सतीश खनगवाल की 3 कविताएं

सतीश खनगवाल
जन्मतिथि – 18 अक्टूबर 1979 (दस्तावेजी)
जन्मस्थान – रायपुर अहीरान, झुनझुनूं (राजस्थान)
सम्प्रति – प्राध्यापक, शिक्षा निदेशालय, दिल्ली।
कृतियाँ – सुलगता हुआ शहर (कविता – संग्रह), विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, लघुकथाएँ, व्यंग लेख, समीक्षाएँ, आदि प्रकाशित।
 
 
 
 
 
  1. वह भी मुरझा जाता है

 

    मुझे देखते ही

    उसका पीला पड़ा चेहरा

    हरा हो जाता है

    दो अदृश्य हाथ

    सहलाते हैं मेरे सिर को

    थाम लेते है मेरे कंधे,

    दो अदृश्य आँखें निहारती हैं मुझे

    और ढुलका देती हैं कुछ बूंदें।

 

     अंदर कदम रखते ही

     खिलखिला जाती हैं

     उसकी दरो-दीवारें

     बाहें फैलाकर करती हैं

     मेरा स्वागत

     देती हैं मेरी माँ को

     मेरे आने की सूचना

     और माँ

     उसके कान अब काम नहीं करते

     पर सुन लेती मेरी पदचापों को

     मीलों दूर से

     उसकी आँखें धुंधला गईं हैं

     पर मेरा अक्स स्पष्ट उभरता है उनमें

     मैं बिना सूचना दिए आता हूँ कई बार

     माँ को भौंचक्का देखने के लिए

     पर दरवाजे पर खड़ी माँ

     मुझे ही भौंचक्का कर देती है हर बार।

 

     माँ-बेटे का यह अद्भुत प्रेम

     अपनी अश्रुपूरित आँखों से देखता है

     फिर किसी कोने से उभरता है उसका स्वर

     ‘कुछ दिन तो रहोगे ना?’

     और हाँ सुनते ही

     वह नाच उठता है।

 

     कुछ दिनों बाद

     मेरे जाने मात्र की खबर से

     बेचैन हो उठता है

     करता है कोशिश रोक लेने को

     बाहर की ओर बढ़ते मेरे कदम

     किंतु वह समझता है

     मेरी विवशता

     जानता है

     अब मैं पंछी हूँ

     मेरा दाना-पानी अन्यत्र है कहीं

     और वह मेरा बसेरा मात्र एक रात का

     मुझे जाता देख

     वह भी मुरझा जाता है

     उसकी भी पलकें हो जाती है गीली

     मेरी माँ की पलकों के साथ।

 

 

  1. ईश्वर नहीं है

 

    सुना है मैंने

     वो पैदा करता है मुझे अपने पैरों से

     क्योंकि मुझे पैदा करते समय

     उसका मस्तिष्क काम नहीं करता

     उसकी छाती कर देती है मना फटने से

     सिकुड़ जाती है नसें नाभि मार्ग की

     जननेन्द्रियाँ हो जाती है अवरुद्ध।

 

     चलों पैरों से ही सही

     पैदा तो उसने ही किया था ना?

     फिर सुध क्यों नहीं ली कभी मेरी?

     फेंक दिया क्यों मुझे

     किसी निरीह की भांति

     भूखे भेड़ियों

     माँस नोचने वाले गिद्धों

     आवारा सांडों

     और नर-पिशाचों के बीच

     जब मन हुआ

     इन भेड़ियों ने किया मेरा शिकार

     मेरा मांस नोच-नोच कर

     भरी इन गिद्धों ने ऊँची-ऊँची उड़ानें

     मार-मार कर सींग

     हटाया मुझे अपने रास्ते से

     इन आवारा सांडों ने

     पी कर मेरा लहू

     लाल हुए गाल इन नरपिशाचों के

     और मैं तड़प-तड़प कर पुकारता रहा उसे

     क्योंकि सुना था मैंने

     दौड़ा चला आता है वो

     दीन-हीनों की पुकार पर

     फिर मेरी पुकार पर कभी

     क्यों नहीं आया वो?

     मैं भी पुकारता रहा हूँ सदियों से

     पता नहीं क्यों

     वह बस देखता रहा

     और होते रहे

     मुझ पर अत्याचार।

 

     हाँ

     ये सत्य है

     नहीं पुकारा मैंने उसे

     कभी मंदिर में घण्टे बजाकर

     नहीं पुकारा मैंने उसे कभी

     वेद-शास्त्रों के मंत्र गाकर

     क्योंकि नहीं दिया उसने

     और उसके पहरेदारों ने

     मुझे इसका अधिकार।

 

     फिर भी पुकारा मैंने उसे

     हृदय की गहराइयों से

     पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ

     मानकर

     वो कण-कण में व्याप्त है।

     परंतु ना कभी वो आया

     और ना उसके होने का कोई प्रमाण।

 

     मेरे सदियों के इस संताप का

     निष्कर्ष

     वो है एक भ्रम

     एक असत्य

     एक व्यापार

     जिसके नाम पर

     लूटा-खसूटा गया मैं

     होता रहा दीन-हीन

     और फलते फूलते रहे

     उसके पहरेदार

     रक्षक और व्यापारी।

  

     किंतु

    आज मिटाकर

    अज्ञानता के अंधेरे

    तोड़ता हूँ सारे भ्रम

    और असत्य का व्यापार

    करता हूँ घोषणा

    वो नहीं है

    कहीं नहीं है

    जिसे पुकारती है ये दुनिया

    कहकर

    हे ईश्वर।

 

  1. मैं हूँ इस देश का किसान

 

              पूछो कभी खेतों में खड़ी हरियाली से

              कितने हाथ काले हैं इनकी दलाली से

              उड़ाते हो चटखारे अपनी थाली से

              पूछ लिया करो कभी हाल इस हाली से

              बुलाते हैं तुम्हें मेरे झोपड़े और मकान

              जी हाँ, मैं हूँ इस देश का किसान।

 

              डाल देते हो चंद सिक्के मेरी झोली में

              बताओ कैसे बिठाऊं, बिटिया को डोली में

              बेटे की जिंदगी बिना फसल के खेत सी

              बंद मुठ्ठी से फिसलती रेत सी

              दब गया कर्ज के बोझ से मेरा जहान

              जी हाँ, मैं हूँ इस देश का किसान

 

              अपने ही नीति-निर्माताओं के समक्ष

              पाता हूँ जब अपने आपको विवश

              डर कर शासन सत्ता की चाल से

              लटक जाता हूँ किसी पेड़ की डाल से

              घर आंगन और खेत बन जाता है मेरा, मसान

              जी हाँ, मैं हूँ इस देश का किसान।

 

              मेरा जीवन मेरी अपनी बाजुओं में

              मेरी मृत्यु राजनीति के तराजुओं में

              मेरा कोई सपना नहीं होता कभी साकार

              मेरी मृत्यु मचा देती है संसद में हाहाकार

              किसी की हार बनती है, किसी की जीत का निशान

              जी हाँ, मैं हूँ इस देश का किसान।

 

 

                                  

             

               

                                  

 

 

 

 

                              

                      

 

           

 

 

    

 

  

 

 

    

  

    

 

 

 

 

    

  

   

 

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