इंसान की कुत्ती ज़िन्दगी की कहानी डॉग स्टोरी

पल-प्रतिपल 85 में प्रकाशित योगेंद्र आहूजा की कहानी पर एक टिप्पणी

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

वे लोग, जो भी हैं और जहां भी हैं, जान लें कि वे केवल जिस्म को खत्म कर सकते हैं, हमारे ख्याल नहीं, खाब नहीं और न उनसे लड़ते रहने का हमारा इरादा।

योगेंद्र आहूजा

इन्हीं ख्याल, ख्वाब और संघर्ष के कथाकार हैं योगेंद्र आहूजा। ऊपर का संवाद उनकी ही कहानी ‘डॉग स्टोरी’ की है। पल-प्रतिपल के 85वें अंक में यह कहानी छपी है। यह अंक इस समय के तीन महत्वपूर्ण कथाकार योगेंद्र आहूजा, मनोज रूपड़ा और ओमा शर्मा पर ही केंद्रित हैं। इसी अंक में छपी बातचीत में योगेंद्र जी कहते हैं,

 

मेरी कोई भी कहानी व्यक्तियों के बारे में नहीं है। वह हमेशा अपने समय के बारे में है, कथा के जरिए वक्त के अंतर्तत्वों को समझ, पकड़ पाने की कोशिश है।

 

समय को पकड़ पाने की दृष्टि हर किसी के पास नहीं  होती। योगेंद्र जी न केवल उसे पकड़ते हैं, बल्कि उसकी बारीक से बारीक परत का विश्लेषण जिस गहराई के साथ करते हैं, वह विरल है। ऐसी क्षमता बहुत कम कथाकारों के पास है। अगर आपने ‘डॉग स्टोरी’ पढ़ी है तो इसके लिए और किसी दूसरे सबूत की जरूरत नहीं है। यह एक बड़े फलक की कहानी है, जो इंसानी ज़िन्दगी की समस्याओं को एक कुत्ते की नज़र से देखती है। ‘कुत्ते की नज़र’  केवल फैंटेसी के लिए नहीं है बल्कि पाठक वाकई उसकी दृष्टि का कायल हो जाता है। मानव व्यवहार के तमाम आयामों के विश्लेषण की ऐसी दृष्टि तो अच्छे से अच्छे इंसानों के पास भी नहीं है।

इस कहानी का नैरेटर एक कुत्ता ही है। नैरेटर अपना परिचय खुद ही देता है ‘‘गलियों में भटकने वाला एक आम, अदना, आवारा कुत्ता। कमजोर, कुपोषित और कटखना। नहीं, अपनी जात के मामूली कुत्तों  की तरह यूं ही जिस तिस को काटते फिरना, यह मेरी  फितरत नहीं, हरगिज नहीं, फिर भी पता नहीं क्यों, हमेशा से, जब से याद कर पाता हूं, एक कटखने कुत्ते के रूप में बदनाम रहा हूं-एक खतरनाक,डरावना, गाढ़े काले रंग का कुख्यात, कटखना  कुत्ता।

वह बच्चों को कहानी सुना रहा है, इसलिए कहानी के शीर्षक से पहले यह भी सूचित किया गया है कि बच्चों की कहानी। सही भी है। बड़ों की एक बहुत बड़ी आबादी अपनी जीभ स्वाद को समर्पित कर चुकी है और अब वहां से प्रतिवाद की कोई आवाज़ नहीं निकलती लेकिन इस कहानी में जो कुत्ते हैं , उनके सीने में तो ऐसी आग जलती रहती है कि उसका  थोड़ा भी हिस्सा अगर इंसानों में आ जाए तो देश को मौजूदा दुर्गति से उबारने में ज्यादा वक्त नहीं लगे।

‘डॉग स्टोरी’ जितनी कुत्तों की दुनिया की कहानी है, उतनी ही इंसानों की  लेकिन इंसान और कुत्तों की जिंदगी की कहानी एक साथ लिखी जा सकती है क्या? नैरेटर की जुबानी ही सुन लीजिए, इन दो दुनिया की कहानियों की क्रोनोलॉजी क्या है:

 

एक कुत्ते की  कहानी वहां, उस पल के बाद शुरू होती है, जहां और जब तुम्हारी—मेरा मतलब है, तुमलोगों, इंसानों की—की कहानी एक शोक संतप्त खामोशी में खत्म हो जाती है। तुम्हारी कहानियों के आगे और पीछे के सिरे जो अंधेरे में गुम होते हैं, उन्हें सिर्फ कोई कुत्ता बयान कर सकता है या कुतिया।

इस कहानी में कुत्तों की दुनिया का संघर्ष है तो आदमी की दुनिया का भी। दोनों दुनिया के भेदभाव, अत्याचार, वंचना, विरोधी की धधकती आग, प्रेम, धोखा, बदला, साजिश सब कुछ है। जो हाल आम गरीब आदमी का है, वही हाल सड़क के गरीब कुत्तों का भी है।

हम तुम्हारी गली के बेघर, गरीब, फटेहाल कुत्ते हैं…इसी मुल्क के, यानी देसी यानी इंडियन’, जिन्हें तुम अक्सर उदास देखते हो, मामूली धमाके से डरकर कान गिरा लेने वाले और हर वक्त भूखे।

नीरजा निषाद अपने अखबार में मजदूरों की आवाज उठाती हैं तो उन्हें ट्रोल किया जाता है, उन्हें गंदी गंदी गालियां दी जाती हैं,  उनका दफ्तर जला दिया जाता है और आखिरकार उनकी हत्या कर दी जाती है। कुत्ते देखते हैं कि आदमी कैसे कुत्तों सी जिंदगी जी रहे हैं। बस्ती फूंक दी जाती है तो बचते हैं, भागते हैं, राख में अपनी तकदीर के अवशेष ढूंढते हैं और फिर उसी जिंदगी में रम जाते हैं। आग लगाने वालों को देखकर कुत्ते तो भौंकते भी हैं, लेकिन बस्तियों में रहने वाले बस भागते रहते हैं, भागते रहते हैं। देसी नस्ल का नैरेटर कुत्ता कहता भी है,

 

अधिकतर किसी ट्रेन के जनरल डिब्बे में गठरियों की तरह ठुंसकर अपने अपने देस वापस जा चुके हैं, छपरा, दरभंगा, बेगूसराय या उसके भी आगे। बाकी बचे उस चौथी रात बस यूं ही इधर उधर लुढ़क जाना चाहते हैं। कोई भी जगह हो, दुकानों के पीछे, फुटपाथ, पुल, रेलवे प्लेटफार्म। मगर हर जगह उनके लिए गालियां हैं, बूटों की धमक हैं, ठोकरें हैं, अजीब दुनिया है तुम इंसानों की।

कुत्ते जानते हैं कि आतिशबाजी का खेल खेलने वाले एक बस्ती जलाकर चैन से नहीं बैठेंगे।

वे इस समय दूसरी बस्ती जलाने की तरकीब बना रहे होंगे, फिर तीसरी, फिर…। उन्हें रोकना जरूरी है वरना वो सब कुछ जला देंगे, पूरे का पूरा मुल्क जला देंगे।

 

कुत्ते मानव बस्ती में ऐसी आतिशबाजी करने वालों को सबक सिखाने की तैयारी करते हैं। उन्होंने तय कर लिया है कि हर हाल में उनका विरोध करना होगा। हम क्या कर रहे हैं, यह तो हम ही जानते हैं।

इस कहानी में किरदार से महत्वपूर्ण वक्त ही है, जिसे योगेंद्र आहूजा ने पकड़ा है, दर्ज किया है। एक ऐसा वक्त जब विरोध की आवाज़ शीर्ष पर बैठे लोगों को पंसद नहीं। बकायदा उनके लोगों की दफ्तर है, जो इस बात पर नज़र रखते हैं कि कहां से उठ रही है विरोध की आवाज़ और फिर उन्हें डराने-धमकाने और मारने का काम शुरू हो जाता है। इस कहानी शुरुआत निम्म वाक्य से होता है

कोई काली सी चीज, कुछ अशुभ और भयानक, पीछा करता महसूस होता था लेकिन साफ नज़र न आता था। कुछ ऐसा जो सब कुछ तबाह करने पर आमादा था…एक काली छाया, नकाब या लबादा, दस्ताना।

इन पंक्तियों में हमारे समय का वक्त नहीं तो और क्या है? हम इसी वक्त  में जी रहे हैं। एक काले और अशुभ साये में जो सबकुछ मिटा देने को तत्पर है। पूरी कहानी इसी वक्त को रेखांकित करती है। इस वक्त के गवाह हैं, वो कुत्ते, जो केवल चश्मदीद ही नहीं बल्कि इस वक्त के खिलाफ गुर्रा कर खड़े हो जाते हैं। ये कुत्ते कौन हैं, क्या ये वाकई कुत्ते ही हैं? मैंने इस कहानी को दो-दो बार पढ़ा और हर बार इन कुत्तों की अक्श देश के गरीब-मेहनतकश वर्ग में नज़र आया। वही लाचारी, वही जीजिवीषा। ‘सारी दुनिया’ अखबार के नीचे जो टैगलाइन था, उसे इस कहानी के नायक कुत्ते ने पढ़ा था लेकिन शुरू का पहला शब्द वह नहीं पढ़ पाया था।

…के पास खोने के लिए जंजीरों के सिवा कुछ नहीं है, जीतने के लिए सारी दुनिया है।

पहला शब्द धूमिल हो गया था, वह पढ़ नहीं पाया। अगर आप सही शब्द ढूंढ लें तो शायद इस सवाल का भी जवाब मिल जाए।

सच्चाई यह है कि ‘डॉग स्टोरी’ इंसान की कुत्ती ज़िन्दगी की कहानी है।