हिन्दी में एक आंदोलन की ज़रूरत: रमेश उपाध्याय

हिन्दी साहित्य में एक आंदोलन की ज़रूरत

रमेश उपाध्याय

जन्म  : 1 मार्च 1942

शिक्षा : एमए, पीएचडी

कार्य : एक दशक तक पत्रकार  रहने के बाद तीन दशकों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन। साहित्य और संस्कृति की पत्रिका ‘कथन’ के साथ-साथ ‘आज के सवाल’ नामक पुस्तक श्रृंखला का संपादन।

संप्रति : स्वतंत्र लेखन।

प्रकाशित कृतियां

कहानी संग्रह : जमी हुई झील (1969), शेष इतिहास (1973), नदी के साथ (1976), चतुर्दिक (1980), बदलाव से पहले (1981), पैदल अंधेरे में (1981), राष्ट्रीय राजमार्ग (1984), किसी देश के किसी शहर में (1987, नवीन संस्करण 2015), कहां हो प्यारेलाल! (1991), चर्चित कहानियां (1995), अर्थतंत्र तथा अन्य कहानियां (1996), दस प्रतिनिधि कहानियां (2003), डॉक्यूड्रामा तथा अन्य कहानियां (2006),  एक घर की डायरी (2009), साथ चलता शहर (2012),  त्रासदी…माई फुट! (2013), पुराने जूतों की जोड़ी (2015), कहीं ज़मीन नहीं (2016), पानी की लकीर (2018) 

उपन्यास : चक्रबद्ध (1967), दंडद्वीप (1970, पुनर्लिखित नवीन संस्करण 2009), स्वप्नजीवी (1971), हरे फूल की खुशबू (1991)

नाटक : सफाई चालू है (1974), पेपरवेट (1981), बच्चों की अदालत (1981), भारत भाग्य विधाता (1990), हाथी डोले गाम गाम (2009)

नुक्कड़ नाटक : गिरगिट, हरिजन-दहन, राजा की रसोई, हिंसा परमो धर्म:, ब्रह्म का स्वांग, समर-यात्रा, मधुआ, तमाशा।

आलोचना : कम्युनिस्ट नैतिकता (1974), हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकार (1996), आज का पूंजीवाद और उसका उत्तर-आधुनिकतावाद (1999), कहानी की समाजशास्त्रीय समीक्षा (1999), मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा (2017)

साहित्यिक इतिहास : जनवादी कहानी : पृष्ठभूमि से पुनर्विचार तक (2000)

साक्षात्कार : बेहतर दुनिया की तलाश में (2007)

निबंध : साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ (2008), भूमंडलीय यथार्थ की पृष्ठभूमि (2014)

विनिबंध : भीष्म साहनी (साहित्य अकादमी द्वारा ‘भारतीय साहित्य के निर्माता’ के अन्तर्गत प्रकाशित, 2015)

आत्मकथात्मक और साहित्यिक विमर्श : मेरा  मुझ में कुछ नहीं (2013), अपनी बात अपनों के साथ (2019)

अनुवाद (अंग्रेजी से) : जनता का नया साहित्य (1983), कला की जरूरत (1990), उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्र (1996), सुभाष चन्द्र बोस :  एक जीवनी (1998),

अनुवाद (गुजराती से ) : सोनल छाया (1968), कंचुकीबंध(1969), गुजराती कहानियां (1975), धूपछांह (1976), समकालीन गुजराती कहानियां (1995)

सम्मान और पुरस्कार : केंद्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा का गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान। ‘नदी के साथ’ पर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ का सम्मान, हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा ‘किसी देश के किसी शहर में’ और ‘डॉक्यूड्रामा तथा अन्य कहानियां’ सम्मानित। ‘कथन’ के संपादन के लिए वनमाली साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान, हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा 2016-17 का गद्य विधा सम्मान।

संपर्क : 107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली -110063    

मोबाइल : 9818244708

ई-मेल : behtarduniya@gmail.com

ब्लॉग : https://behtarduniyakitalaash.blogspot.com/

सत्येंद्र : रमेश जी, आपने बहुत लिखा है। कहानियां, उपन्यास, आलोचना,जनवादी कहानी का इतिहास भी आपने लिखा है, समाज शास्त्रीय विश्लेषण भी किया है, अभी ‘परिकथा में आपका  स्तम्भ भी शुरू हुआ है। कैसे लिख लेते हैं आप इतना?

रमेश उपाध्याय : देखिए सत्येंद्र जी, लेखक का काम लिखना होता है। वही उसका जीवन है। वही उसका सबकुछ है। लेखक लिखेगा नहीं तो करेगा क्या–सबसे बड़ी बात ये है। मैं ये नहीं सोचता कि कम लिख रहा हूं या ज़्यादा लिख रहा हूं। ऐसे कहने वाले भी हैं कि अधिक लिखना लेखन की बेहतरी के हिसाब से अच्छा नहीं होता, कम लिखना चाहिए, कम लिखने से ज़्यादा अच्छी रचनाएं आती हैं। मैं इसे नहीं मानता। मैं ये देखता हूं कि इस समय क्या लिखना जरूरी है और उसे किस विधा में लिखना ज्यादा अच्छा रहेगा। मैं विधाओं को बंधन नहीं मानता कि कवि हूं तो कविता ही लिखनी है, कहानीकार हूं तो कहानी ही लिखनी है। मैं स्वतंत्र रहना चाहता हूं कि जब जिस विधा में लिखना हो या मुझे सुविधा प्रतीत हो कि ये बात जो है इस विधा में ज़्यादा अच्छे ढंग से कही जा सकती है तो मैं उसे अपना माध्यम बनाता हूं क्योंकि मुझे ज़्यादा से ज़्यादा आज़ादी चाहिए और विधाएं मुझे ये आज़ादी देती हैं। तो एक विधा में बंधकर आप अपनी बात नहीं कह सकते। जो आपने ‘परिकथा’ के स्तम्भ की चर्चा की, वो एक गंभीर विषय पर है, अब आप उसको कहानी में या उपन्यास में तो नहीं कह सकते। इसके लिए तो आपको निबंध की विधा ही अपनानी पड़ेगी। और निबंध की विधा में ये है कि आप कई तरह से कह सकते हैं। निबंध मतलब हास्य, व्यंग्यात्मक हो सकता है, गंभीर चिंतनपरक हो सकता है या सूचनापरक हो सकता है। आपको जो साधन मिले हुए हैं विधाओं के रूप में, ये बहुत परंपरा से चली आ रही देन है, जो हमको मिली है। ये हमने अर्जित नहीं की है। ये हमारे पूर्वजों ने हमको दिया है कि ये कहानी है, ये उपन्यास है। हमको ये चीज़ें मिली हैं विरासत में। हम उनका उपयोग करते हैं। अब ये हमारे ऊपर है कि हम उनका कितना बेहतर उपयोग करते हैं। कितने अच्छे ढंग से करते हैं और कितने अच्छे उद्देश्य के लिए करते हैं। मैं समझता हूं कि मुख्य बात यही है।

सत्येंद्र : क्या लिखना चाहिए—यह कैसे तय करते हैं आप?

रमेश उपाध्याय : मैं जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखता हूं मतलब आज़ादी, बराबरी, भाईचारा। जब मुझे लगता है कि इन पर कोई संकट है तो मुझे लगता है कि मेरे ऊपर भी वो खतरा है, क्योंकि मैं इन चीजों में विश्वास रखता हूं। तो मेरी आज़ादी भी खतरे में पड़ती है। मेरी जो बराबरी की भावना है, भाईचारे की भावना है, उस पर भी खतरे हैं,  तो ये चीज़ें मुझे सबसे अधिक प्रेरित करती हैं। दूसरा, मनुष्य के दुख की बात कहीं आती है तो वहां भी मैं यह सोचता हूं कि यह क्यों है और कैसे इसे समाप्त किया जा सकता है । यही मेरे लेखन के सरोकार हैं। आप इन्हें सामाजिक सरोकार कह सकते हैं। तो यही मुझे प्रेरित करते हैं। मैं यथार्थवादी  कहता हूं अपने आपको  लेकिन यथार्थवादी होने का मतलब यह नहीं है आप कि यथार्थ को ऐज इट इज लिख डालें। मैं यह देखता हूं कि यथार्थ में क्या हो रहा है और उसमें से किस चीज़ को मुझे ज़्यादा महत्व देना चाहिए।

सत्येंद्र : आज के दौर में, जबकि समाज में नफ़रत का एक उबाल आया हुआ है, ऐसे में रचनाकार की क्या भूमिका है? क्या आपको लगता है  कि रचना में इसका विरोध या इस तरह की कोई चीज़ आ रही है?

रमेश उपाध्याय :  देखिए, मैं ये मानता हूं कि रचनाकार कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं होता।  रचनाकार जो कुछ करता है, अपनी रचना के माध्यम से ही करता है और वो एक प्रत्यक्ष माध्यम नहीं है,  मतलब वह डाइरेक्ट एक्शन या इंटरवेंशन नहीं करता। रचना परोक्ष में काम करने वाली चीज़ है। मतलब, समाज को हम सीधे-सीधे प्रभावित नहीं करते। समाज से हम जो कहते हैं वो भी घुमाफिराकर। कलात्मक कह लें उसे या साहित्यिक भाषा में कहा  हुआ कह लें। मतलब हम साहित्यकार सीधे-सीधे राजनीतिक बात नहीं कहते। पत्रकार की बात अलग है। उसका काम तो यह है कि जो घटना घटी है, उस पर तत्काल प्रतिक्रिया करनी है। और पहले से तय है कि उसके पक्ष या विपक्ष में ये बोलना है या नहीं बोलना है। साहित्यकार के साथ ऐसा नहीं होता। साहित्यकार के सामने जो यथार्थ है, उसमें से सबसे पहला काम होता है  चुनना। आप हर चीज़ तो नहीं लिख सकते। समाज का यथार्थ इतना बड़ा है, इतनी सारी चीज़ें हैं, एक साथ घटित हो रही हैं, हमारे समाज में, देश में, दुनिया में और उन सब चीज़ों से हम प्रभावित होते हैं,  लेकिन लिखने की जो प्रेरणा होती है, वो किसी एक ख़ास चीज़ से मिलती है, जो आपको सबसे ज़्यादा उद्वेलित करे,  सबसे ज्यादा परेशान करे कि मैं जो हूं ये नहीं देखना चाहता। मेरे समाज में ये नहीं होना चाहिए। अब जैसे लिंचिंग है। लिंचिंग तरह-तरह की हो रही है। धर्म के नाम पर हो रही है, कहीं जाति के नाम पर हो रही है, कहीं चोरी के नाम पर हो रही है। चोर को पकड़ कर आप पुलिस के हवाले कीजिए। पुलिस देखेगी। कानून व व्यवस्था का मामला है लेकिन आप स्वयं फैसला करने वाले कौन हैं और फैसला भी ऐसा कि पीट-पीट कर मार ही डालें। ये तो बहुत ही नृशंस काम है न। लिंचिंग जैसी घटनाओं से मैं बहुत उद्वेलित हूं। हालांकि मैंने इस पर अभी कोई कहानी लिखी नहीं है,  लेकिन हो सकता है कभी लिखूं। कहानियां तत्काल नहीं लिखी जातीं। अनुभव अन्दर जमा होते रहते हैं। उनकी कहानी कब लिखी जाएगी, कह नहीं सकते।

सत्येंद्र : संचार के तमाम माध्यम हो गए हैं जैसे कि सोशल मीडिया। साहित्यकार रचनाओं के अलावा भी अपनी तमाम बातें वहां रख रहे हैं, इसको आप किस तरह देखते हैं?

रमेश उपाध्याय : देखिए, मैं तो सारे माध्यमों से जुड़ा रहा हूं। पहले दस साल मैं पत्रकारिता में था। विश्वविद्यालय में पढ़ाने से पहले। दैनिक पत्रों में तो नहीं रहा लेकिन साप्ताहिक और मासिक पत्र-पत्रिकाओं में मैंने काम किया। जैसे साप्ताहिक हिन्दुस्तान में था, सरिता-मुक्ता जो पाक्षिक पत्रिकाएं हैं, उनमें था। एक शंकर्स वीकली निकलती थी, उसमें था, फिर नवनीत, हिन्दी डाइजेस्ट उसमें था—इनमें उपसंपादक, साहित्य संपादक की भूमिका में मैंने काम किया। तो पत्रकारिता का अनुभव तो मेरा है ही, साथ साथ रेडियो-टीवी के लिए लिखने का अनुभव भी मेरा खूब रहा। रेडियो के लिए नाटक लिखना शुरू किया, फिर टीवी के लिए भी नाटक लिखे। फिर उनमें जो साहित्यिक परिचर्चाएं होती हैं, उनमें भी खूब भाग लिया। मेरे मित्र थे कुबेर दत्त, जो टीवी में थे। एक बार उन्होंने मुझे काका हाथरसी जैसे धाकड़ कवियों के साथ मुझे हास्य कविता पढ़ने के लिए बुला लिया। मैंने कहा कि मैं कहां हास्य कविता लिखता हूं?  और आप ऐसे हास्य कवियों के बीच में बुला रहे हैं, तो मैं उसमें आकर क्या करूंगा? तो कुबेर दत्त कहने लगे कि नहीं भाई साहब, मैंने तो आपका नाम भेज दिया है और अब आपको आना है। तब मैंने सिर्फ़ उसी कार्यक्रम के लिए एक हास्य कविता लिखी और वहां पढ़ी। वह सराही भी गई, यह अलग बात है। तो इस तरह के काम मैंने बहुत किए।

सत्येंद्र : आपने बच्चों  के लिए भी लिखा है?

रमेश उपाध्याय : बच्चों के लिए खूब लिखा है। बच्चों के लिए रेडियो नाटक लिखे हैं। बच्चों के लिए ऐसे नाटक भी लिखे हैं, जो मेरी बेटियों ने किए। और स्कूलों में तो बहुत हुए। कई सारे नाटक हैं। फिर नुक्कड़ नाटक मैंने लिखे हैं। मंचीय नाटक तो हैं ही। नुक्कड़ नाटकों और मंचीय नाटकों के लिए मैंने खूब काम किया है। इन सभी माध्यमों का उपयोग करते रहने की वजह से मुझे  पता है कि इन सबकी उपयोगिता है। इसलिए आप देखते होंगे कि फेसबुक पर मैं बहुत आसानी से काम कर लेता हूं। हालांकि लिखता एक ही पोस्ट हूं, मैं ज़्यादा नहीं लिखता लेकिन मुझे अच्छा लगता है। नए लोगों से जुड़ना, नए लोगों से संवाद करना और नई नई चीज़ें उनसे सीखना। सीखते भी तो हैं न आप।

सत्येंद्र : आपने यथार्थवाद की बात की। भूमंडलीय यथार्थवाद की बात भी आप कहते हैं। यथार्थवाद और प्रतिरोध साथ चलने वाली चीजें हैं। आज का जो माहौल है, क्या आपको लगता है कि जिस स्तर का प्रतिरोध होना चाहिए, वह है?

रमेश उपाध्याय :  देखिए, मैं तो समझता हूं कि लिखना अपने आप में एक प्रतिरोध है, अगर आपका लेखन सही मायने में लेखन है तो। बहुत सारी चीज़ें लिखी जाती हैं यों लिखने को, लेकिन अगर वास्तव में आप जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ लिख रहे हैं तो आप प्रतिपक्ष की भूमिका में ही हैं। प्रतिपक्ष का मतलब राजनीतिक प्रतिपक्ष नहीं, केवल सत्ता के विरुद्ध लिख रहे हैं, वो नहीं। मसलन आप बुराई के खिलाफ अच्छाई के पक्ष में हैं,  हमेशा रहते हैं, जब आप लिखते हैं, एक तरह से आप प्रतिपक्ष की भूमिका में ही रहते हैं। आपको अपनी बात कहनी है, समाज में जो दिखाई दे रहा है, वो आपको उचित नहीं लग रहा है और उचित क्या होना चाहिए ये आप कहना चाहते हैं। तो सीधे-सीधे तो नहीं बताते आप कि ऐसा नहीं होना चाहिए,वैसा होना चाहिए। हम इशारों में बताते हैं कि ये चीज़ें हो रही हैं, अगर ये चीज़ें न होतीं या इनकी जगह ऐसा होता तो अच्छा होता। पाठक इतना समझदार है कि उन इशारों को अच्छी तरह समझ लेता है। उसको बताने की जरूरत नहीं पड़ती कि आप ऐसा कीजिए, वैसा कीजिए। जब हम लिखते हैं, तो उसमें से वो अपना अर्थ निकाल लेता है कि हां, ये चीज़ सही है, ये चीज़ गलत है। तो प्रतिपक्ष की भूमिका तो हमेशा है। पर ये जरूर है कि प्रतिपक्ष भी दो तरह के होते हैं। एक वो कि जहां आप, जो नया आ रहा है,  हमेशा उसके विरोध में होते हैं कि ‘अरे ये नया सब बहुत खराब है। पहले का ज़माना अच्छा था।’ बहुत से लोग आपको ऐसा कहते हुए मिल जाएंगे कि इससे तो अंग्रेजों का राज ही अच्छा था। आज़ादी ने आ के सब खराब कर दिया। आज़ादी, डेमोक्रेसी इन चीज़ों ने सब नष्ट कर दिया। कुछ लोग तो यह भी कहेंगे कि पुराना ज़माना ही अच्छा था। जबकि वो ज़माने कब के बीत चुके और कभी वापस नहीं आ सकते, वो चाहें कितने भी अच्छे रहे हों, हालांकि पुराने ज़माने अच्छे थे नहीं। स्वर्ण युग अतीत में नहीं रहा, स्वर्ण युग होगा तो भविष्य में होगा। लेकिन वो ये मानते हैं कि पहले सब कुछ अच्छा था, धीरे-धीरे पतन हो गया और सब कुछ नष्ट हो गया। ऐसे लेखक भी हैं। यह भी प्रतिपक्ष ही है, मगर नए के खिलाफ। नई पीढ़ी को कुछ नहीं आता—इस तरह की भावना कई लेखकों में मिल जाएगी आपको । नई पीढ़ी खराब है, नए लोग खराब हैं। मैं इस प्रतिपक्ष के भी प्रतिपक्ष में हूं। परंपरा तो अच्छी चीज़ है। परंपरा का विकास होता है, विकास से हम जरा आगे बढ़ते हैं, समाज को आगे बढ़ाते हैं। लेकिन रूढ़िवाद? परंपरा और रूढ़ि में फ़र्क है। रूढ़िवाद गलत है। परंपरा का होना तो ठीक है, वो एक जीवन्त चीज़ है लेकिन रूढ़ि तो मृत है और पीछे ले जाती है, लेकिन पीछे रास्ता है नहीं, पीछे आप जा नहीं सकते, तो फिर क्या करेंगे? आप जहां हैं, वहीं रूके रहेंगे। लेकिन जब पानी एक जगह रूका रहता है तो सड़ जाता है। तो ये सड़न समाज में रूढ़िवाद के कारण आती है। मैं रूढ़िवाद के भी खिलाफ हूं।

सत्येंद्र :रूढ़िवाद का विरोध आपकी कहानियों में दिखता है। बहुत पहले लिखी  गई कहानियों में भी जैसे माटीमिली, उसमें रधिया जो चरित्र है, उसकी जो बग़ावत है पूरे गांव के साथ। फिर एक कहानी है अविज्ञापित। उसमें भी नायिका रूढ़ियों को तोड़ती नज़र आती है।

रमेश उपाध्याय : हां, मेरी इन दोनों कहानियों में रूढ़िवाद का विरोध है।

सत्येंद्र :जो धारा समाज को बांट रही है, उस धारा के समर्थन में भी हाल में बहुत सारे साहित्यकार खड़े नज़र आए। चुनाव के दौरान बयान जारी कर वोट देने की अपील की गई। इस तरह की प्रवृत्ति को आप किस तरह देखते है?

रमेश उपाध्याय : देखिए ,ये पहले भी हुआ है। कोई नई चीज़ नहीं है। एक बार पहले भी हुआ था, जब चुनाव हो रहे थे, तब कुछ लोगों ने बयान दिया था और फिर उसके विरुद्ध दूसरे लोगों ने बयान दिया। वैसे ही इस बार भी हुआ। लेकिन मेरी इसमें कोई रुचि नहीं है। विरोध होना चाहिए, लेकिन विरोध का यही तरीका हो, यह जरूरी नहीं है क्योंकि इस तरीके से होता ये है कि आप उनको एक मौका और दे देते हैं, जिनका विरोध आप कर रहे हैं। उसमें संख्या बल दिखता है। आपकी तरफ 49 हैं तो उनकी तरफ 70 हैं। ये कोई बेहतर तरीका नहीं है। बेहतर तरीका ये है कि जो जहां है, वहां ही कुछ ऐसा करे, जो समाज को प्रभावित करे। वो कहते हैं न कि सत्ता से मुखातिब होकर अपना विरोध प्रकट करना, तो सत्ता से मुखातिब होने का मतलब ये नहीं है कि किसी सत्ताधारी के विरुद्ध हम बयानबाजी करें। एक लेखक का, एक कलाकार का काम जो है, अपने क्षेत्र का काम है। जैसे आपने फिल्म ‘आर्टिकल15’ देखी होगी उसमें फिल्म के माध्यम का सार्थक और बढ़िया उपयोग किया गया है। उतनी ही देर में, उसी माध्यम से, उतने ही साधनों से एक ऐसी फिल्म बना दी, जो सत्ता से सीधे बात करती है। समाज से सीधे बात करती है। बिना डरे, लेकिन बयानबाजी किये  बिना, अपने क्षेत्र में रहकर, अपने माध्यम से। तो मैं समझता हूं कि ये काम ज्यादा जरूरी है। ज्यादा स्थायी है।

सत्येंद्र: ‘आर्टिकल 15 देखकर एक सवाल उठता है कि एक फिल्मकार जिस हिम्मत के साथ अपनी बात कह पा रहा है, क्या एक  साहित्यकार कह पा रहा है?

रमेश उपाध्याय : साहित्यकार भी कह रहे हैं। देखिए, साहित्यकार के साथ लोगों तक पहुंचने की दिक्कत है। फिल्म जो है, इतना लोकप्रिय माध्यम है कि जगह जगह पहुंच जाता है। अब साहित्यकार के साथ दिक्कत क्या है कि एक कहानी लिखेगा वो, एक पत्रिका में छपेगी, हजार दो हजार लोग पढ़ेंगे अधिक से अधिक, वरना सौ दो सौ, या हो सकता है, इससे भी कम पढ़ते हों। कितने लोगो  तक पहुंचती है और  कितने लोग पढ़ते हैं?

सत्येंद्र: तो पाठकीयता का संकट तो है?  अगर पाठक तक नहीं पहुंच रहे हैं तो फिर तो सब व्यर्थ हैं न? ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचने के लिए लेखक को करना क्या चाहिए?

रमेश उपाध्याय : देखिए मैं तो दोनों तरह की स्थितियों में रहा हूं। मैं उन पत्र-पत्रिकाओं में भी छपा हूं जो बहुत दूर दूर तक  जाती थीं। कहा जाता है कि ‘धर्मयुग’ ढाई लाख छपती थी। ढाई लाख बड़ी संख्या होती है। ‘सारिका’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘कादम्बिनी’ आदि भी बड़ी प्रसार संख्या वाली पत्रिकाएं थीं।  इन पत्रिकाओं में मैं खूब छपा हूं। लेकिन फिर मैंने देखा कि इनमें  शायद हम वो बातें नहीं कह पा रहे हैं , जो हमें कहनी चाहिए और वह बातें हम कह पाते हैं लघु पत्रिकाओं में। प्रसार संख्या सीमित है उनकी, वो कम लोगों तक पहुंचती हैं, लेकिन उनका प्रभाव ज्यादा होता है। उन कहानियों को जो, सारिका में, धर्मयुग में, साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपी थीं, उनको अब कोई याद नहीं करता लेकिन 25-30 साल पहले लघु पत्रिकाओं में छपी कहानियां आज भी याद की जाती हैं। जैसे माटीमिली का जिक्र किया आपने, माटीमिली किसी बड़ी पत्रिका में नहीं छपी थी, छोटी पत्रिका में छपी थी, लेकिन उसको बार-बार पढ़ते हैं लोग। इस तरह से देखें तो पाठक मल्टीप्लाई होता है समय के साथ। ये नहीं कि उसी समय छपा और उसी समय आप हिसाब लगा लें कि ये 500 छपने वाली पत्रिका में छपी तो 500 लोगों तक पहुंचेगी। नहीं, साहित्य में ऐसे नहीं होता। जैसे एक पुरानी मिसाल दें –गुलशन नन्दा और प्रेमचन्द। प्रेमचन्द अपने समय में कितने लोगों तक पहुंचते होंगे? गुलशन नन्दा उनसे कहीं ज्यादा पहुंचते होंगे। लेकिन प्रेमचन्द कितनी पीढ़ी दर पीढ़ी अभी तक पढ़े जा रहे हैं, गुलशन नन्दा को पढ़ता है कोई? नहीं पढ़ता न। तो पाठकों तक पहुंचने का जो साहित्य का तरीका है, वो अप्रत्यक्ष और दूरगामी है और देर तक उसका  प्रभाव पड़ता है। तो देर तक और दूर तक पड़ने वाले प्रभाव के अनुसार अगर आप साहित्य को देखें तो फिर आपको लगेगा कि संख्या बहुत मायने नहीं रखती। संख्या के साथ साथ समय और समाज में उसकी पैठ कहां तक होती है, कितनी दूर तक होती है, यह भी देखना चाहिए।

सत्येंद्र: आज संचार के इतने माध्यम आ गए हैं कि लेखक सीधे पाठकों तक पहुंच सकता है। अपनी रचनाओं के बारे में पाठकों को बता सकता है लेकिन बहुत सारे लेखक इस बात को लेकर झिझकते हैं कि अपनी रचना या किताब का प्रचार कैसे करें। क्या इस सोच में बदलाव की जरूरत नहीं है?

रमेश उपाध्याय : बदलाव केवल लेखक के सोचने से नहीं आएगा। लेखक का काम लिखना है, उसके लिखे को पाठकों तक पहुंचाने का काम दूसरों का है। ये काम पहले प्रकाशकों का होता था, माध्यमों का होता था, रेडियो का, टीवी का, रंगमंच का। साहित्य पाठकों तक इन्हीं माध्यमों से पहुंचता है। लेकिन ये माध्यम लेखक तो नहीं बनाता, दूसरे लोग बनाते हैं। और उन लोगों की ये जिम्मेदारी होती है कि वे साहित्य को पाठकों तक  पहुंचाएं। आज ये दिक्कत हो गई है कि आप ये अपेक्षा करते हैं कि लेखक ही सब कुछ करे। लेखक कहानी भी लिखे, लेखक अपनी कहानी का प्रचार भी करे और सोशल मीडिया पर भी ले जाय।  ये सब नहीं हो सकता। कुछ लोगों के लिए संभव हो सकता है। कुछ लोग  कर लेते हैं, लेकिन सबके लिए ये संभव नहीं होता। अगर आप इसी में लग गए तो फिर आप लिखेंगे कब? मसलन, मेरी पुस्तकों के प्रकाशन का काम मेरे बच्चों ने शुरू किया है और वह ठीक चल रहा है लेकिन यह काम मैं तो नहीं कर सकता। मैं लिखकर दे सकता हूं कि लो भाई, ये छापना चाहो तो छाप दो। लेकिन अगर मैं स्वयं उसमें लग जाऊंगा तो लिखूंगा कब?

सत्येंद्र: लेकिन आपको नहीं लगता कि संकट पाठकीयता का है? लघु पत्रिकाएँ कितनी बिकती हैं? तो संकट है न?

रमेश उपाध्याय : संकट तो है लेकिन संकट को आप बिल्कुल संख्या के बल से मत देखिए। संख्या के बल से देखेंगे तो मुश्किल होगी। वही बात जो मैं अभी कह रहा था। कौन सी कहानी, किस पत्रिका में छपी, कितने लोगों तक पहुंची उससे यह तय नहीं होगा कि वह कहानी पाठकों तक पहुंची या नहीं पहुंची। उसमें समय लगता है। जैसे मैंने उदाहरण दिया कि पीढ़ी दर पीढ़ी या कई वर्षों तक कई लोगों तक पहुंच सकती है। तो उसकी चिन्ता एक तरह से नहीं करनी है। हमारी चिन्ता और है। चिन्ता ये है कि हम किस भाषा में लिखते हैं, उस भाषा के प्रति हमारा जो रवैया है, हमारे समाज का रवैया – वो ऐसा नहीं है जो लेखकों को, लेखन को प्रोत्साहित करे। उसे हतोत्साहित करने वाला है। बांग्ला हो, मराठी हो, मलयालम हो, कन्नड़ हो , तमिल हो तेलुगु हो, यहां तक कि पंजाबी तक मैं जानता हूं, तो उन लोगों को अपनी भाषाओं पर गर्व है। अपनी भाषा को वो सीखते हैं, अपनी भाषा के साहित्य को प्यार करते हैं। हिन्दी में ऐसा कम है। बिल्कुल नहीं है, ऐसा मैं नहीं कहता। है, लेकिन कम है। उसकी वजहें क्या है कि हिन्दी शिक्षण जो है—प्राइमरी स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक बहुत ही गड़बड़ है। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाता रहा हूं। मेरी दोनों बेटियां संज्ञा, प्रज्ञा भी दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाती हैं लेकिन हम तीनों का अनुभव है कि बीए और एमए के छात्रों को स्कूल में कुछ सिखाया ही नहीं गया। हिन्दी साहित्य में बीए एमए करने आए हैं लेकिन उनको न भाषा की तमीज है, न साहित्य की। इसके  लिए कौन जिम्मेदार है? दूसरी बात ये है कि अंग्रेजी को नौकरी से, जीवन पद्धति से जोड़ दिया गया है, इसलिए लोग ये सोचते हैं कि हिन्दी पढ़ कर क्या होगा। दूसरी भाषओं के साथ भी हुआ है। ऐसा नहीं है कि केवल हिन्दी के साथ हुआ है।  अंग्रेजी पढ़ता है बच्चा तो केवल अंग्रेजी ही पढ़ता है,  और अंग्रेजी में भी साहित्य कम पढ़ता है। जब आपकी साहित्य में रुचि ही नहीं है तो अंग्रेजी हो या हिन्दी, क्या फर्क पड़ता है। तो संकट की जड़ें कहीं और हैं। समाजशास्त्रीय ढंग से इसे समझना होगा और राजनीतिक ढंग से इसका समाधान करना होगा।

सत्येंद्र: कहानी पर लौटते हैं। आज हिन्दी  कहानी में  कोई आंदोलन  नहीं है। सब अपनी अपनी धाराओं में लिख रहे हैं लेकिन कहीं कोई आंदोलन नहीं। इसकी क्या वजह है?

रमेश उपाध्याय : देखिए, मैं ऐसा मानता हूं कि  साहित्यिक आंदोलन समाज के आंदोलनों से कहीं न कहीं प्रेरित होता है। जैसे हिन्दी  साहित्य में हमारा सबसे पुराना, सबसे बड़ा, सर्वश्रेष्ठ आंदोलन भक्ति आंदोलन है। भक्ति आंदोलन केवल साहित्यकारों के कारण पैदा नहीं हुआ। सूर, कबीर, तुलसी, मीरा वगैरह इन लोगों ने पैदा नहीं किया। उस समय समाज में कुछ ऐसी चीजें चल रही थीं, जो सामन्तवाद के खिलाफ थीं। उस समय ये बात हो रही थी कि भक्ति पंडितों के ही काम की चीज नहीं है। भक्ति रैदास चमार भी कर सकता है, कबीर जुलाहा भी कर सकता है, और मीरा जो एक स्त्री है  सामन्ती समाज की, वो भी कर सकती है। तो ये जो चेतना है कि कवि ब्राह्मण तुलसीदास ही नहीं, दूसरे भी हो सकते हैं, जो नीचे के तबके हैं,  जो उपेक्षित हैं, जो दलित हैं, वो भी कवि हैं,  इस चेतना की वजह से भक्ति आंदोलन हुआ। आप भक्ति आंदोलन में देखिए, कितनी विविधता है। उसमें सगुणवाद भी है, निर्गुणवाद भी है, राम भक्ति भी है, कृष्ण भक्ति भी है,  और चीज़ें भी हैं। ये सब जो है, ये सामाजिक आंदोलन की ही देन है। उसी तरह से आप देखिए प्रेमचन्द, निराला और मुक्तिबोध– ये सब कहां से पैदा हुए। हवा में से तो नहीं पैदा हुए। ये देन हैं हमारे स्वाधीनता आंदोलन की। आप देखिए, रवींद्र नाथ ठाकुर हों या दूसरे लोग हों, ये सब उसी आन्दोलन की देन हैं। सब इस देश की आज़ादी चाहते हैं और सोचते हैं कि इस आंदोलन में हमारा क्या योगदान हो सकता है, वो चाहें मैथिलीशरण गुप्त रहे हों या भारतेंदु हरिश्चंद्र से शुरू कर लें आप, तो आप देखेंगे कि वहां स्वाधीनता आंदोलन की जो चेतना है, वो लगातार प्रगतिवाद,  छायावाद, और नई कविता  तक चली आती है। आज़ादी के बाद इसमें व्यवधान आता है। आज़ादी के बाद वो आन्दोलन  खत्म हो गया तो फिर चीज़ें भी दूसरी हो गईं। कभी अस्तित्ववाद आ गया तो कभी और चीजें आ गईं। फिर उसके बाद इधर बाज़ारवाद आया और उसके साथ साथ उत्तरआधुनिकतावाद आया। उत्तरआधुनिकतावाद के आने से पहले, यानि बीसवीं सदी के आखिरी दशक से, यहां उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई । इसी दौर में उत्तरआधुनिकतावाद एक नई चीज़ लेकर आता है, जिसको कहते हैं विमर्श। विमर्श को अंग्रेजी में कहते हैं डिस्कोर्स। डिस्कोर्स भाषा विज्ञान का शब्द है। उसमें क्या है कि आपके बोलने की जो विधि है,  जो  तरीका है, उस पर लोग ध्यान देते हैं कि एक स्त्री कैसे बोलती है, एक दलित कैसे बोलता है। भाषाविज्ञानी  मानता है कि ये एक अलग चीज़ है ख़ास चीज़ है। उत्तरआधुनिकतावाद ने इसको भाषा विज्ञान से लाकर साहित्य में घुसेड़ दिया। उस समय हमारे साहित्य में 2 आंदोलन चल रहे थे-स्त्री आन्दोलन और दलित आंदोलन।  ये दो मुख्य आंदोलन थे, जो आज़ादी के बाद हमारे साहित्य में आए और बहुत प्रमुखता से आए। इनका जोर किस बात पर था? स्त्री आंदोलन का जोर था कि जो पैट्रियार्की है, पितृ सत्ता है, सामन्तवाद है, पुरुष वर्चस्व है, मर्दवाद है– उससे मुक्ति। दलितों का विद्रोह  ब्राह्मणवाद के खिलाफ था, जातिवाद के खिलाफ था। उसका उद्देश्य था कि दलितों को सामाजिक अत्याचार से मुक्ति मिले, सामाजिक न्याय मिले। ये दोनों हमारे  साहित्य के बड़े आन्दोलन थे, लेकिन हुआ क्या? जब  विमर्श की बात आई तो दलित आंदोलन दलित विमर्श हो गया, स्त्री आंदोलन स्त्री विमर्श हो गया। और उसका नतीजा यह निकला कि दलित ही दलित लेखन कर सकता है और स्त्री ही स्त्री लेखन। इस प्रकार हमारे दो बड़े साहित्यिक आंदोलन खत्म किए गए।

सत्येंद्र : यथास्थिति बनी रही।

रमेश उपाध्याय : मैं बार-बार कहता हूं कि आज हिन्दी साहित्य में एक आंदोलन की जरूरत है,  लेकिन एक सामाजिक आंदोलन चलना चाहिए, जो साहित्य को भी प्रेरित करे। उस आंदोलन को शुरू करने के लिए यह देखना होगा कि समाज में जो प्रवृत्तियां चल रही हैं, उनमें कौन सी प्रवृत्ति ऐसी है, जो नया आन्दोलन खड़ा कर सकती है। समाज में कौन सी ऐसी शक्तियां हैं, जो वर्तमान व्यवस्था का विकल्प बन सकती हैं। साहित्य यही कर सकता है कि उन शक्तियों को पहचाना जाय, उन शक्तियों के साथ साहित्य को जोड़ा जाय, उनको साहित्य में अभिव्यक्त किया जाय। साहित्यकार किसी पार्टी से तो यह कह नहीं सकता कि आपको यह करना चाहिए, हम तो अपने पाठक से ही कह सकते हैं कि सामाजिक यथार्थ को इस तरह से देखो और इसे बदलने के लिए इस तरह से सोचो। तब हमारी बात नेताओं तक भी पहुंचेगी और शायद वो उस ढंग से प्रेरित भी होंगे। यह परोक्ष रूप से धीरे-धीरे होने वाला काम है, लेकिन है बहुत जरूरी। इसलिए मैं कोशिश करता हूं कि किसी तरह से चाहें वो कहानी के माध्यम से हो, कविता के माध्यम से हो या लेख के माध्यम से हो, लोगों तक ये बातें पहुंचे,  लोग इन बातों को समझें और अपने आसपास फैलाएं।

सत्येंद्र : आंदोलन के लिए एक नेता या नायक का होना जरूरी है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि देश के पास इसकी अगुवाई के लिए कोई नायक नहीं है? देश नायक की कमी के संकट से जूझ रहा है?

रमेश उपाध्याय :हमने थोड़ी देर पहले एक फिल्म ‘आर्टिकल 15’ की बात की थी, उसमें एक संवाद है कि नायकों की प्रतीक्षा न करें। ऐसा समाज बनना चाहिए, जिसमें नायकों का इंतज़ार न हो। जनतांत्रिक समाज में नीचे से ही नायक उभरना चाहिए और वो नायक एक नहीं होगा, कई होंगे। अलग अलग पार्टियों के हों, अलग अलग दल के हों। जैसे साहित्य की बात है। साहित्य में एक नायक नहीं हो सकता। एक विधा का भी एक नायक नहीं हो सकता। अच्छे कवि की बात करिए तो कई मिल जाएंगे, कहानीकार भी कई अच्छे मिल जाएंगे, नाटककार भी कई अच्छे मिल जाएंगे। ये सब नायक हैं, लेकिन सब नीचे से निकले हैं, कोई ऊपर से थोपा नहीं गया है। ये जो लोग हैं—विभिन्न विधाओँ के जो श्रेष्ठ लेखक हैं—कवि हैं, कहानीकार हैं, ये अपने दमखम पर उभरे हैं। इन्हें किसी ने बनाया नहीं है। कोई बना भी नहीं सकता। इस  तरह देखें  तो आंदोलन समाज का हो या साहित्य का, उसके नेता या नायक उसीमें से उभरते हैं।  गांधी को किसी ने बनाया नहीं था, गांधी अपने आप बने थे। नेहरू अपने आप बने थे, सुभाष अपने आप बने थे। इन्हें किसी ने बनाया नहीं था।

सत्येंद्र:  आपका लेखन काल बहुत लंबा रहा है। तब और अब के लेखन में तुलना करें तो आज कैसा लेखन हो रहा है? हर संदर्भ में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक।

रमेश उपाध्याय : मैं तो समाज की बेहतरी में यकीन करता हूं। और जो मैं  कह  रहा था कि पतनवादी धारणा मेरी नहीं है। इसलिए उस समय से आज तक मैंने अच्छा ही लिखा। मेरा  लेखन अच्छा ही हुआ है। किन मायनों में अच्छा हुआ, ये भी बताता हूं। उस समय जब हमने लिखना शुरू किया था, 1962 में मेरी पहली  कहानी छपी  थी,  तो स्वाधीनता आन्दोलन का दौर खत्म हो गया था, वो जो मूल्य थे, वो उतार पर थे। नई चीज़ें  आ रहीं थीं। उसमें अवसरवाद भी था और सुविधावाद भी था। नई फैशनपरस्ती भी थी। अस्तित्ववाद, भूखी पीढ़ी, श्मशानी पीढ़ी। तो फैशन था साहित्य में। कंटेंट कम था, फॉर्म पर जोर था। इसको आप रूपवाद कह लें, कलावाद कह लें। इसलिए उस दौर में आप देखते हैं कि नई कहानी आंदोलन या नई कविता का आन्दोलन—मतलब जो बड़े आंदोलन थे—उसके बाद जो आंदोलन चले वो अल्पजीवी थी—चाहें वो अकविता का आंदोलन हो या अकहानी का आंदोलन हो या समान्तर कहानी का आन्दोलन हो, ये आंदोलन तो थे  लेकिन बहुत अल्पजीवी थे और निष्प्रभावी थे। इनका कोई अलग प्रभाव ही नहीं पड़ा। जो प्रभाव नई कहानी या नई कविता का था, वो इन आंदोलनों का था नहीं। उसके बाद आप देखते हैं कि सत्तर के दशक में –सन ’65 के बाद ’66 के आसपास, जब समाज में खलबली मचती है और ये सिर्फ हमारे समाज में नहीं थी, यूरोप में भी थी, अमेरिका में भी थी। जैसे फ्रांस के युवाओं का आन्दोलन चल रहा था, अमेरिका में हिप्पियों  का आन्दोलन चल रहा था। उसी समय साहित्य में एंग्री जेनरेशन का आन्दोलन चला, जिसकी तर्ज पर हमारे यहां भी एंग्री  जेनरेशन का आन्दोलन चला। युवाओं के आंदोलन के साथ सार्त्र  खड़े हुए थे। यहां भी नक्सलबाड़ी का आन्दोलन चला या फिर बड़े पैमाने पर यह हुआ कि पूरे देश में कांग्रेस का जो वर्चस्व था, वह टूट गया। संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं. संविद सरकारें इनको कहते हैं। कई प्रदेशों में यह परिवर्तन हुआ। और एक युवा शक्ति भी खड़ी हुई। युवा तुर्क आए। बाद में उनका क्या हुआ, उसे छोड़ भी दें तो एक बदलाव तो था यह। इस बदलाव का असर हम साहित्य पर भी देख सकते हैं। प्रगतिशील-जनवादी आंदोलन की एक नई लहर पैदा हुई। प्रगतिशील लेखक संघ, जो बिल्कुल मरा पड़ा था मतलब बिल्कुल निष्क्रिय था, उसमें भी जान आ गई। जनवादी लेखक संघ बना। जन संस्कृति मंच बना। इधर, भारतीय लेखक संघ और दूसरे कई तरह के संघ बने। स्त्रियों का संघ बना, दलित लेखकों का संघ बना। चेतना आई न?  ये आंदोलन है। ये आंदोलन जो साहित्य पैदा हुआ, वो समाज के आंदोलन की देन है। ये स्त्रीवाद और दलितवाद जो है वो साहित्य में बाद में आया। पहले तो सामाजिक आंदोलन में आया न। दलित पैंथर्स, जो महाराष्ट्र में पैदा हुआ, दलितों का आंदोलन था। दलित आंदोलन से ही दलित साहित्य पैदा हुआ, जो हिन्दी में बाद में आया। समाज में जो आंदोलन हुए, उन्हीं से साहित्य प्रभावित हुआ और ये साहित्यिक आंदोलन चले। आज ऐसी स्थिति हमें दिखाई नहीं देती।

सत्येंद्र: आन्दोलन गायब है।

रमेश उपाध्याय : जब कोई ऐसा सशक्त राजनीति सामाजिक आंदोलन नहीं है,  जो साहित्य को प्रेरित करे और उसमें एक नई जान डाले तो साहित्यकार अपने दम पर जितना हो सकता है, उतना कर रहा है। लेखक यथार्थ को लिख रहे हैं, यथार्थ की बात कर रहे हैं लेकिन आंदोलन के रूप में नहीं। बहुत सारे लोग एक साथ मिलकर कोई आन्दोलन  चलाएं, ऐसा नहीं है।

सत्येंन्द्र : अभी लिखा तो जा रहा है, अलग अलग धाराओं में। मज़दूर तो साहित्य से लगभग गायब है। ऐसा नहीं है कि नहीं लिखा जा रहा है लेकिन जिस रूप में मज़दूरों को साहित्य में आना चाहिए था, वह नहीं है। किसानों की समस्या है। इस पर थोड़ी बहुत चर्चा हो जाती है तो इस पर लिखा जा रहा है। फेसबुक खोलिए तो किसानों पर तो ऐसे लोग भी कविताएं लिख रहे हैं, जो कभी गांव गए  ही नहीं। हर आदमी किसानों पर लिख रहा है।

रमेश उपाध्याय : नहीं, सब लोग तो नहीं लिख रहे हैं। कुछ ही लोग लिख रहे हैं। किसानों की आत्महत्या और उन पर जो संकट है, निश्चित रूप से बड़ा संकट है। उससे उद्वेलित होते हैं लोग, अच्छा काम करते हैं। संज्ञा ने कथन का एक अंक निकाला है किसानों पर, उसकी सराहना इसलिए हुई कि उसमें इस तरह की चीजें आईं। अभी आपकी कहानी मैंने पढ़ी, वो किसान भागकर मज़दूर बनता है और मज़दूर की हालत क्या होती है।  तो ये सब स्थितियां हैं लेकिन मुख्य बात ये है कि अलग अलग धाराएं छोटी-छोटी बह रही हैं। इनको मिलाकर एक बड़ी धारा बने, एक बड़ा आन्दोलन बने, वैसी स्थिति अभी नहीं है।

सत्येंद्र: फिर कैसे होगा? क्या करना चाहिए?

रमेश उपाध्याय : कैसे होगा, ये तो मैं नहीं बता सकता लेकिन ये होना चाहिए और हो सकता है। आज नहीं तो कल होगा।

सत्येंद्र: भले अलग अलग धाराएं हों लेकिन एक बात है कि बहुत कुछ अच्छा लिखा जा रहा है। ऐसे लेखकों को आप क्या सलाह देंगे।

रमेश उपाध्याय :  (हंसते हुए) सलाह तो मैं क्या दूंगा। मुझे लगता है कि संख्या में चाहें कम हों लेकिन नए लेखकों में ऐसे लेखक आ रहे हैं, जो सचेत हैं, जागरूक हैं और चीज़ों को एक नई नज़र से, एक बदलाव वाली दृष्टि से देख रहे हैं। नए विचार आ रहे हैं। अब वो किस तरह से चैनलाइज होंगे, किस तरह से एकजुट होकर आंदोलन का रूप लेंगे, ये मैं नहीं कह सकता। अभी  परिस्थितियां इस तरह की हो गईं हैं कि आदमी ज्यादातर अकेला हो गया है। रोजी-रोटी, बच्चों की पढ़ाई, पर चिन्ता कि कल क्या होगा—नौकरी रहेगी या नहीं रहेगी। हम लोगों के जमाने में स्थिति ऐसी थी कि एक नौकरी लग गई तो ज़िन्दगी भर के लिए निश्चिन्त हो गए। नौकरी के बाद दूसरे कामों के लिए भी वक्त मिलता था। अब तो आप 24 घंटे के गुलाम हैं। मल्टीनेशनल कंपनी में या मीडिया में भी—आप जो करते हैं—आपके पास अपना वक्त तो है ही नहीं। तो ऐसी नौकरियों में, जिसमें तलवार लटकती रहे गर्दन पर हरदम कि कब नौकरी चली जाएगी, कब आप सड़क पर आ जाएंगे कुछ पता नहीं। तो ये जो स्थिति है, भयावह स्थिति है। ये आदमी को न केवल अकेला करती है बल्कि कमजोर भी बनाती है। फैसले लेने में, अपने लोगों से मिलने में, अपना वक्त समाज को देने में  उसको डर भी लगता है और वो यह भी सोचता है कि दूसरे काम कैसे करूंगा। हम लोगों के जमाने में फुरसत थी। अपनी 8 घंटे की ड्यूटी की या मैं कॉलेज में था तो अपने लेक्चर दे आए, उसके बाद का समय हमारा। हम लिखें पढें, किसी आन्दोलन में जायं या फिल्म देखने जायं या नाटक देखने जायं या कुछ भी करें।  दोस्तों के साथ गप्पें ही मारें, कॉफी हाउस में बैठें। अपना वक्त था। जब आप चार लोग बैठेंगे तो कुछ नया विचार आएगा, एक योजना बनेगी कि चलिए पत्रिका निकालें या एक नाटक मंडली बनाएं। ऐसे ही होता है। मिलजुल कर ही काम होता है न सब। तो मेरी सलाह है कि लेखक आपस में मिलने-जुलने के लिए समय निकालें। केवल फोन या फेसबुक वगैरह पर ही बात करके न रह जायं, बल्कि एक दूसरे के घर जाकर मिलें, कॉफी हाउस जैसे अड्डों पर मिलें, साहित्य और समाज के बारे में बात करें, अपने विचार साझा करें।

सत्येंद्र : समकालीन आलोचना को आप कहां देखते हैं?

रमेश उपाध्याय : रचना आगे है, आलोचना पीछे। आलोचना पिछड़ी हुई है। रचना के साथ नहीं चल पा रही है।  इसके कारण क्या हो सकते हैं, ये मैं नहीं जानता, लेकिन ये जरूर है कि वैसे प्रबुद्ध आलोचक, जैसे पहले हुआ करते थे, अब नहीं हैं। अगर होंगे भी तो छिटपुट हैं। हाल फिलहाल में रामविलास शर्मा के बाद या नामवर सिंह के बाद कौन बड़ा आलोचक दिखता है। यों कई आलोचक रहे हैं, आलोचना खूब लिखी गईं हैं, आलोचना की पुस्तकें भी खूब आईं हैं,  लेकिन, इस स्टेचर का कोई आलोचक क्यों नहीं हुआ? हालांकि वो भी कह सकते हैं कि प्रेमचन्द कहां हैं हिन्दी में? लेखकों के बारे में भी ये बात कही जा सकती है लेकिन तुलना करें अगर रचना और आलोचना की तो आपको लगेगा कि रचना में बहुत सारे काम हुए हैं, नए प्रयोग भी हुए  हैं, नई रचनाएं भी आई हैं, नए ढंग का लेखन शुरू हुआ है। लेकिन आलोचना में उन चीजों पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। इसकी एक वजह शायद यह है,  हमारे यहां एक गतानुगतिकता है, भेंड़चाल है। जैसे किसी भी कारण से एक लेखक प्रसिद्ध हो गया मसलन उदय प्रकाश, तो हर आलोचक उदय प्रकाश पर लिखने  लगा। बाकी सब लोग गायब। ये जो प्रवृत्ति है, बहुत  खतरनाक है। होना यह चाहिए कि हर आलोचक अपनी मेहनत से खोजकर लाए एक नया लेखक, जिसको वह महत्वपूर्ण मानता हो। किसी और ने खोज दिया, और आप उसी को लेकर चल पड़े और उसी पर 10 आलोचनाएं आ गईं, तो आलोचना पिछड़ेगी कि नहीं?  तो ये बहुत बड़ी समस्या है कि भेंड़चाल कैसे खत्म हो।

सत्येंद्र: कई युवा आलोचकों ने तो कई नामी लेखकों को खारिज ही कर दिया
रमेश उपाध्याय
: वो भी प्रतिक्रिया है न। यह उसी की प्रतिक्रिया है कि उसके अलावा कोई है ही नहीं। फिर उनको लगता है कि अगर ये रहेंगे तो फिर हम कहां रहेंगे। और  ये स्वाभाविक भी है। अब मैं बताऊं आपको कि 2017 में मुक्तिबोध का जन्मशती वर्ष मनाया गया। तो उन पर बहुत कुछ लिखा गया। मैंने भी एक किताब लिखी, लेकिन उसी वर्ष में मुक्तिबोध के विरोध में भी बहुत कुछ लिखा गया।

सत्येंद्र: बहुत लोगों ने तो खारिज ही कर दिया।

रमेश उपाध्याय : हां, बहुत लोगों ने तो बिल्कुल खारिज कर दिया। उसकी वजह क्या है? बहुत से कवियों को ऐसा लगता है कि आज भी अगर मुक्तिबोध ही चल रहे हैं तो हम कहां रहेंगे? हमारा तो कोई नाम ही नहीं लेता। मुक्तिबोध के बाद अगर कोई बड़ा कवि माना जाता है तो वो हैं रघुवीर सहाय। रघुवीर सहाय के बाद फिर कौन? बहुत नाम हैं। राजेश जोशी हैं, मंगलेश डबराल हैं, असद जैदी हैं,… बहुत नाम हैं, लेकिन मुक्तिबोध के सामने कोई टिकता ही नहीं. तो उनको गुस्सा आता है—मुक्तिबोध क्यों? खारिज कर दो। ये प्रवृत्ति तो है लेकिन इसको मैं सीरियसली नहीं लेता। सीरियसली मैं तब लूंगा जब किसी सिद्धान्त के आधार पर आप ये बताएं कि मुक्तिबोध से बड़े या आगे  के कवि ये-ये हैं। तब मुक्तिबोध भी रहेंगे और आज के कवि भी स्थापित होंगे।

सत्येद्र: आपने तो आलोचना के क्षेत्र में काफी काम किया है।

रमेश उपाध्याय : मैंने सैद्धान्तिक आलोचना का काम ज़्यादा किया है, व्यावहारिक आलोचना का लगभग नहीं किया है। व्यावहारिक आलोचना का मतलब है किसी लेखक के बारे में, किसी लेखक की रचना के बारे में लगातार लिखना, उसे प्रोजेक्ट करना, उसे स्थापित करना। ये काम मैंने नहीं किया है क्योंकि ये मेरा क्षेत्र नहीं है। सैद्धान्तिक आलोचना में मैंने कहानी की समाजशास्त्रीय समीक्षा पर काम किया है, जनवादी कहानी पर काम किया है, यथार्थवाद पर काम किया है, भूमंडलीय यथार्थवाद की नयी अवधारणा पर काम किया है।

सत्येंद्र: आप जब लिखते हैं कोई चीज, तो  उसकी प्रक्रिया क्या होती है? आपकी लेखन प्रक्रिया क्या है?

रमेश उपाध्याय : कोई एक चीज़ नहीं होती।  हमेशा एक ही चीज हो जरूरी नहीं। अलग अलग चीज़ें होती हैं। मैं मुख्य रूप से कहानीकार हूं तो कहानी की ही बात करूंगा। अगर आपने मेरी कहानियां पढ़ी होगीं तो, आपने देखा होगा कि मेरी कोई भी दो कहानियां एक जैसी नहीं होतीं। सब अलग हैं। कथ्य के हिसाब से भी और भाषा और शिल्प के  हिसाब से भी। ये क्यों होता है? एक कारण तो इसका यह है कि मेरा जीवन बहुत विविधतापूर्ण रहा है। मैं गांव में रहा, कस्बे में रहा, शहरों में रहा, छोटे शहरों में, फिर महानगरों में भी और तरह तरह के काम मैंने किए। मेहनत-मज़दूरी से लेकर पत्रकारिता तक और फिर कॉलेज में पढ़ाने तक का काम। इन कामों के कारण बहुत से तरह के लोगों से मिलना हुआ, तरह तरह की ज़िन्दगी जीना हुआ और तरह तरह के अनुभव हुए। दूसरी बात ये कि मैं कोई नई चीज़ देखता हूं तो चकित होता हू कि ‘अच्छा ऐसा भी होता है और हमें पता ही नहीं! नई चीज़ें मुझे बहुत आकर्षित करती हैं। आकर्षित करती हैं तो लिखने का विषय भी बनती हैं। मैं उन चीजों को समाज से जोड़ता हूं। मसलन, मैं सुबह घूमने जाता हूं तो एक पेड़ को देखता हूं, जो सूख रहा है। मैं रोज देखता हूं उसे। इसको देखकर मुझे क्या लगता है कि कहीं न कहीं समाज में भी कुछ ऐसा हो रहा है। कहीं न कहीं समाज में भी ये प्रक्रिया चल रही है। एक दिन वह पेड़ पूरा सूखकर गिर जाता है। लेकिन एक दिन मैं देखता हूं कि उसी सूखे पेड़ में से एक कल्ला फूट रहा है। इसे भी मैं समाज में चल रही प्रक्रिया से जोड़ता हूं और कहानी बनती है ‘काठ में कोंपल’।  

सत्येंद्र : हां, मैं भी यही पूछने वाला था कि क्या ‘काठ में कोंपल’ की प्रेरणा भी क्या ऐसे ही मिली? अपनी अन्य कहानियों की प्रेरणाओं के बारे में बताएं।

रमेश उपाध्याय : कोई भी नई चीज़ देखकर, चाहें वो अच्छी हों या बुरी हों, मुझे लिखने की प्रेरणा मिलती है। चाहें वह प्रेरणा किसी व्यक्ति को देखकर मिली हो या किसी घटना को देखकर, या किसी वस्तु को देखकर । यहां तक कि किसी फिल्म को देखते हुए, या किताब को पढ़ते हुए, या किसी से बात करते हुए भी वह प्रेरणा मिल सकती है। और फिर धीरे-धीरे मन में कहानी की रचना-प्रक्रिया चलती रहती है। यह नहीं कि तत्काल कहान लिख डालूं। आज विचार मेरे मन में आया है, उस पर जरूरी नहीं कि मैं आज ही लिखूं। हो सकता है कि साल भर बाद लिखूं या दो साल बाद लिखूं। वह विचार कब पक कर के कहानी की शक्ल में आएगा,  यह मैं नहीं कह सकता। लेकिन उसकी शुरुआत इसी तरह से होती है कि मैं जिन चीज़ों को देखता हूं,  या जिन चीज़ों से प्रभावित होता हूं या जो चीजें मुझे उद्वेलित करती हैं, उनसे मुझे यह विचार आता है कि इस पर लिखना चाहिए और ये कहानी बन सकती हैं। वो कब बनेगी, कैसे बनेगी, ये मैं नहीं बता सकता। और फिर, मैं लिखते-लिखते सोचता हूं और सोचते-सोचते लिखता हूं। ये नहीं कि पूरी कहानी दिमाग में बिठा ली और बैठ कर इसे लिख दिया। मुझसे ये कभी नहीं होता। लिखते वक्त दिखता है कि ये पात्र  इधर नहीं जा रहा है तो फिर किधर जाएगा। तो मैं उस समय सोचता हूं। इसीलिए मैं कहान लिखते समय काट-पीट बहुत ज्यादा करता हूं। पहले मैंने टाइपराइटर पर बहुत काम किया है और अब कंप्यूटर पर भी कर लेता हूं लेकिन कहानी अभी भी हाथ से ही लिखता हूं. हाथ से लिखने की वजह से काटना-पीटना,  पीछे का आगे और आगे का पीछे ले जाना, ये मुझे आसान लगता है। इसलिए मैं अमूमन कागज पर आराम से लिखता हूं। और सोचते सोचते लिखता हूं। उसमे यह होता है कि  कहानी खुद बताती है कि हां, अब ठीक है या अभी ठीक नहीं है। एक उदाहरण बताता हूं। आपने ‘माटीमिली’ कहानी का जिक्र किया। ‘माटीमिली’ कहानी कम से कम 11  बार मैंने लिखी होगी और 11 साल में लिखी है। इसकी प्रेरणा मेरे गांव की एक स्त्री थी। वो बदचलन मानी जाती  थी लेकिन वो इतनी सुंदर थी और मुझे इतनी अच्छी लगती थी कि मैं जब उसके घर जाता था, उसके बच्चों के साथ खेलता था तो  मुझे बहुत अच्छा लगता था। उसका घर इतना साफ सुथरा रहता था कि एक पवित्रता का अहसास कराता था। मुझे यह भी अच्छा लगता  था कि एक अकेली बिधवा अपने बच्चों को पाल रही है। वो अक्सर मेरी मां के पास आती थी और अपने सारे दुखड़े  मां को सुनाती  थी। मां की थोड़ी सहानुभूति उसके साथ रहती थी, इसलिए वो अपनी सारी बातें मां को बताती थी और मैं उन बातों को सुना करता था। तभी से उसके प्रति एक तरह  का सम्मान मेरे मन में पैदा हुआ। हालांकि वो बदनाम थी, फिर भी मेरे मन में उसके प्रति एक पवित्र सा भाव रहता था। मैंने उसकी कहानी कई बार लिखी। कहानी में हर बार वो एक बदलचन औरत के रूप में सामने आती थी लेकिन लिखने के बाद लगता था कि यह ठीक नहीं है।  मेरे मन में उसके प्रति जो भावनाएं हैं, कहानी उनसे मेल नहीं खाती। तब धीरे धीरे समझ में आया और बाद में आपने देखा कि कहानी में वही चरित्र आया, जो मेरे मन में था। तो कहानी लिखने की प्रक्रिया कई बार वर्षों लंबी भी होती है।
सत्येंद्र: कथ्य और शिल्प के नाम पर नए लोगों को बहुत डराया जाता है।

रमेश उपाध्याय : देखिए,  कथ्य और शिल्प अलग-अलग नहीं होते। तुलसीदास ने बिल्कुल सही कहा है कि  गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न—वाणी और उसका अर्थ कहने को तो अलग अलग हैं लेकिन अलग नहीं हैं। कहिअत भिन्न न भिन्न, ये भिन्न नहीं हैं।  वस्तु और रूप, कंटेंट और फॉर्म, कथ्य और शिल्प, जो आप कहें, ये कहलाते तो अलग अलग हैं, लेकिन अलग होते नहीं हैं। अध्यापक लोग जब पढ़ाते हैं तो सुविधा के लिए इन्हें अलग करके समझाते हैं। मैं भी अध्यापक रहा हूं। मैं भी अलग-अलग करके ही अपने छात्रों को बताता रहा हूं कियह कहानी का कथ्य है और ये इसका शिल्प है। लेकिन वास्तव में वो अलग अलग होते नहीं हैं। कहानी जब आप लिखते हैं तो पहले वाक्य से ही यह तय हो जाता है कि कहानी किस भाषा में लिखी जाएगी। भाषा का मतलब हिन्दी नहीं, उस कहानी की भाषा। हर कहानी की भाषा अलग होती है। उसके परिवेश के अनुसार, उसके पात्रों के अनुसार, उनकी मन:स्थिति के अनुसार, जो नैरेटर है, उसके दृष्टिकोण के अनुसार। इस प्रकार हर कहानी की भाषा एक नहीं होती, अलग-अलग होती हैं। हिन्दी होते हुए भी हिन्दी के अलग अलग रूप कहानी में मिलेंगे। तेवर भी मिलेंगे और फ्लेवर भी मिलेंगे अलग अलग तरह के। ये जो चीजें हैं, इनको अलग नहीं कर सकते।  रचना प्रक्रिया में तो ये अलग होती ही नहीं। कभी ध्यान ही नहीं जाता कि ये हम कथ्य कह रहे हैं और ये शिल्प। हां, कभी कभी यह होता है कि कहानी में कोई नया प्रयोग करने के लिए हम कोई नया शिल्प अपनाते हैं। उदाहरण के लिए मैंने ‘सारिका’ में  एक बार एक प्रयोग किया था। ‘किसी देश के किसी शहर’ शीर्षक से मैंने एक कहानी श्रृंखला लिखी थी, जो धारावाहिक रूप से छपी थी। उसमें मैंने पहले से तय कर लिया था कि आज के सामाजिक यथार्थ को लोककथा की शैली में लिखना है। वो एक चैलेंज था और एक नई चीज़ भी थी। तो उसमें पहले से तय था कि इसका शिल्प यूनिक होगा। यह एक नया प्रयोग था और उन कहानियों को लिखते समय मुझे खूब मजा आया। हर 15 दिन में मैं एक कहानी लिख देता था। पाक्षिक पत्रिका थी। वो कहानियां दिल से लिखी गईं और खूब सराही भी गईं। उन कहानियं को बड़ों ने ही नहीं बच्चों ने भी खूब पसंद किया। मेरे बहुत से मित्रों के बच्चों ने मुझे पत्र लिखे कि आपकी वो कहानी बहुत अच्छी लगी। लेकिन वो एक ही प्रयोग था। बाकी सारी कहानियां मैंने पहले से कुछ तय किये बिना लिखी है। चाहें वो गंभीर हों या हास्य-व्यंग्यात्मक हों, लंबी हों छोटी हों। मैंने छोटी-छोटी कहानियां भी लिखी हैं और बहुत लंबी-लंबी कहानियां भी लिखी हैं। उनको लिखते हुए मेरे दिमाग में कभी यह नहीं आया कि कथ्य अलग है और शिल्प अलग है—दोनों साथ ही आते हैं। और अक्सर ये होता है कि आप जब कोई नई बात कह रहे हैं तो नया शिल्प अपने आप आ जाता है, लाने की जरूरत नहीं पड़ती।

सत्येंद्र: कहानियां तो अभी आप लगातार लिख रहे हैं। क्या उपन्यास का भी प्लान है?

रमेश उपाध्याय : नहीं, उपन्यास का तो प्लान नहीं है। फिलहाल अभी मैंने एक लेखमाला शुरू की है परिकथा में। 5-6 लेख निकलेंगे। एक पूरी पुस्तक की योजना है।

सत्येंद्र : हमसे बात करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।

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