डॉ संगीता गांधी की लघुकथा ‘गंवार’

“ए, ये क्या कर रहा है ?”
खेत के कोने में दीर्घशंका को  बैठे रमेश को देख  चौधरी साहब ने कहा ।
चौधरी साहब  मुम्बई में रहते थे ।गांव में भी घर था तो दो -चार साल में गांव का चक्कर लगा लेते थे ।
……….गांव वाले उनकी नज़र में असभ्य जमात के प्राणी थे ।गांव में सुबह सैर को निकले अपने विदेशी नस्ल के कुत्ते के साथ तो —दीर्घशंका करते हुए रमेश पर नज़र गयी । रमेश को उन्होंने  बेइज्जत करते हुए खूब डांटा –“तुम लोग निरे गंवार ही रहोगे ।इस तरह गन्दगी फैला कर देश की छवि ख़राब करते हो । सरकार घर में शौचालय बनाने के लिए मदद कर रही है ,क्यों नहीं घर में  शौचालय बनवाते ”
” सभ्य समाज के बिल्कुल योग्य नहीं हो तुम लोग ”
रमेश चुपचाप उठा और वहां से चल दिया । उसके घर में विवाह समारोह था ।बहुत मेहमान और गाँव के लोग एकत्र थे ।घर में एक शौचालय था ,जो  बिलकुल खाली न था ।इसलिए वो बाहर आया। यहां व्यंग्य सुनने को मिले ।
थोड़ा आगे जाने पर उसने पीछे मुड़कर देखा —
चौधरी साहब अपने कुत्ते को वहीँ खेत में ” दीर्घशंका ” करवा रहे थे ।
” रमेश पर तंज कसने वाला सभ्य समाज अपनी सभ्यता का प्रदर्शन कर रहा था ” !!
रमेश मुस्कुराया मन में सोचने लगा –” हम तो गंवार हैं ,सभ्य समाज के योग्य नहीं हैं पर ये पढ़े लिखे ,संपन्न लोगों की सभ्यता तो लाजवाब निकली !!!!”

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