राजेश ‘ललित’ की 8 क्षणिकाएं

बुढ़ापा 

विभिन्न पत्र-पत्रिकओं ‘साहित्य कुंज’अविराम साहित्यिकी’ ‘प्रयास’  एवं ब्लाग्स साहित्यपीडिया,साहित्यनामा,अमर  उजाला हरियाणा प्रदीप,शाश्वत सृजन,आदि में  प्रकाशित रचनायें।

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1.
बुढ़ापा 
बासी कढ़ी में 
उबाल सा
बस सालता
 
2.
मुस्कराता हूँ
पर कभी कभी
पोपली औ’ खोखली हंसी
दो अधरों में फंसी
धुँधलाती यादों  के
बीच उभर जाता
‘अक्स’ तुम्हारा यूँ ही
मुस्कराता मैं फिर भी
 
3.
अब हमें बागों में
जाने की आदत न रही
फूल महकते होंगे बेशक
तो महकने दो उनको
बस गुज़र जाया करो
जब भी तब भी
महक जाये है ज़र्रा ज़र्रा
खूश्बुओं को 
 
4.
अब तुम कुछ भी कहो 
तुम्हारी  अनकही
ने जो कहा
वो कभी  किसी ने नहीं कहा।
 
5.
एक दीमक लगी किताब
सजिल्द थी
पीले पन्ने थे
सुर्ख़ सूखे गुलाब 
हवा के साथ
फटके पन्ने
यूँ लगता है
उसकी उम्र 
मेरी जितनी ही थी।
 
6.
आरंभ से अंत
जन्म से मृत्यु पर्यंत
इस जीवन का
इस जग से 
बस इतना ही
जीवन संबंध
 
7.
क्या अजब बात रही!
खुद ने खुद से
सवाल किये
फिर खुद ही
सवालों से
बचता रहा?
 
8.
मेरी मन  की
परतें बहुत सी
एक परत तुम्हारी भी
रोज़ तह खोलता हूँ
बंद करता हूँ
तुम्हें सहेजना
अच्छा लगता है।

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