शालिनी मोहन की 4 कविताएं

शालिनी मोहन

विभिन्न राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। ‘अहसास की दहलीज़ पर’ साझा काव्य संग्रह के. जी. पब्लिकेशन द्वारा  2017 में प्रकाशित .  रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से कविता संग्रह ‘दो एकम दो’ वर्ष 2018 में प्रकाशित. 

 वर्तमान पता

फ्लैट नं 402

वंदना रेसिडेंसी अपार्टमेंट

मनीपाल काउन्टी रोड
सिंगसान्द्रा
बंगलुरू(कर्नाटक)-560068

 

1.  सड़कें  

 

सड़कें कितनी लावारिस होती हैं

बिल्कुल आवारा सी दिखती हैं

 

 

बिछी रहती हैं, पसरी रहती हैं, चलती रहती हैं

कभी सीधी, कभी टेढ़ी-मेढ़ी तो कभी टूटी-फूटी

कहीं जाकर घूम जाती हैं, कहीं-कहीं पर 

तो जाकर बिल्कुल ख़त्म हो जाती हैं

चौराहे पर आपस में मिल जाती हैं सड़कें

 

 

कौन होता है इन सड़कों का

कोई भी तो नहीं होता 

कोई होता है क्या?

रोज़ाना कुचली जाती हैं पैरों और गाड़ियों से 

देखती हैं कितने जुलूस, भीड़, आतंक

सहती हैं खून-खराबा और कर्फ्यू

खाँसती हैं धुएँ में और खाँसते-खाँसते 

सड़कें बूढ़ी हो जाती हैं, तपती हैं तेज़ धूप में

बारिश कर देती है पूरी तरह तरबतर

ठिठुरती हैं ठंड में और गुम हो जाती हैं कोहरे में

 

 

सुबह से शाम, शाम से रात और फिर रात से सुबह

सड़कें होती हैं, अकेली, चुपचाप, ख़ामोश

सच तो यह है कि

यही सड़कें कितने ही बेघर लोगों का घर बन जाती हैं

सड़कें कभी सुस्ताती नहीं

भीड़ में और भीड़ के बाद भी रहती हैं ये सड़कें

 

 

2.  टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें

कुछ टेढ़ीमेढ़ी लकीरें दीवार पर

उस बच्चे ने खींची है

रंगों का सारा इन्तज़ाम

उम्र भर का

वो दीवार कभी बेरंग नहीं होगी

लकीरें टूटेंगी उलझेंगी

एक पगडंडी होगी

 कई सालों बाद

 

 

3.  तुम जरूर रोना 

 

जब पहाड़ जैसा दुख 

कलेजे पर आ बैठता है

अंधकार धूप सोख-सोख

दुख को हरा रखता है

 

पहाड़ जैसे दुख को कलेजे पर उठाये

तुम रोना, जरूर रोना

वैसे ही रोना 

जिस तरह भी तुम चाहो, तुम्हें अच्छा लगे

छाती पीट-पीट, दहाड़-दहाड़ 

सबके सामने, अकेले में छुप-छुप

हाथ-पैर पटक-पटक, देह को छोड़

तुम रोना, जरुर रोना

 

दुख को व्यक्त करने की 

उतनी ही आजादी है

जितनी कि खुशी को

इसलिए अपने कठोर दुख, असह्य पीड़ा को

एक छोर से दूसरी छोर तक नाप

तुम रोना, संतुष्टि भर रोना

और जब रोते-रोते तुम्हारी आँखें सूनी हो जाये

सारे खारे पानी को

उलीचना अपने कलेजे पर 

कि गीला रह सके कलेजा

और दुख बना रहे हरा

तुम रोना, जरूर रोना

 

किसी भी दिन  जब टाँगना 

अपना कलेजा खूँटी पर

अपनी सूनी आँखों से

कहना सावन भादो को

कि जब आये 

दे जाये तुम्हारी आँखों में

एक बूँद पानी

तुम रोना, जरूर रोना

 

 

 

 

4.  सादगी 

सादगी को 

जब छुओगे तुम

तुम्हारे हाथ आएँगे ढ़ेर सारे रंग

सब अलग-अलग

टेढ़ी-मेढ़ी, टूटी-फूटी रेखाएँ

उभर कर, स्पष्ट दिखने लगेंगी

 

किसी एक दिन

जब तुम्हारा दिमाग़ बिल्कुल ऊब चुका होगा

सोचने, पहचानने और समझने की अधिकता से

सादगी, तुम्हारे पीछे खड़ी होगी

नंगे पैर

 

 

 

 

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