सीमा संगसार की कविता ‘आतंकित प्रेम’

सीमा संगसार

प्रेम किस चिङ़िया का नाम है
उसे तो उङ़ना था
किसी उन्मुक्त गगन में
उसे रहना था 
किसी स्त्री की बेलौस हँसी में ….

बारूदी सुरंगों से 
गुजरता हुआ 
हमारा मुल्क
गोलियों की मार खाए 
कराह रहा है
प्रेम दिवस पर ….

नफरतों के इस दौर म़े
प्रेम की बात करना बेमानी है
जहाँ लोग हर वक्त
बंधे हों संदेह के घेरे में ….

बारूदी गंध म़े 
मौन व्रत रखकर
विषाक्त गैसों को 
अपने सांसों में भरते हुए लोगों से 
संवेदनशीलता की 
अपेक्षा रखना 
घोर मजाक है….

कि एक दिन 
एक हँसता हुआ बच्चा
एक हँसती हुई औरत
और / एक हँसता हुआ मुल्क 
मौत के घाट उतार दिए जाएंगे
एक दिन 
मारी जाएगी उनकी सारी संवेदनाएं
बेमौत ….

गर जीना हो 
इस विषाक्त युग में
तो उन्हें ओढ़ लेनी चाहिए
अपने उपर एक मातमी सन्नाटा…

स्थगित कर दो 
सारे उत्सव प्रेम के 
कि प्रेम एक उत्सव नहीं
शोक गीत है
जिसे गाया जाता है 
शमशानों में
दफन कर देनी चाहिए
प्रेम को 
किसी कब्रिस्तान में
कि धरती पर उग आए हैं
कई विषैले नागफनी
जहाँ प्रेम की मृत्यु निश्चित है ….

सीमा संगसार के फेसबुक वॉल से साभार

 

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