अमरीक सिंह दीप की कहानी ‘प्रकृति’

वह इतनी सुन्दर है जितनी सुन्दर यह धरती। धरती पर खड़े पहाड़ । पहाड़ पर खड़े देवदार, चीड़ , चिनार , सागवान , बुरुंश के वृक्ष। पहाड़ों से गिरने वाले झरने। झरनों के समूह गान से बनी नदियां। नदियां , जो मैदानों में आकर बाग-बगीचों और खेतों को सींचतीं हैं । दूब से लेकर वृक्ष तक सबको स्तनपान कराते हुए चलती हैं । वह इतनी सुन्दर है जितनी लहलहाते हुए खेतों की हरियाली । इस हरियाली के शीर्ष पर खिलने वाले फूल। फूलों के गर्भ में पलने वाले अनाज के दाने।आम के बागों में लगा बौर। बौरों की मदिरा पीकर कुहकती कोयल। बागों में पड़े झूले। उन पर झूलती किशोरियां।

उसने पता नहीं उसे कब देखा? कहां देखा? उसे तो इतना भी याद नहीं, जब उसने उसे पहली बार देखा तो उसने क्या पहन रखा था? किस रंग के थे उसके वस्त्र?  उसका पहनावा किस देश या प्रदेश का था ? वस्त्रों से उसका कोई सरोकार भी नहीं । वस्त्र तो आवरण है, नित्य बदलते रहते हैं।उसने तो उसमें अपनी आत्मा का अर्धांश देखा था।वह अच्छी तरह से जानता है कि ईश्वर हर स्त्री- पुरुष का जोड़ा बनाता है। वह उनके शरीर तो दो बनाता है पर आत्मा एक । इस आत्मा के दो हिस्से कर वह दोनों के शरीर में आधा – आधा हिस्सा डाल देता है और उन्हें दुनिया की भीड़ में धकेल देता है। हर स्त्री – पुरुष धरती पर आकर अपनी आत्मा के अर्धांश की तलाश में भटकता रहता है। वह खुश है । उसकी भटकन खत्म हो गई। उसे आपनी आत्मा का अर्धांश मिल गया।

       घर आकर उसकी कलम से पहली क्वारी कविता फूटी – ऐसा कैसे हो गयामेरी सांसें  / मेरी छाती में लौट कर / किसी और की छाती में जा दुबकी हैं / मेरा लहू / मेरी रगों से बगावत कर / बहने लगा है / किसी और की रगों में / मेरी धड़कन  / किसी और की धड़कन की उंगली पकड़ / उसके दिल में जा दुबकी है / मेरे प्राण / किसी और के प्राणों से जा मिले हैं  / मेरा जीवनअपना इस्तीफा मुझे थमा कर / किसी और के जीवन में शामिल हो गया है / ,,,, ऐसा कैसे हो गया / कैसे हो गया ऐसा !?

      पहले वह नित्य नियम से मंदिर जाता था। मंदिर में जाकर घण्टों ध्यानमग्न मुद्रा में बैठा रहता था। मंदिर में प्रवेश के वक्त जब मंदिर के मुख्यव्दार पर लगे बड़े से पीतल के घण्टे को वह बजाता था तो घण्टे की गूंज उसके हाथ की उंगलियों के पोरो से उतर कर उसके रक्त में शामिल हो जाती। इस गूंज से उसके रक्त में जलवृत से बनने लगते। जब वे उसके ह्रदय – तट को छूते तो उसका वजूद एक विराट वृत्त में बदल जाता।

            और इस वृत्त में वह मां के गर्भ में तैरने वाले शिशु की तरह तैरने लगता, घूमने लगता । उसे लगता , वह  प्रसवित हो रहा है , जन्म ले रहा है। अन्धकार से निकल कर प्रकाश में आ रहा है। नित्य ही ऐसा होता। नित्य वह नया जन्म लेता।

अब यह अवर्चनीय दिव्य अनुभूति उसे देख कर होती है। इसलिए वह मन्दिर न जाकर रोज सुबह उसके घर से कुछ दूर लगे कदंब के वृक्ष के नीचे जा खड़ा होता है। वह रोज घर से निकलती है। कभी सुबह जल्दी । कभी कुछ देर से। जब तक वह घर से बाहर नहीं निकलती , वह कदंब के पेड़ के नीचे खड़ा रहता है। घण्टों । चुपचाप । कदंब उसे हैरानी भरी नज़रों से ताका करता है। कदंब के पत्ते हाथ फैलाये उसके जल्दी से घर से निकलने की दुआ करते रहते हैं । जिस दिन वह देर से घर से निकलती है कदंब की छांव उदास हो जाती है।

वह कहां जाती है , कहां से लौटती है, यह जानने की उसने कभी कोशिश नहीं की। उसने कभी जरूरत ही महसूस नहीं की। हां , उसकी आत्मा के अर्धांश ने उसे बार – बार उकसाया है , उससे मिलने , उससे बात करने के लिए। उसके घर वालों को यह बताने के लिए कि वह उसकी आत्मा का अर्धांश है। इस जन्म में वे उन्हें सम्पूर्ण हो जाने दें। पर ,,, अजीब है इस प्रेम की फितरत । यह अपने प्रिय को ही नहीं , अपने प्रिय से जुड़े हर व्यक्ति को दुख नहीं देना चाहता। यही एहसास उसके पांवों से लिपट कर उसे बेबस कर देता है। इसीलिए उसका होना , उसका घर से निकल कर कदंब के पेड़ करीब से गुजरना भर ही बहुत है। वह अपने पीछे एक ऐसी खुशबू छोड़ जाती है, जो दिन भर उससे लिपटी रहती है और उसके अन्दर अलौकिक  स्फूर्ति और ताजगी भरे रहती है। घर लौट कर वह इस खुशबू को कविता में ढाल लेता है और पवित्र श्लोकोँ की तरह गुनगुनाता रहता है। उसे लगता है , भीतर कोई धुनका कुछ धुन रहा है। एक लयात्मक  गूंज उसके भीतर गूंजती रहती है। एक नरम मुलायम उजलापन रुई के गालों की तरह उसके अन्दर उड़ता रहता है। शुभ्र श्वेत बादल की तरह उसके आकाश पर तैरता रहता है।

इधर कई दिन से वह घर से नहीं निकल रही है। कदंब उदास है। उसकी पत्तियां और छांव उदास है। उसकी छांव तले खड़ा युवक उदास है। उदासी स्थायी स्वर की तरह हर तरफ गूंज रही है। उदासी सोच रही है , क्या हो गया है लड़की को ? कहीं बीमार तो नहीं है ? अगर वह बीमार है तो क्या कर रहा है वह यहां  ? उसे अपनी आत्मा के अर्धांश के पास होना चाहिए ।विषपायी बन कर उसका सारा रोग – शोक हर लेना  चाहिए । लेकिन अगले ही पल उदासी निराशा में    बदल जाती है ,,,, कैसे जा सकता हूं मैं उसके पास ? कौन है वह मेरी ?  कौन सा दुनियावी रिश्ता है मेरा उसके साथ ? रिश्ते वे डोर होते हैं , जिनका कोई न कोई सिरा जमीन से जुड़ा होता है। इस डोर के बिना कोई भी सपना पतंग बन कर उड़ नहीं सकता ।खुली हवा में सांस नहीं ले सकता। इन सारे सवालों का एक ही जवाब है उसके पास – वह मेरी आत्मा का अर्धांश है। एक दूसरे से जुड़ कर ही हम सम्पूर्ण आत्मा बनेंगे । एक ऐसे नक्षत्र में बदलेंगे , जो सूर्य से भी अधिक तेजस्वी व उष्मा और प्रकाश से भरपूर होगा। कोई अट्टहास कर उठता  – उसके भीतर या बाहर , यह वह जान नहीं पाता। लेकिन अट्टहास इतना पैना और खूंखार होता की वह दहल जाता ,,,, ” आत्मा का अर्धांश ! कौन मानेगा तुम्हारी बात ? आत्मा और परमात्मा की बात धर्मग्रंथ करते हैं। लेकिन धर्मग्रंथों की बात अब मानता ही कौन है ? धर्मग्रंथ तो अब सिर्फ़ मोहरा भर होकर रह गये हैं । शक्ति और सत्ता प्राप्त करने का सबसे सशक्त मोहरा। अगर धर्म मोहरा न होता तो दुनिया के सारे अमर प्रेमी इतिहास के पृष्ठों पर नहीं , धरती पर अपना जीवन जी कर गये होते।

        दिन हफ्तों का लिबास पहन कर वक्त के घर दाखिल होते रहे। लड़का भोर होते ही कदंब के नीचे आ खड़ा होता। दिन भर टकटकी लगाये लड़की के घर की ओर देखता रहता और शाम ढलते  ही मायूस हो घर वापस लौट जाता। कदंब उसे समझाता , इस पागलपन से कुछ हासिल नहीं होगा । चांद आसमान की सम्पति है।  आसमान इतना तो उदार हो सकता है कि वह चांद की चांदनी का कुछ   हिस्सा तुम्हें दे दे पर पूरा चांद वह किसी कीमत पर तुम्हें नहीं देगा। लौट जाओ। पढ़े – लिखे हो। कोशिश करोगे तो कोई नौकरी पा जाओगे । जिन्दगी बहुत  उदार है। उसकी शरण में जाओ । वह तुम्हें सब कुछ देगी , जो एक आम आदमी के पास है।

युवक विषण्ण हंसी हंस देता – ” कदंब भाई , लगता है बूढ़े होने लगे हो तुम। यकीन नहीं होता कि तुम्हारी ही छांव तले कनु ने बंसी बजा कर राधा संग रास रचाया होगा। कनुप्रिया के चरण कमलों पर महावर  रचाया होगा।  यमुना में स्नान कर रही गोपियों के वस्त्र चुरा कर तुम्हारी डंगालों पर टांगें होंगे । ,,,, प्रेम तो हमेशा से ही तुम्हारी छाया का तलबगार रहा है। जैसे प्रेम के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं है वैसे आत्मा के बिना शरीर का क्या अर्थ ? बीज के बिना फल का कोई अस्तित्व हो सकता है कभी ? “

आखिर कई सप्ताह बाद लड़की के घर के बाहर चहल पहल नज़र आने लगी। घर से जुड़ी सड़क पर शामियाना तन गया। शामियाने के नीचे से उड़-उड़ कर लजीज पकवानों की सुगन्धें हवा में तैरने लगीं । शाम को रंगीन लिबासों का एक जुलूस लड़की के घर की ओर बढ़ता नज़र आने लगा। जुलूस के दोनों तरफ पंक्तिबध्द  रंगीन रोशनियों की चकाचौंध है। जुलूस के आगे बैण्ड बज रहा है , जिसकी उत्तेजक धुन पर रंगीन लिबास नाच रहे है। करन्सी नोट हवा में उड़ रहे हैं ।

  

अगली सुबह घर के बाहर खड़ी फूलों से सुसज्जित कार पर जेवरों से लदी और रेशमी वस्त्रों में बंधी  औरतों ने रोते – गाते हुए  लड़की को लाकर बैठा दिया। लड़की सुर्ख लाल रेशमी जोड़ा पहने सिर से पांव तक गहनों से लदी हुई है। जैसे वह लड़की नहीं सिर्फ़ एक गहना हो। एक घर के गले से उतार कर दूसरे घर के गले में डाल दिया जाने वाला मात्र एक गहना। कार में उसकी बगल में सिर पर सुनहरी जरी की पगड़ी पहने , फूलों का सेहरा बांधे , कमर में तलवार लटकाए एक सामंत बैठा है। लड़की रो रही है। लड़की का रोना युवक से सहन नहीं हो पा रहा। उसे यूं लग रहा है उसकी छाती धरती है। किसी भी पल फट जायेगी । वह किसी भी पल भरभरा कर ध्वस्त हो जायेगा ।

कार हौले – हौले रेंगती हुई लड़के के सामने से गुजर गई। जब कार कदंब के आगे से गुजरी तो लड़की ने निमिष भर के लिए आंख उठा कर युवक के आंसुओं में डूबे हुए चेहरे की ओर देखा। लड़के ने आंसुओं के परदे के पीछे देखा। उसे लगा , लड़की की बड़ी – बड़ी आंखों में एक उलाहना है ,,,, कितने युगों तक तुम यूं ही कदंब के नीचे खड़े रहोगे  ? कितने जन्मों तक तुम मेरी डोली को यूं ही पराये पुरुष के घर जाने देते रहोगे  ? आगे बढ़ कर रोक क्यों नहीं लेते ? छाती ठोंक कर सबके सामने क्यों कह नहीं देते कि मैं तुम्हारी आत्मा का अर्धांश हूं ? कब तक कायर और क्लीव बन कर तुम मेरी डोली को कन्धा देते रहोगे ? तुम्हीं सोचो कि किसी एक की आत्मा का अर्धांश किसी दूसरे की आत्मा से कैसे जुड़ सकता है ? कब तक खण्डित आत्माओं का प्रेत – स्थल बना रहेगा दाम्पत्य ?

युवक मौन है। उसकी आंखें धारासार बह रही हैं । उसके अन्दर से बस एक ही दुआ निकल रही है – ” प्रभु , मेरी आत्मा का अर्धांश जहां भी रहे , सुखी रहे। उसके सिर का सांईं सलामत रहे। “

उस दिन के बाद कदंब लड़की हो गया। एक पल के लिए भी उससे जुदा नहीं होता। उसी के साथ हंसता – बतियाता है। वहीं जागता और सोता है। और दिन – रात फटी – फटी आंखों से लड़की के घर की ओर ताका करता है।

और एक दिन बाल्मिकी की तरह युवक भी कदंब तले बैठा – बैठा दीमकों की बांबी में तब्दील हो गया। कदंब ने खींझ कर कहा – ” पूरी दुनिया ने अपने आपको बदल लिया है । क्यों प्रेम अपनी प्रकृति  नहीं बदल रहा ? “

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