ममता शर्मा की कहानी ‘रिटायरमेंट’

सोमनाथ बाबू सुबह की सैर से लौटे और लिविंग रूम में  गद्देदार सोफ़े  पर आकर धंस गए।  पहले यह गद्देदार सोफ़ा   बैठकख़ाने  में  बड़े शौक़  से रखा गया था। फिर उसे घर के उस हिस्से में शिफ्ट कर दिया गया, जिसे लिविंग रूम कहा जा सकता है।   इसे रिटायरमेंट के बाद ही सोमनाथ बाबू ने पत्नी और बच्चों की डिमांड पर ख़रीदा था।  मगर इस पर सोमनाथ बाबू को बैठना मना था ; न सिर्फ़  सोमनाथ बाबू को बल्कि घर के किसी भी सदस्य  को बैठना मना था।  एक बड़े आकार  का टीवी भी ख़रीदा गया था 55 इंच का जिसमें तस्वीरें पानी की तरह तरल लगती थीं। सोमनाथ बाबू जब सुबह सैर से लौटते तो वहीं सोफ़े  पर धंस जाते और ज़ोर से टीवी लगा लेते।  अख़बार  सामने होता और चाय भी।  टीवी के  स्टीरियोफोनिक  इफ़ेक्ट से पूरा घर झंकृत हो जाता और सोमनाथ बाबू की पत्नी को महसूस होता ज़िन्दग़ी सफल हो गयी है।   सब  ठीक था लेकिन सोमनाथ बाबू का सोफ़े  पर धंसना घर के लोगों को कुछ पसंद नहीं आ रहा था।  धीरे- धीरे पत्नी और बच्चों ने पहले दबी जुबां पर और फिर साफ़ शब्दों में कहना शुरू किया। सोमनाथ बाबू कुछ दिनों तो टालते रहे फिर एक दिन आख़िर  बरस पड़े–

‘ये समझ नहीं आता कि ये  सोफ़ा खरीदा किसके लिए है !’

सब चुप रहे।

‘क्या बाहर  वालों के लिए ख़रीदा  है— मेहनत  की कमाई  हमारी और बाहर  वाले आकर इसका मज़ा लें।  सोफ़ा  हमारे बैठने के लिए है। बाहर वाले  भी आएं,  वे भी बैठें लेकिन हम तो बैठेंगे ही।’

अब भी कोई कुछ नहीं बोला।

सोमनाथ बाबू ने फैसला ही सुना दिया।  आगे कुछ भी  सुनने और कहने की गुंजाइश  ही न छोड़ी।

फिर घरवालों ने एक दूसरी  तरक़ीब  निकाली। 

एक रात सोफ़े  का एक हिस्सा   लिविंग रूम  में लगा दिया गया और वहीं 55 इंच का नया टीवी भी चला गया।

सोमनाथ बाबू  ने सुबह उस दिन  उठकर देखा तो बस मुस्कुरा कर रह गए। इतना चलता है। उस दिन के बाद से उनकी विश्रामस्थली यह जगह हो गयी थी।  

सोमनाथ बाबू  की  दिनचर्या बंधी हुई थी ; सैर से आकर सोफ़े  पर धंस जाना;  फिर  ज्ञान आता  उसके एक हाथ में  ट्रे होती  और  बगल में  अख़बार।   सोमनाथ  बाबू ज्ञान से सवाल करते—

‘तेरा नाम ज्ञान किसने रखा ?’

वह खिसियानी सी हंसी हँसता। 

‘अब तेरी क्लास रोज़ लगेगी पहले दसवीं की परीक्षा प्राइवेट से और फिर आगे देखते हैं….’ 

‘हमें  तो मेकेनिक का काम सीखना है’

सोमनाथ बाबू बड़े गौर से ज्ञान को देखते। 

‘मैकेनिक ही क्यों—’

‘उसके बाद दुबई जा सकेंगे—’

‘ऐसा कौन बोला रे—-’ 

‘बिट्टू —-’

सोमनाथ बाबू इसके बाद बिट्टू को अपने क़रीब खींच लेते और बड़े स्नेह से उसके सर पर हाथ फेरते।

‘अखबार ट्रे में  रखकर लाया करो, बगल में  दबा कर नहीं —कितनी बार कहा है। ‘

हफ़्ते  में तीन दिन लगभग यही वार्तालाप होता। वही प्रश्न और वही जवाब इसे ही कहते हैं दिनचर्या।

ठीक वैसे ही जैसे अठाईस  बरस आठ महीने की नौकरी के बाद सोमनाथ बाबू रिटायर होने के बाद भी उसी लय  और ताल के साथ दफ़्तर  पहुँच जाया करते।उसी तरह अपने टेबल का ड्रॉअर  खोलते कागज़ों का एक पुलिंदा निकालते  और उसमें उलझ जाते फिर उसे वापस रखते और कैंटीन का रूख़  करते।

सोमनाथ बाबू को रिटायर हुए एक महीना होने को आया । दफ़्तर  जाना उनके लिए एक स्वाभाविक सी प्रक्रिया थी ऐसे जैसे साँस लेना इंसान के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया है  मानो  रोज़ सवेरे कोई मशीन ऑन  कर दी गयी हो ।  मशीन जिसे ऑन करने के बाद उसपर कोई इख़्तियार  ही न रह जाये।और इसके विपरीत दफ़्तर न जाना  उनके लिए बहुत ही अस्वाभाविक जैसा कुछ था ।  दफ़्तर  नौ बजे से हुआ करता और सोमनाथ बाबू साढ़े  आठ बजे ही घर से निकल पड़ते दफ़्तर से  घर की दूरी पैदल जाने पर सिर्फ 10 से 12 मिनट की थी।

‘दफ़्तर  ही मुझे स्वस्थ रखता है ऐसा उनका मानना था। जिस दिन ये छूट जायेगा उसी दिन मैं बीमार हो जाऊंगा।’

‘पिताजी इसे  स्टॉकहोम सिंड्रोम कहते  है—-’कुंतल कहा करता। कुंतल सोमनाथ बाबू का बड़ा बेटा था। 

परिवर्तन सोमनाथ बाबू के लिए युग बदलने की तरह होता। पिछले 28 सालों  से दफ़्तर  में वे उसी एक टेबल पर बैठा करते जिस पर वे बहाली के समय आये थे।  लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं था कि उनका टेबल देखने में  बुरा लगा करता। सॉलिड लकड़ी का बना ऑफिस फर्नीचर था वह, जो अब बनना और प्रयोग में आना भी बंद हो चुका था। 10 साल पहले जब दफ़्तर  की नयी इमारत बनी और सारे  फर्नीचर को ओब्सोलीट  क़रार  दिया गया तो सोमनाथ बाबू ने ख़ास रिक्वेस्ट करके पुराने फर्नीचर को अपने लिए रूकवाया था। फिर सोमनाथ बाबू ने लकड़ी के फर्नीचर को पालिश  करवाया था। एक कुर्सी हत्थे वाली, एक छोटा पुराने स्टाइल का स्टूल और एक टेबल पूरे  सेक्शन में अलग सा ही दीखता था।ऐसा लगता कोई पुरानी अंग्रेजी फिल्म देख रहे हों। 

‘सोमबाबू रिटायर होंगे तो इसे साथ लेते जाइएगा’

लोग कभी जब हंसी में  कहा करते तो सोमनाथ बाबू गंभीर हो जाते ।

जब होंगे रिटायर तब  देखेंगे अभी से क्या सोचना।

दरअसल सोमनाथ बाबू को रिटायरमेंट की बातें कुछ पसंद नहीं आया करती; और लोग थे कि रिटायरमेंट की बातें करने से बाज़ न आते थे। वे ऐसा कोई उन्हें तंग करने के लिए करते ऐसा भी न था।  किसे फुर्सत थी यह जानने की कि सोमनाथ बाबू को क्या पसंद है और क्या नापसंद  दफ़्तर तो दफ़्तर घर में उनकी पत्नी को भी इस और ध्यान न था। सिर्फ़  एक मेहुल था सोमनाथ बाबू का सबसे छोटा बेटा जो उनके इस जज़्बात को बहुत अच्छी  तरह समझता था।  

जब सोमनाथ बाबू के रिटायरमेंट को महज़ तीन महीने बच गए तो सोमनाथ बाबू के बॉस ने बुलाकर उनसे कहा कि वे अपने काम और फाइल वगैरह के बारे में मुंतज़िर  को बता दें ताकि उनके जाने के बाद वह  उनकी ज़िम्मेवारियों को समय रहते ले ले।

‘अभी तो समय है सर …और वैसे भी मैं कौन सा यहाँ से कहीं जा रहा हूँ। जब बुलावा आ जायेगा आ जाऊंगा।’

मुंतज़िर  एक उत्साही और होनहार लड़का था जिसने दो साल हुए नौकरी ज्वाइन की थी।

मगर सोमनाथ बाबू के मन में जाने कौन सी बात थी मुंतज़िर  से वे तमाम तरह की बातें  किया करते लेकिन जब काम की बात आती  तो यही कहकर टाल  जाते —

‘छोड़ ना यार अभी ज़िन्दगी पड़ी है सीखने  को–’

लेकिन इतना तो बिलकुल तय था कि सोमनाथ बाबू किसी नकारात्मक भाव से ऐसा नहीं कर रहे थे। बस यह सब कुछ हो जाता था।  जैसे ही कोई कुछ ऐसा कहता पूछता या करता जिससे उन्हें  जाने- अनजाने ही सही अपनी सेवानिवृत्ति की बात याद आ जाती तो वे एक बेचैनी- सी महसूस करने लग जाते।

समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था और सोमनाथ बाबू थे कि समय के पहिये रोकने में  लगे हुए थे ; समय भी कभी रूका है भला। 

‘पिताजी आप ने रिटायरमेंट प्लान तैयार कर लिया—-’   कुंतल ने एक   दिन पूछा । कुंतल सोमनाथ बाबू का बड़ा बेटा था।

मगर कुंतल की ऐसी बातों से सोमनाथ बाबू समय से पूर्व की गयी योजना घोषित करके टाल दिया।  

एक बार तो कुंतल ने एक बड़ी प्राइवेट  बिजनेस फर्म में एकाउंट्स देखने की बात भी कर ली। सोमनाथ बाबू का अनुभव देखकर वे अच्छी ख़ासी  पगार देने को तैयार थे न सिर्फ़  उनका अनुभव उन्होंने देखा बल्कि उनकी वफ़ादारी के बारे में भी तहक़ीक़ात कर ली थी।  कुंतल को कुछ ख़ास करना ही नहीं पड़ा।

‘पिताजी मैंने अख़बार से इश्तेहार  देख कर एक एप्लीकेशन डाल दी थी। कार्टसराय रोड में दफ़्तर है आपको  मैं  ही छोड़ दिया करुँगा और उधर से ही काम पर चला जाऊंगा।’

सोमनाथ बाबू ये सब सुनते हुए ऐसे स्पंदनहीन हो जाया करते कोई घोंघा ख़तरे  की आहट  पर अपने हाथ पैर  शेल  के अंदर छुपा ले।

घर भर में एक मेहुल  ही था जो जिसने सोमनाथ बाबू को दफ़्तर में अपने डेस्क पर काम करते देखा था।  उसने देखा था कैसे क़रीने  से सोमनाथ बाबू अपनी फाइलों को रखा करते ;अपने डेस्क के पीछे रखी  चार स्टील की अलमारियों में फाइलों को रखकर उन्होंने स्टिकर से सब्जेक्ट लिख रखे थे । उनके डेस्क पर फाइलों या कागज़ों का वैसा ढेर नज़र नहीं आता था जैसा उनके बगल वाली मेज़ पर था ।  उनके आसपास के सभी लोगों का फर्नीचर बिलकुल नया था लेकिन सोमनाथ बाबू का लकड़ी का बरसों पुराना  फर्नीचर  उनसे ज़्यादा   साफ़ था। सोमनाथ बाबू के डेस्क को देखकर ऐसा नहीं लगता था कि उस डेस्क के मालिक ने अपने कामों को लापरवाही से लटका कर रखा होगा।

कुल जमा बात ऐसी थी कि सोमनाथ बाबू अपना काम तो पूरी एहतियात के साथ करते ही साथ ही    दूसरों को भी आड़े वक़्त  में मदद करने में पीछे नहीं रहते।बाक़ी  लोग जहाँ काम को लटका कर अपने महत्व को बरक़रार  रखने में विश्वास रखते, सोमनाथ बाबू इसके उलट अपना तो अपना दूसरों का भी काम करने को तैयार रहते।  सुबह जब सोमनाथ बाबू दफ़्तर आते  तो लक्ष्मी ही सिर्फ़  वहां होती जिसके ज़िम्मे दफ़्तर  की सफाई थी। लक्ष्मी को भी  अपनी कमाई के कम होने और महंगाई बढ़ने जैसे राष्ट्रीय  और सार्वजनीन  मुद्दों पर सोमनाथ बाबू के सामने अपनी फ़रियाद रखने का  मौक़ा मिल जाया करता। और लक्ष्मी कभी- कभार छोटी मोटी रक़म  भी अपनी ज़रूरतों के लिए सोमनाथ बाबू से लिया करती।दफ़्तर के बाक़ी लोगो का समय जहां इधर- उधर होता रहता वहीं  सोमनाथ बाबू के दफ़्तर  का समय मुंबई लोकल  की तरह ही फ़िक्स  था । उसमें  बदलाव तभी होता जब या तो सोमनाथ बाबू को मेडिकल की कोई ज़रुरत होती या फिर वे शहर से बाहर होते।  समय की यह पाबंदी साल दर साल चलती ही रही चलती ही रही, कहीं कोई बदलाव नहीं हुआ।

जब सोमनाथ बाबू को तीन माह पहले रिटायरमेंट का पहला नोटिस  मिला तो  वह दिन उनके लिए ऐसा था मानो  उनसे कह दिया गया है अब आप अपनी वापसी की यात्रा के लिए सीढ़ियां उतरनी शुरू कर दें कि अब यात्रा ख़त्म होने वाली है। उस शाम उन्होंने सामने रखी  चाय को छुआ तक नहीं।

‘बाबा कैसा रहा आज का दिन’ मेहुल जब काम से लौटता तो बाबा से पहला यही सवाल करता;और आज सोमनाथ बाबू और दिनों के बनिस्पत मेहुल के इस सवाल का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।

 मेहुल के इस सवाल के एवज में  उन्होंने अपने बगल में  कुर्सी पर रखे कागज़ को आगे कर दिया।

‘ये क्या है बाबा’

‘रिटायरमेंट का पहला नोटिस—आज ही मिला’ 

मेहुल ने बाबा के चेहरे  को देखा ।  उसे लगा कि बाबा की उम्र अचानक ही बहुत बढ़ गयी है सिर्फ़ एक दिन में ही। बाबा उसे बहुत गहरे उदास लगे।  उसने बाबा के हाथ पर अपना हाथ रख दिया।  सोमनाथ बाबू शायद  यही चाहते थे।

‘लोग कहते है अब आराम करो —–मुझे तो लगता है ये शब्द ही गलत है इंसान कभी रिटायर नहीं होता ।’  सोमनाथ बाबू इमोशनल हो गए । सिर्फ़  मेहुल  ही है  जो सोमनाथ बाबू के मन  को अक़्सर  पढ़ लिया करता है। सोमनाथ बाबू की आवाज़ में एक ऐसा दर्द था,  लगता था बड़ी मुश्किल में हों और किसी को कुछ कह न पा रहे हों।

मेहुल  ने अपनी  एक बांह से उनके कंधे को घेर लिया।  ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। मेहुल अक्सर ही बाबा के मन को पढ़ लिया करता  है। दरअसल और कोई भी नहीं पढ़ पाता,  उनकी पत्नी  भी नहीं , उनकी बेटी कुमकुम भी नहीं और उनका बड़ा बेटा कुंतल भी नहीं।

‘सुनते हैं कुछ लोग रिटायरमेंट का बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। क्या महसूस करते होंगे वे कैसे अचानक अपने रूटीन के बदल जाने की बात से समझौता कर लेते होंगे। या फिर उन्हें दफ़्तर में मन ही नहीं लगता होगा; या वे अपने काम को पसंद नहीं करते होंगे।

बड़ी अजीब चीज़ होती है नौकरी भी, 28 -29 बरस आदमी दिन के 9 घंटे एक जगह गुज़ार देता है तुम देखो 24  घंटे में से  8  घंटे  सोने में चले गए और बाक़ी अब तुम्हीं  सोचो अचानक एक दिन उस इंसान को कह दिया जाता है कि तुम्हें कल से कभी नहीं आना है। उसके लिए वह टेबल वह  जगह सब कुछ वापस ले ली जाती है।  28 बरस में तो दुश्मन से भी इंसान को प्यार हो जाये।’

‘मगर आपसे किसने कहा कि वहां आपको  नहीं जाना है हाँ रोज़ रोज़ नहीं जाना है। आप  ही कहते थे न सक्सेना अंकल रिटायर हो गए फिर भी आपको  मिलने को चले आते हैं  फिर क्या आप उनको मना  करते थे।’

हाँ –सही कह  रहे हो मेहुल मैं  तो मना नहीं करता था लेकिन अब का समय बदल गया है बेटा।  लोग उतने  जज़्बाती नहीं हैं।  हों भी कैसे,  हर साल नौकरी बदल देते है। उन्हें करियर में जम्प चाहिए होता है न– अब कुंतल को ही देखो न यह उसकी तीसरी नौकरी है अभी और जाने कितनी बदलेगा। उससे कहोगे कि उसके बाबा ऐसा सोचते हैं तो हंसेगा मुझपर —अच्छी  सोच है लेकिन हमें तो ऐसा कोई मौक़ा ही नहीं मिला न, हम क्या जानें नौकरियां बदलने का सुख और करियर के सोपान में ऊपर- ऊपर चढ़ते जाने का सुख और वह क्या जाने दफ़्तर  के घर हो जाने का सुख।’   

‘मेहुल  तुम्हारे बाबा तो अब रिटायर हो रहे है अब आगे की प्लानिंग करों तुम तीनों मिलकर—-’

‘कर लेंगे माँ –इतनी भी क्या जल्दी है। अभी तो तीन महीने बाकी  हैं ‘

सोमनाथ बाबू की पत्नी सोमनाथ बाबू के  सामने ही ऐसा कह रही थी और मेहुल भी    सोमनाथ बाबू के दिल को हल्का करने के उद्देश्य से उनके सामने ही माँ को  ऐसा कह रहा था।

‘अरे तुम्हारे बाबा से नहीं होगा। इनका बस  चले तो दफ़्तर से कभी रिटायर ही न हों; मुझे तो लगता था तुम्हारे बाबा थक गए होंगे हम सब के लिए  नौकरी करते करते लेकिन नहीं मैं  ग़लत  थी। ‘

सोमनाथ बाबू को  लगता है कि उनकी पत्नी  उन्हें कभी समझ नहीं पातीं ; वह ये तो समझ  लेती है कि उन्हें  दिन में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं  और रात में  दही खाने से उनकी तबीयत ख़राब हो  जाती है; वह ये  भी समझ  लेती है कि  उन्हें बैंगन  खाने से तकलीफ़ होती है; वह ये भी जानती है की सोमनाथ   बाबू को चावल की खीर बिलकुल पसंद नहीं है, मगर वह और बहुत कुछ नहीं समझ पाती। ज़रूरतें भी फिक्स नहीं होतीं । वक़्त,  समय और इंसानों   के अनुसार इनकी फितरत भी बदलती रहती है।

सोमनाथ  बाबू कहा करते ज़िन्दगी हर दस साल में बदल जाती है ऐसे जैसे कोई चैप्टर बदल गया हो।

रिटायरमेंट का पहला नोटिस जारी होने के बाद से दफ़्तर  में लोगों के वार्तालाप के  टॉपिक बदल गए थे।  पहले जब लोग सोमनाथ बाबू के पास आते तो किसी मसले की बात करते, किसी फाइल की बात करते, किसी कलीग  की बात करते लेकिन अब वे सारे  टॉपिक एक नोटिस भर से विलुप्त हो गए थे। ऐसा लगता था सोमनाथ बाबू दुनिया से ही रूख़सत  हो रहे हों जैसे।  है न कितनी अजीब बात !

‘अब वे मुझसे कुछ डिस्कस नहीं करते ‘

एक दिन दफ़्तर  से लौटकर बरामदे में रोज़ की तरह चाय पीते हुए सोमनाथ बाबू ने अपने मन  की व्यथा मेहुल  के सामने व्यक्त की थी

‘कौन बाबा ‘

‘दफ़्तर के लोग’

‘ऐसा क्यों बाबा’

वही  तो मैं भी सोचता हूँ कि आख़िर  ऐसा कौन सा परिवर्तन आ गया कि उन्होंने सारी  बातें ही बंद कर दी।  पहले तो हर दूसरी फाइल लेकर मेरे पास आ जाया करते थे उन्हें लगता मुझे नियमों का ज़्यादा पता  है;मैं ही हूँ जो फाइल पर बेहतरीन नोट लिख सकता हूँ।  तो क्या अब वे सब जान गए और मैं सिर्फ़  इसलिए अयोग्य हो गया कि मेरा रिटायरमेंट  आ गया— जानते हो मेहुल एक बड़ी अच्छी  पत्रिका थी हिंदी की तुमने नाम सुना  होगा धर्मयुग ;उसमें कभी एक कहानी   पढ़ी थी जिसमें एक व्यक्ति अशक्त हो जाता है और उसके सामने कोई ज़िक्र करता है कि रेस का घोडा जब अशक्त हो जाता है तो उसे—– उस शख़्स को लगता है की उसे भी जीने का हक़ नहीं है क्योंकि वह भी अशक्त हो गया है —– और कहानी के आख़िर  में वह आत्महत्या कर लेता है।’

मेहुल बाबा की सोच पर भयभीत हो जाता है।

‘बाबा आप न, ज़्यादा सोच रहे हो—– दुनिया चलती रहती और हम भी— इंसान कभी बिना काम का नहीं होता बाबा —’

मेहुल  ने अपनी भाषा और अपने तरीके से सोम नाथ बाबू को समझाया। 

फिर एक दिन सोमनाथ बाबू के बॉस ने बुला भेजा।

जब से सोमनाथ बाबू को रिटायरमेंट का नोटिस मिला है तब से उन्हें बॉस का बुला भेजना  रास नहीं आता। हमेशा दिल में एक हुक सी उठ जाती है। ये वही सोमनाथ बाबू हैं जो बॉस से कमरे से बुलावा आने पर इसे अपनी शान समझते। लोग कहा करते बॉस ने तो यह मान लिया है की सोमनाथ बाबू के अलावा इस दफ़्तर  में और कोई कुछ जानता  ही नहीं।  लेकिन इस बात में कोई अतिश्योक्ति भी नहीं थी कि काम का जूनून जैसा सोमनाथ बाबू में था, वैसा उनके सेक्शन में तो किसी में था ही  नहीं। 

‘अरे अगर मुझे बुलाते है तो कोई बिना  वजह नहीं बुलाते। उन्हें मुझसे कुछ काम होता है तभी  तो बुलाते हैं ना।’ एक दिन  सोमनाथ बाबू ने लोगों के  तंग आकर  कहा  था।  मगर अब कोई कुछ नहीं कहता और सोमनाथ बाबू का तो मन ही नहीं होता बॉस के केबिन में जाने का–हमेशा खटका लगा रहता  कहीं फिर रिटायरमेंट की कोई बात न कह दें।

उस दिन बॉस बाकी  दिनों से ज्यादा फॉर्मल थे। 

‘आइये आइये सोमनाथ बाबू– तबीयत कैसी है’

‘तबीयत को क्या हो रहा है सर—बिलकुल चंगा भला हूँ’

सोमनाथ बाबू ने  जवाब देने में तनिक भी देरी  नहीं की।

 ‘बैठिए’

आज बॉस के सामने कोई फाइल नहीं थी और वे  कुछ ज़्यादा  ही इत्मीनान में लग रहे थे और सोमनाथ बाबू  उतने ही परेशान।

‘सोमनाथ जी घर तो आपका  बना हुआ है और बच्चे भी सेटल  हो ही गए होंगे’

‘नहीं सर  अभी पूरी तरह से सेटल  तो नहीं कहा जा सकता, बच्ची की शादी अभी  बाकी है— मगर सर ये सब आप क्यों—- मेरा  मतलब ऐसी बातें तो हमारे बीच पहले कभी हुई नहीं—तो फिर आज-’

‘हम यहाँ साथ काम करते है तो एक दूसरे के बाबत जानना भी तो ज़रूरी है–मैं सोच रहा था आपकी कौन -कौन सी ज़िम्मेवारी अबतक बची हुई है आख़िर  रिटायरमेंट  के बाद तो आमदनी  की रफ़्तार थोड़ी कम तो हो ही जाती है— ख़ैर  अभी तो एकमुश्त रकम भी काफ़ी  मिल जाएगी—ग्रेचुएटी  मिलेगी — छुट्टी वगैरह तो होगी ही— आपको   तो मैंने छुट्टी कभी लेते देखा ही नहीं— सोमनाथ जी अब कहाँ रह गये इतने डेडिकेटेड लोग—-’ 

सोमनाथ बाबू कितने खुश थे लेकिन ये सब बॉस ने पहले कभी क्यों नहीं कहा। सोमनाथ  को यही सोच खाए  जाती है उनकी ज़िन्दगी में यह सब पहले क्यों नहीं हुआ और अब क्यों हो रहा है।

पूरा घर व्यस्त   था इन दिनों कि रिटायरमेंट के बाद क्या कुछ करना है। मगर हर कोई सिर्फ़  रिटायरमेंट से मिलने वाली   एकमुश्त रक़म  की योजना बना रहा था या कहें मेटीरियल  की दुनिया में मशग़ूल  था।

कोई कहता सोफ़ा  ज़्यादा  पुराना है उसे बदलना है तो किसी को टीवी छोटा लग रहा था कोई विदेश घूमना चाहता था तो किसी को कार ख़रीदना  ज्यादा ज़रूरी लगता था। सोमनाथ बाबू सोचते कितने सपने पूरे  होने बाक़ी हैं अभी—क्या इस जनम में होंगे पूरे ।   सोमनाथ बाबू की पत्नी इस प्लानिंग में  सबसे  आगे रहती। लगता  जीवन भर के अरमान पूरे  कर लेना चाहती हों।

‘कौन सा टीवी लेंगे, चलो मार्किट सर्वे करते हैं ‘

‘ब्रांडेड लेंगे’

‘अरे नहीं, इतने पैसे कौन लगाएगा’

‘ नहीं नहीं, ब्रांडेड नहीं  लेंगे। आजकल तो बड़े सस्ते और बढ़िया टीवी सस्ते दामों पर ही मिल जाते हैं।’

उन दिनों  यही सारी बातें घर में  हुआ करती। ऐसा लगता कोई उत्सव आने वाला हो। ये पहली बार थी, जब घर में  इतने बड़ी रक़म  आ रही थी।  सारी  ज़िन्दगी तो तंगहाली में  ही गुज़र गयी। बजट बनाओ  और उसके मुताबिक ख़र्च  करो। ज़रा इधर उधर हुए तो उसका खामियाज़ा भुगतने को तैयार रहो; कभी पी एफ से पैसे निकलने पड़ेंगे या फिर बैंक से कोई लोन लेना पड़ेगा।

 ‘खर्च कभी बड़े नहीं होते ज़रूरतें बड़ी होती जाती हैं’ सोमनाथ बाबू अक्सर समझने के लिए घरवालों को कहा करते।

रिटायरमेंट को लेकर घर में जो भी गहमा -गहमी चल रही थी सोमनाथ बाबू उसे निस्पृह भाव से सुन रहे थे बिल्कुल  निरपेक्ष भाव से।   जैसे- जैसे रिटायरमेंट का दिन क़रीब आ रहा था ऐसा लगता था ज़िन्दगी में अब करने को कुछ भी बाकी  नहीं रहा और बहुत कुछ बाक़ी भी रह गया है —कुमकुम की शादी –मेहुल के लिए एक अदद अच्छी सी नौकरी और पत्नी पुष्पा के अधूरे सपने —–लेकिन इन सब को अब कैसे करेंगे पूरा। ऐसा लगता मानो किसी ने हाथों की ताक़त ही निचोड़ ली हो। अपना आप बेकार लगने लगा था।  सोमनाथ बाबू की इस सोच का असर उनकी दिनचर्या पर भी पड़ने लगा था। सुबह उठने का समय बदल गया था सवेरे की सैर भी बीच- बीच में मिस होने लग गयी थी।  कभी -कभी खाने का डिब्बा भी घर में टेबल पर ही छूट जाया करता।

 सोमनाथ भावुक हो जाया करते । उन्हें लगता कि  सिर्फ़  उनकी आमदनी से ही घर भर जुड़ा हुआ है।  लेकिन उन्हें सुक़ून  इस बात का था कि मेहुल  उनसे पूरी तरह जुड़ा हुआ था।  सोमनाथ बाबू को लगता कि मेहुल ही है उनका अपना और बाकी सब तो …

फिर वह दिन भी आ ही पहुंचा।  फेयरवेल वाले दिन वे सिर्फ़  मेहुल को ही अपने साथ ले गए थे हालाँकि इन्वाइट पूरे परिवार को किया गया था न सोमनाथ बाबू ने किसी को चलने को कहा और न ही किसी ने पूछा कि अकेले मेहुल ही क्यों ?

फेयरवेल पार्टी में जैसा कि अक़्सर होता बल्कि हमेशा ही होता   सबने सोमनाथ बाबू के बारे में भली- भली   बातें कहीं ;उन्हें माला पहनाई गई । मेहुल को अपने बाबा के बारे में दो शब्द कहने को कहा गया।

और उसने जो कहा वह अद्भुत था —

‘बाबा के लिए दफ़्तर  एक मंदिर  है—अगर आप ईश्वर में विश्वास  रखते है तो आप  समझ सकते है  मंदिर की क्या अहमियत होती है।  जिस तरह किसी  आस्तिक की आस्था को डगमगाया नहीं जा सकता,  बाबा को इस जगह से, जिसे सब दफ़्तर  कहते हैं, अलग करना दुरूह है –’ सोमनाथ बाबू का गला भर आया। इसलिए नहीं कि  वे 28  साल और 8  महीने की सेवा के बाद निवृत  हो रहे बल्कि इसलिए कि कोई कितनी अच्छी  तरह उन्हें समझ रहा है।

दुनिया में  समझ लिए जाने से भी बड़ा सुख है भला कोई !,

सोमनाथ बाबू पेपर  पर तो 30 जून को रिटायर  हो गए थे लेकिन उनकी दैनिक चर्या में कोई भी बदलाव नहीं हो पाया था। वे उसी तरह सुबह उठ रहे थे उसी तरह सैर पर जा रहे थे और उसी तरह वर्जिश कर रहे थे।बल्कि रिटायरमेंट के ठीक पहले जो एक लापरवाही – सी उनमें आ गयी थी वह अब नदारद थी। वे उसी तरह  दफ़्तर भी  जा रहे थे।

घर और बाहर लोग उन्हें बताते —

‘बाबा आप रिटायर हो गए हैं’

‘सुनो तुम रिटायर हो गए हो’

‘सोमनाथ बाबू तुम रिटायर हो गए हो’

कितने मुँह थे जिनसे ये बातें सोमनाथ बाबू के कानों तक पहुँच रही थी।

एक मेहुल  को छोड़कर हर कोई  उन्हें सीधे- सादे शब्दों में इस सच्चाई  से बार- बार वाकिफ़ करा  रहा था।  मगर सोमनाथ बाबू न किसी को जवाब देते और न ही किसी  बात पर अमल करते।

मेहुल बाबा की दिन चर्या को बड़े क़रीब से देख रहा था। सोमनाथ बाबू रोज़ की तरह ठीक साढ़े आठ बजे घर छोड़ दिया करते ;उसी तरह जैसे 30 जून से पहले छोड़ा करते थे। वे उसी तरह जाकर अपने सेक्शन की उसी डेस्क पर जा बैठते, जहाँ वे  सालों से बैठ रहे थे। टेबल तो अब साफ़ था लेकिन उनके ड्रावर  में उनके पर्सनल कागज़ात अभी छांटे जाने की राह देख रहे थे।  सोमनाथ बाबू जाकर चाबी से ड्रावर को खोलते और सारे कागज़  टेबल पर फैला देते।

‘कैसे हो सोमनाथ बाबू —अब आराम करो क्यों नाहक ख़ुद  को तकलीफ़  देते हो –’

‘अरे देखते नहीं सोमनाथ बाबू का पर्सनल सामान  अभी यहीं है, उसे छांट  रहे है–’

लोग लेकिन सोमनाथ बाबू का लिहाज़ किया करते वे कुछ देर अपने डेस्क पर बैठते फिर कैंटीन में  जाकर चाय पीते।  वैसे ही ठहाके लगाते  जैसे 30  जून  से पहले लगाया करते थे। और फिर 1  बजते बजते वापस घर का रूख़ कर लिया करते। 

 शुरू के  दस दिन जब सोमनाथ बाबू रिटायरमेंट के बाद पूरी तरह से घर में रहते  तो ऐसा लगता है कि  सोमनाथ बाबू किसी  पैबंद की तरह घर में हैं। ऐसा सोमनाथ बाबू को भी लगता और घर  बाक़ी सदस्यों को भी लगता । ऐसा लगता था मानो इन 28 सालों  में हर दिन के 9  घंटों ने उन्हें घर से बहुत दूर कर दिया और ये घंटे बस हमेशा हमेशा के लिए दफ़्तर के नाम हो गए हैं। 

सोमनाथ बाबू ने एक बात देखी  थी कि घर की अपनी एक दुनिया थी और उस दुनिया में उनकी  भूमिका किसी इंजन की सी थी; इंजन के पीछे डब्बों में जो गहमा -गहमी थी उससे उनका कोई ख़ास वास्ता नहीं था ठीक वैसे जैसे डब्बे की गहमा-गहमी से इंजन को कोई वास्ता नहीं होता ।

और मेहुल  बाबा के इस रुटीन को हर दिन  फॉलो कर रहा था।

‘ भैया तुमने बाबा के लिए कहीं बात करी  है न काम के लिए—-

 एक दिन मेहुल  ने ही अपने बड़े भाई से पूछा —

 ‘हाँ की थी मगर बाबा तो कोई इंटरेस्ट ही नहीं लेते पता नहीं कहाँ चले जाते है रोज़ सुबह —’

‘तुम पक्का कर लो आज मैं उन्हें वहां लेकर जाऊंगा कुछ तो करना पड़ेगा–’

और बात आख़िरकार बॉस तक पहुँच गयी—-

एक दिन जब सोमनाथ बाबू उसी तरह डेस्क पर अपने कागज़ात फैलाये उन्हें उलट पुलट  रहे थे तो बॉस पहुँच गए —.

‘कैसे है सोमनाथ बाबू –’

‘जी अच्छा हूँ आपकी  दुआ है

मेहुल  कैसे हैं —उसकी बातें मेरे  कानों में  गूंजती रहती है–बहुत अच्छा लड़का है—-अच्छा ऐसा है सोमनाथ बाबू आपको  तो पता ही है मुंतज़िर   आपका काम अब देख रहे है और क़ायदे से उन्हें अब आपके इस डेस्क पर बैठना है—तो आप अपना सामान निकाल लें आज ही। 

सोमनाथ बाबू बहुत कुछ सुन नहीं पाए। वे दरअसल वे सुनना भी कहाँ चाहते थे; वे समझ गए किसी ने पहुंचाई होगी उनकी बात बॉस के पास।   

उस दिन जब एक बजे सोमनाथ बाबू घर पहुंचे तो उनके हाथ में एक बहुत बड़ा झोला था, जिसमें बहुत सारे कागज़ात थे ;उन कागज़ातों  की कोई ख़ास अहमियत भी नहीं थी; लेकिन वे शायद सोमनाथ बाबू और दफ़्तर  के बीच की कड़ी थे —-

‘ ये क्या है  बाबा—’ मेहुल  ने झोला सोमनाथ बाबू के हाथ से पकड़ते हुए कहा।

‘कुछ नहीं रद्दी है सब बाहर  ढेर लगा कर  कर माचिस चला देना—कार्टसराय वाली फर्म का क्या हुआ कुछ पता है ?’

‘आपने पूछा नहीं बाबा मैं  इस समय  घर में क्यों नज़र आ रहा हूँ ‘

इसी लिए तो आपको कार्टसराय लेकर जाने के लिए —

बाबा आप चलेंगे न मेरे साथ— अच्छे लोग है बाबा आपकी बहुत इज़्ज़त    करते हैं।’

‘ हाँ हाँ वैसे भी तुम्हारे बाबा बोर होते रहेंगे घर में ‘।

सोमनाथ बाबू की पत्नी ने दूसरे कमरे से ही कहा। 

मेहुल ने अपनी माँ की बातों से  सोमनाथ बाबू के चेहरे पर आये गए भावों को पढ़ने में कोई भूल नहीं की ।

‘माँ –बाबा को ख़ुद ही लेने दो न फैसला’ मेहुल ने  कहा। 

‘पता नहीं इतना थक क्यों जाता हूँ आजकल –कब चलना है –’

‘नहीं बाबा –ऐसी कोई जल्दी नहीं जब आप कम्फर्टेबल महसूस करें ‘

‘आज ही चलेंगे–जानते हो इस शब्द को हमने बेवजह की इतनी अहमियत दे रखी है –’

‘किस शब्द को बाबा ‘

‘रिटायरमेंट–ऐसा  कोई पल  नहीं — मुझे लगता है जीवन  ख़त्म  हो जाता है तब भी हम रिटायर नहीं होते सिर्फ़ कायांतर हो जाता है।’

मेहुल को लगा यह सोच बाबा को बल ही देगी।

‘आप रिटायर नहीं हैं  बस जल्दी से तैयार हो लें’ सोमनाथ बाबू मुस्कुराये। उनकी मुस्कराहट में कुछ ऐसा था जो बाक़ी दिनों से अलग था।


यह कहानी आपको कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर लिखें

——–

ममता शर्मा

वागर्थ, कथाक्रम, परिकथा, शब्दयोग, साहित्य अमृत, ककसाड़, जनपथ, स्त्रीकाल, अक्षरपर्व, कथा समवेत समेत कई पत्रिकाओं और वेबसाइट पर रचनाएं प्रकाशित

कथा संग्रह मेफ्लाई सी ज़िन्दगी  प्रकाशित

संप्रति : नेशनल इंस्टीट्यूट  ऑफ फाउंड्री एंड फोर्ज टेक्नोलॉजी में हिन्दी अधिकारी

संपर्क : 57, साउथ एंड

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10 Responses

  1. बढि़या..
    अच्छी बुनी हुई…. गौरैया के घोसले की तरह….
    लगता है पृष्ठभूमि में आप का अपना रिटायरमेंट चल रहा है…मुझे अपना लगा…
    बहुत सुंदर..मानवीय संबंधों की तुरपाई और थेगरी भी भली लगी…

    बधाई..
    आपके पास तो लिखने का काम है..आप तो कभी रिटायर हो ही नहीं सकती….
    सादर

  2. अरुण विकास says:

    बहुत अच्छा लिखा आपने।

  3. अरुण विकास says:

    बहुत अच्छा लिखा आपने।

  4. Dr.K.Niranjan says:

    Very Good story

  5. श्यामल रॉय says:

    ममता
    तुम्हारे कहानियों में एक पकड़ है जो पढ़नेवाले को एक सांस में पढ़ने के लिए उत्साहित करता है।
    बहुत अच्छा लगा- सहज सरल भाषा और बिल्कुल जैसे एक picture चल रही हो- यथार्थ के पास।

  6. Dipti says:

    Bahut sunder kahani. Retirement ke bad ka tasbir ap bahut hi sunder se prasphutith kiya is kahani me. Kahani bhi naya type ka hi. Bahut accha laga parne me.

  7. Walter Bhengra Tarun says:

    जोहार ममता जी, शीर्षक के अनुरूप कथानक के साथ भरपूर इंसाफ हुआ है । अनेकानेक बधाइयाँ और शुभकामनाएं!

    • ममता शर्मा says:

      आभार वाल्टर सर।
      आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत खास है।

  8. मुक्तला तिवारी says:

    बहुत अच्छी कहानी है, नौकरी पेशा लोग के जीवन के पड़ाव को शब्दों में पिरोया है, हर किसी कोइससे दो चार होना है । मैं एक लगतार पढ गई, आप को धन्यवाद ।

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