राहुल कुमार बोयल की 4 कविताएं

राहुल कुमार बोयल
जन्म दिनांक- 23.06.1985
जन्म स्थान- जयपहाड़ी, जिला-झुन्झुनूं( राजस्थान)
सम्प्रति- राजस्व विभाग में कार्मिक
पुस्तक- समय की नदी पर पुल नहीं होता (कविता संग्रह)
            नष्ट नहीं होगा प्रेम ( कविता संग्रह)
मोबाइल नम्बर- 7726060287 
ई मेल पता- rahulzia23@gmail.com
1. अंगुलियों का धर्म
 
मेरे पास तुम्हारी एक अँगूठी है 
इसलिए नहीं कि आभूषण भाते हैं मुझे
बल्कि इसलिए कि
मुझे प्रिय हैं तुम्हारी अँगुलियाँ
 
मुझे प्रिय हैं तुम्हारी अँगुलियाँ
इसलिए नहीं कि तुमसे कुछ चाहिए मुझे
बल्कि इसलिए कि 
गुलेल नहीं थामतीं तुम्हारी अँगुलियाँ
 
गुलेल नहीं थामतीं तुम्हारी अँगुलियाँ 
इसलिए नहीं कि उनमें सामर्थ्य नहीं दाग देने का
पंछियों पर गोल-नुकीले पत्थर 
बल्कि इसलिए कि
तुम जानते हो अच्छे से अँगुलियों का धर्म
 
ये भी विचार नहीं कौंधता 
कि किसी रोज़ गुम हो गयी यह अंगूठी
तो तुम विस्मृत कर दोगे मुझे
न मैं शकुन्तला हूँ न ही तुम शान्तनु
 
दुनिया में पवित्रता तब तक ही बनी रहेगी 
जब तक अंगुलियाँ थामतीं रहेंगी दूसरे की अंगुलियाँ
और 
एक -दूसरे को फाँस लेने के तौर-तरीकों से 
हरहमेश दूर रहेंगी।
 
 
2. तुम प्यार रचना
 
वह पुजारिन जानती है 
किसके भाल पर देनी है 
तिलक की कितनी लम्बाई
तुम उसकी तरह व्यापार मत रचना।
 
उस महाराजिन से मिलते हुए जाना 
जो मन्दिर की पीठ धो रही है
उसकी साड़ी में नहीं खोंसी हुई है रोटी
जबकि वह रसोई से प्रेम करती है।
 
तुम सीढ़ियों पर बैठे भिक्षुक से भी
कोई प्रश्न मत करना, न कोई सलाह देना
समीप जाकर हँसते हुए प्रसाद देना
यह तुम्हारा धर्म है, तुम प्यार रचना ।
 
 
3. नष्ट नहीं होगा प्रेम
 
मेरे बाह्य मौन पर मुझको मृत न पाओ प्रिय 
बहुत कुछ है हृदय में जो मूक नहीं, मौन भी नहीं ।
 
निष्प्राण किञ्चित भी नहीं मेरे भीतर तुम
किसी सम्भ्रान्त की भाँति सभ्य भाषा में बोलते हो 
श्वास-उच्छवास से गर्वित करते रहते हो वक्ष ।
 
नष्ट नहीं होगा प्रेम, कोई कर भी नहीं सकता
व्यर्थ प्रयत्नशील रहती है काया तुम्हारी-मेरी
जबकि विदित है कि नश्वर क्या है,क्या नहीं है ।
 
यही शाश्वत सत्य है प्रेम का कि प्रेम शाश्वत रहता है
मृत्यु की भाँति प्रेम भी तय ही रहता है पहले से 
पंचतत्त्वी गात में निर्बाध बहती चेतना समान ।
 
तुम आओ किसी क्षण, मौन की शक्ति बताता हूँ 
या बुलाओ किसी क्षण, प्रेमवाणी सुनाता हूँ ।
 
 
4. मेरी मृत्यु से पूर्व
 
मुझसे पूर्व ही क्यों चाहती हो मृत्यु ?
जीवन के सैंकड़ों पड़ाव देखने हैं तुम्हें 
तुम उन्मत मत रहना मेरी स्मृतियों में 
स्मृतियाँ करती हैं केवल अन्तस् को रिक्त ।
 
निष्प्राण, निश्चेत मत रहना तुम
विकल्प बहुत हैं जीवन के, जीवन्तता के
परन्तु चुनाव करना चिरायु चेतन
हो जाये मेरी तरह  विलुप्त समयपूर्व
वो आनन्द काम भी क्या आयेगा तुम्हारे ?
 
अश्म हूँ मैं, परन्तु ढह रहा हूँ अब
तुम शिला न होना मेरे पश्चात
मारुत होके होना प्रवाहित जग में
जैसे अब हो, सदैव वैसे ही रहना ।
 
तुम हृदय पर कोई भार न रखना 
पृष्ठ पर, स्कन्द पर ही रखना सब दायित्त्व
विस्मृत कर देना मुझे सम्पूर्ण 
या कर देना समूल नष्ट ताकि
मेरे होने, न होने का औचित्य ही हो समाप्त
और केवल तुम रहो और तुम्हारी जीजिविषा रहे।
 

Leave a Reply