प्रदीप कान्त की 5 ग़ज़लें

प्रदीप कान्त

जनसत्ता सहित्य वार्षिकी (2010), समावर्तन, वर्तमान साहित्य, बया, पाखी, कथादेश, विभोम स्वर, सम्बोधन, सुख़नवर, वीणा, आदि साहित्यिक पत्रिकाओं व दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण आदि समाचार पत्रों में गज़लें व नवगीतप्रकाशित।

अनुभूति, कविता कोश, रचना कोश, हमरंग, पुरवाई आदि वेब साइट्स पर रचनाएँ संकलित।

आकशवाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण

कृति – क़िस्सागोई करती आँखें (ग़ज़ल संग्रह)

सम्पर्क – 24, सत्यमित्र राजलक्ष्मी नेचर, सूर्य मंदिर के पास, रंगवासा रोड़, इंदौर – 453 3331

ब्लॉग: pradeepkant.blogspot.com

फोन -94074 23354

इमेल-kant1008@rediffmail.com

1

तेरे जैसा है अपना भी
हाल शिकस्ता है अपना भी

बाद वक़्त के मिलता है सब
लम्बा रस्ता है अपना भी

फूल पड़े मुरझाए जिसमें
इकगुलदस्ता है अपना भी

भूल गए सब जिसको पढ़कर
वो ही क़िस्सा है अपना भी

खुल कर ज़रा मिले तो कोई
नेह बरसता है अपना भी

2

शक से चाहे यारी से
परखा ज़िम्मेदारी से

उसकी मर्ज़ी अगर रहे
हमसे पर्दादारी से

भेजे ज़रा बुलावा वो
जाएंगे खुद्दारी से

संकल्पों का उसके क्या
वादे हैं सरकारी से

साथ तुझे भी डुबो न ले
बचना साझेदारी से


3
उसने जो पैग़ाम लिखे
नफ़रत के ही नाम लिखे

बिक पाए वो कैसे जो
रोज़ बढ़ा कर दाम लिखे

राजा जी महलों में खुश
कौन हमारा धाम लिखे

मुंसिफ़ मेरे हक़ में फिर
लिख तू, जो इल्ज़ाम लिखे

सुख तो मिला नहीं फिर भी
हमने चारो धाम लिखे

4
बनकर मोम, पिघल कर देखूँ
अंधियारे को खल कर देखूँ

सुनता हूँ,बीमार दोस्त है
वक़्त मिले तो चल कर देखूँ

जीत,सुना सच की होती है
कुछ दिन ख़ुद को छल कर देखूँ

शायद सूरज की किरणें हैं
आँख ज़रा सी मलकर देखूँ

अगर न भाई तुमको ये भी
फिर से बात बदलकर देखूँ

महफ़िल अब तो उठने को है
अब तो राज़ उगलकर देखूँ

5
सुन पाऊँ जितना रहने दो
क़िस्से को क़िस्सा रहने दो

ग़लत बात पर टोकूंगा ही
या मुझको बहरा रहने दो

मौत दबे पाँवों आती है
मुझ को बिन पहरा रहने दो

शहर गाँव में घुस आएगा
रस्ता ये कच्चा रहने दो

बिगड़ न जाऊँ दाना होकर
मुझको तो बच्चा रहने दो

1 Response

  1. रविन्द्र मराठे says:

    बेहतरीन! ” बिगड़ न जाऊं दाना होकर “! वाह वाह!

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