अपना सर
गीली कमीज देह के ताप से सुखा लेगा
सब जतन करेगा
पर देखना..इस जुलाई भी
नहीं खरीद सकेगा नई बरसाती
वो आदमी।।

  6. ताले…रास्ता देखते हैं

चाबियों को याद करते हैं ताले
दरवाज़ों पर लटके हुए…
चाबियाँ घूम आती हैंॉ
मोहल्ला, शहर या कभी-कभी पूरा देस
बीतता है दिन, हफ़्ता, महीना या बरस
और ताले रास्ता देखते हैं।
कभी नहीं भी लौट पाती
कोई चाबी
वो जेब या बटुए के
चोर रास्तों से
निकल भागती है
रास्ते में गिर,
धूल में खो जाती है
या बस जाती है
अनजान जगहों पर।
तब कोई दूसरी चाबी
भेजी जाती है ताले के पास
उसी रूप की
पर ताले अपनी चाबी की
अस्ति (being) को पहचानते हैं।
ताले धमकाये जाते हैं,
झिंझोड़े जाते हैं,
हुमसाये जाते हैं औजारों से,
वे मंजूर करते हैं मार खाना
दरकना फिर टूट जाना
पर दूसरी चाबी से नहीं खुलते।
लटके हुए तालों को कभी
बीत जाते हैं बरसों बरस
और वे पथरा जाते हैं
जब उनकी चाबी
आती है लौटकर
पहचान जाते हैं वे
खुलने के लिए भीतर से
कसमसाते हैं
पर नहीं खुल पाते,
फिर भीगते हैं बहुत देर
स्नेह की बूँदों में
और सहसा खुलते जाते हैं
उनके भीतरी किवाड़
चाबी रेंगती है उनकी देह में
और ताले खिलखिला उठते हैं।
ताले चाबियों के साथ
रहना चाहते हैं
वो हाथों से,
दरवाजे़ की कुंडी पकड़
लटके नहीं रहना चाहते
वे अकेलेपन और ऊब की दुनिया के बाहर
खुलना चाहते हैं
चाबियों को याद करते हैं ताले
वे रास्ता देखते हैं।।

  1. स्त्रियाँ घर लौटती हैं

स्त्रियाँ घर लौटती हैं
पश्चिम के आकाश में
आकुल वेग से उड़ती हुईं
काली चिड़ियों की पाँत की तरह।
स्त्रियों का घर लौटना
पुरुषों का घर लौटना नहीं है,ॉ
पुरुष लौटते हैं बैठक में,
फिर ग़ुसलखाने में फिर नींद के कमरे में
स्त्री एक साथ पूरे घर में लौटती है
वो एक साथ, आँगन से चौके तक लौट आती है।
स्त्री बच्चे की भूख में
रोटी बनकर लौटती है
स्त्री लौटती है दाल भात में,
टूटी खाट में,
जतन से लगाई मसहरी में,
वो आँगन की तुलसी और कनेर में लौट आती है।
स्त्री है… जो प्रायः स्त्री की तरह नहीं लौटती
पत्नी, बहन, माँ या बेटी की तरह लौटती है
स्त्री है… जो बस रात की
नींद में नहीं लौट सकती
उसे सुबह की चिन्ताओं में भी
लौटना होता है।
स्त्री, चिड़िया-सी लौटती है
और थोड़ी मिट्टी
रोज़ पंजों में भर लाती है
और छोड़ देती है आँगन में,
घर भी, एक बच्चा है स्त्री के लिए
जो रोज़ थोड़ा और बड़ा होता है।
लौटती है स्त्री, तो घास आँगन की
हो जाती है थोड़ी और हरी,
कबेलू छप्पर के हो जाते हैं ज़रा और लाल
दरअसल एक स्त्री का घर लौटना
महज़ स्त्री का घर लौटना नहीं है
धरती का अपनी धुरी पर लौटना है।।

 8. मीठी नीम

एक गन्ध ऐसी होती है
जो अन्तर में बस जाती है
गुलाब-सी नहीं
चन्दन-सी नहीं
ये तो हैं बहुत अभिजात
नीम सी होती है
तुम…ऐसी ही एक गन्ध हो।।

  1. रावण

रावण… शताब्दियों से गूँजता है
जिसका खल
रावण… जो छल से चुरा लाया है
एक स्त्री के दिन… पर रातें नहीं
पर क्या रावण
हमसे अधिक नहीं जानता
स्त्री देह का राग?
जानता है रावण!
वो बलात् नहीं कर सकता
एक स्त्री को सितार
स्त्री जब चाहेगी
सच में संगीत…
तब कसेगी
अपनी देह के तार
वो अपने हाथ में थाम लेगी मिजराब
और ख़ुद देह की रहस्यमयी गहराइयों तक ले जायेगी
स्त्री खोलेगी अबूझ गुफ़ाओं के द्वार
और दीप्त हो जायेगा देहराग…
असीम धैर्य… असीम प्रतीक्षा…
जानता है रावण
और चाहता है ‘अशोक’ रहे वाटिका
जानता है एक दुर्ग है स्त्री देह
जीता गया है जो छल से
पर बल से चढ़ी नहीं जा सकती उसकी प्राचीर
जब तक स्वयं सीढ़ी न हो जाये स्त्री
चाहता है रावण
स्त्री कुटिया तक होना चाहिए
एक लाल मुरम की राह
पर लाल मुरम तो उस स्त्री के पास है
सुनो! इस सदी में
कितने कितने पुरुषों ने
देखी है लाल मुरम बिछने की राह
ये जो स्त्री सो रही है तुम्हारे बगल में
तुम्हारे तप्त चुम्बन से घुट रही है जिसकी साँस
क्या लाये थे इसे तुम
लाल मुरम की सड़क से
नहीं… तुम लाये थे इसे
धन, प्रतिष्ठा, पद, बल या छल से…
तुम इस स्त्री के बन्द दुर्ग में
प्रवेश कर गये
तुमने खटखटाकर देखी न राह
अब तुम साभिमान रहते हो इस दुर्ग में
जिसके द्वार शिलाओं से बन्द हैं
तुमको पता नहीं
तुम दुर्ग की दीवारों और देहरी पर रहते हो
कल दशहरे की रात
आग और धुएँ के बीच
इन शताब्दियों में
रावण पहली बार मेरे साथ बैठा
तब उसके कन्धे पर रख हाथ
जानी मैंने स्त्री संवेदना
राम की शताब्दियों… मुझे क्षमा करना।।

  10. दुनिया के लिए ज़रूरी है

बहुत-सी ख़ूबसूरत बातें
मिटती जा रही हैं दुनिया से
जैसे गौरैया,
जैसे कुनकुनी धूप,
जैसे बचपन,
जैसे तारे,
और जैसे एक आदमी,
जो केवल आदमियत की ज़ायदाद
के साथ ज़िन्दा है।
और कुछ ग़ैरज़रूरी लोग न्योत लिए गये हैं
जीवन के ज्योनार में
जो बिछ गयी पंगतों को कुचलते
पत्तलों को खींचते
भूख-भूख चीख़ते
पूरी धरती को जीम रहे हैं।
सुनो… दुनिया के लिए ज़रूरी नहीं है मिसाइल
ज़रूरी नहीं है अन्तरिक्ष की खूँटी पर
अपने अहम् को टाँगने भेजे गये उपग्रह
ज़रूरी नहीं हैं दानवों सी-चीख़ती मशीनें
हाँ… क्यों ज़रूरी है मंगल पर पानी की खोज ?
ज़रूरी है तो आदमी… नंगा और आदिम
हाड़-मांस का,
योग-वियोग का,
शोक-अशोक का,
एक निरा आदमी
जो धरती के नक़्शे से
ग़ायब होता जा रहा है
उसकी जगह उपज आयी हैं
बहुत-सी दूसरी प्रजातियाँ… उसके जैसी
पर उनमें आदमी के बीज तो बिल्कुल नहीं हैं
इस दुनिया के लिए ज़रूरी हैं
पानी, पहाड़ और जंगल
ज़रूरी है हवा और उसमें नमी
कुनकुनी धूप, बचपन और
तारे… बहुत सारे।

   ृ———- 

विवेक चतुर्वेदी
जन्मतिथि       –           03-11-1969
शिक्षा            –         स्नातकोत्तर (ललित कला)
प्रकाशन –             कविता संग्रह – ‘‘स्त्रियाँ घर लौटती हैं’’ (वाणी प्रकाशन), इस कविता संग्रह का  9 भारतीय तथा 2 विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है
प्रकाशित कविताएं – अहा जिंदगी, कथादेश, साक्षात्कार, नई दुनिया, प्रभात खबर, दुनिया इन दिनों, पाखी, वागर्थ, माटी, कादम्बिनी, पहल, जनपथ, आजकल।
पुरस्कार –      मध्य प्रदेश का सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार “वागीश्वरी” प्राप्त
लघु फिल्म निर्माण     जल जंगल और जन, सहेजें जल अनमोल, चलें भोर की ओर
संप्रति  –         प्रशिक्षण समन्वयक, लर्निंग रिसोर्स डेवलपमेंट सेंटर, कलानिकेतन     पॉलिटेक्निक महाविद्यालय, जबलपुर
अध्यक्ष, मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन
संयोजक, युवा साहित्य केंद्र, साहित्य अकादमी, भोपाल
पता      –           1254, एच.बी. महाविद्यालय के पास, विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.) 482002
फोन     –           9039087291, 7697460750
ईमेल   –         vchaturvedijbp@gmail.com

 

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