शंकर की कहानी ‘बत्तियां’

शंकर

हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार।

मशहूर साहित्यिक पत्रिका ‘परिकथा’ के संपादक

थानेदार ने ऊंची आवाज में जो कुछ कहा था, दरअसल वह उसकी अपनी ही बेचैनी और घबड़ाहट का बयान था। सिपाही बिहारी राय और भरत पांडे ने जैसे कल सुना था, वैसे ही आज भी सुना: ‘‘कमबख्तो, मैं हथियार-बम ढूंढ़ू, गुंडे-बदमाशों को धरूं-पकड़ूं या नुकसानों की रिपोर्ट जुटाऊं? तुम दोनों पठान टोली में जाओ और रात में हर घंटे, आध घंटे पर अलग-अलग कोनों से बारी-बारी से जो बत्तियाँ जलायी-बुझायी जा रही हैं, उनका कुछ सुराग लेकर आओ। ये खबरें जाने-माने लोग दे रहे हैं। उन्हें अंदेशा है कि उधर तैयारियाँ चल रही हैं और ये बत्तियाँ इशारों के तौर पर काम में लायी जा रही हैं। नालायको, मिलिटरी पुलिस की गश्तियाँ तुम्हें घंटे-घंटे पर मिलेंगी। निकलो… और सुनो, जैसे ही ऐसी कोई बत्ती दिखाई पड़े, तुम लोग गश्ती दल को ढूंढ़कर खबर करोगे।’’

कस्बा दंगे की आग में जल रहा था। कितने घर जलाये जा चुके थे और कितनी दुकान-गुमटियाँ लूटी जा चुकी थीं,  इसका हिसाब लगाना मुश्किल था। जहाँ-तहाँ हुई छुरेबाजी और किसी को पीट-पीटकर मार दिये जाने के मामले भी ऊपर से थे। फिर एक ही मुहल्ले से एक साथ दस-बारह लोगों को जबदरस्ती पकड़कर ले जाये जाने और इसके बाद उनकी लाशों की बरामदगी ने स्थिति को और भी बदतर बना दिया था।

यह तो अच्छा हुआ कि पाँचवें रोज ही मिलिटरी पुलिस आ गयी और थाने की जिम्मेदारी  अपने आप नेपथ्य में चली गयी।

दोनों सिपाही चुपचाप थाने के टीले से उतर कर आगे बढ़े। धीरे-धीरे चलते हुए वे नवरतन बाज़ार के मोड़ पर आ गये। नौ-साढ़े नौ से ज्यादा नहीं बज रहे होंगे। लेकिन सामने जैसे आधी रात का सन्नाटा था। अगल-बगल भांय-भांय कर रहीं गलियाँ थीं। पिछले पाँच

दिनों से चले आ रहे कर्फ्यू ने कस्बे को जैसे बेजान कर दिया था। जब दिन में ही चहल-पहल की जगहों पर मुर्दानगी छायी रहती है, तब रात तो फिर रात है। सड़क के कुत्ते,  सांढ भी वक्त की मनहूसियत भाँपकर जहाँ-तहाँ दुबके हुए थे। जिस-तिस जगह पर बल्ब टिमटिमा तो रहे थे लेकिन जिंदगी के नामोनिशान वहाँ भी नहीं थे। दोनों सिपाहियों ने अपना-अपना लट्ठ काँख के नीचे दबाया और ठिठक गये। लेकिन थानेदार फिर सामने आ खड़ा हुआ… ‘‘कमबख्तो… नालायको… नामर्दो…।’’

वे फिर बढ़ने लगे। नवरतन बाजार में आकर दोनों कुछ क्षणों के लिए रूके। काफी देर तक गुलजार रहने वाली इस गली में भी जबरदस्त सन्नाटा था। दुकानें मुंह ढांपे डरी-सहमी हुई खड़ी थीं। दोनों नजरें समेटते हुए नवरतन बाजार लांघ गये। टकसाल संघत के पास गली

बायीं तरफ पठानटोली में घुसती थी। दोनों पठानटोली की पहली गली में दाखिल हुए। इस गली के शुरू में पत्थर के कुछ मकान थे लेकिन बाद में ईंट की नंगी दीवारों के मकान थे और इसके बाद तो मिट्ठी की दीवारों से जैसे-तैसे बने मकान। इन्हीं गलियों से पिछले दिनों एक साथ दस-बारह आदमी जबरदस्ती जंगलों की तरफ हाँक लिये गये थे और बाद में उनकी लाशें बरामद हुई थीं।

कुछ आगे बढ़कर दोनों रूक गये। उन्होंने बारी-बारी से आसपास के मकानों पर नजर डाली। कल दो-तीन मकानों पर ही ताले लटके हुए थे। लेकिन आज तो कई मकानों पर ताले झूल रहे थे। बिहारी राय ने इत्मीनान की साँस ली, ‘पनाह के लिए सब के सब कहीं चले गये हैं। यहाँ तो मरघट रो रहा है। यहाँ बत्ती जलायेगा तो कौन जलायेगा और किसके लिए जलायेगा।’  बिहारी राय ने अपनी टोपी उतारी। उसके बाद भरत पांडे ने भी वैसा ही किया।

फिर दोनों ने सहमते हुए गली का चक्कर लगाया। कई-कई जगहों पर रूककर आहट लेने की कोशिशें कीं। एक खाली जगह पर गड़े दो बल्लों की ऊपरी छोर पर टार्च मारी। एक ऊंची छत को घूरा। एक नुक्कड़ पर खड़े होकर जहाँ-जहाँ आँखें जा सकती थीं, दौड़ायीं। चारों तरफ घुप्प अंधेरे के अलावा और कुछ न था। तभी एक घर्राती हुई आवाज उनके कानों से टकरायी। दूसरी तरफ वाली गली से गश्ती दल गुजर रहा था।

बिहारी राय ने पाकिट से थैली निकाली और बनी हुई खैनी की एक चुटकी भरत पांडे को देकर एक चुटकी खुद अपने होंठ में दबा ली। दोनों ने सामने की नाली फांदी और दूसरी तरफ बढ़ गये। पीछे सेहोते हुए यह रास्ता मुहल्ले के दूसरे कोने में निकल जाता था।

इधर झोपड़ियाँ और छोटे-छोटे खपरैले मकान थे। इधर से गुजरते हुए कल दोनों को घिन आयी थी, छिः, कितनी गंदगी से भरा हुआ है यह मुहल्ला। इन बीड़ीवालों, रिक्शा चलाने वालों, ठेला-खोमचा लगाने वालों, सिनेमा का पैम्पलेट बाँटने वालों से अपनी जरूरत भर केरोसिन

तो शायद ही जुट पाता हो। ये क्या खाक बत्ती जला पायेंगे? फिर झोपड़ियों की ठट्टर या खपरैलों पर चढ़कर तो बत्ती दिखायी नहीं जा सकती थी। फिर भी दोनों ने इस गली में भी कई मकानों के पिछवाड़े झाँका। जली हुई आटा मिल की पतली-सी चिमनी को बार-बार घूरा। अचानक उनकी नजर एक ऊंचे बल्ले और उससे बंधी पतंगों पर गयी। क्या पता,

इन पतंगों में ही कोई बत्ती छिपाकर रखी हुई हो। बिहारी राय ने सहम कर इधर-उधर देखा। फिर थोड़ी हिम्मत की और उचका। लेकिन उनके पीछे से कोई बत्ती नहीं दिखायी पड़ी।

ऐसा करके वहाँ आस-पास रूके रहना ज्यादा बड़ी हिम्मत की माँग करता था। वे वहाँ से तेजी से खिसके और हाँफते हुए गली पार कर ली। कुछ दूर आकर दोनों ने अपनी साँसें सम्हालीं। फिर पीछे मुड़कर नजरें जहाँ-तहाँ दौड़ायीं… पूरा टोला अंधेरे में लिपटा था। सिर्फ ऊपरआसमान में टिमटिमाते हुए तारे थे।

‘‘बिहारी भाई… गश्ती दल किस तरफ चला गया?’’ भरत पांडे कुछ कहते-कहते रूक गया। उसने आँखें आसपास घुमायीं। चारों तरफ डरावना सन्नाटा ही था। बगल में मुहल्ले का तीसरा कोना था। उधर बढ़ा जाये या कि यहीं से वापस लौट चला जाये, मन की हलचलों ने उनके पाँवों को कुछ देर के लिए बाँधे रखा, लेकिन कुछ नहीं सूझा तो वे फिलहाल अनमने से

उधर ही बढ़ गये। एक जले हुए मकान के पास दोनों रूके।

‘‘देखो, बिहारी भाई, यह बदरू हकीम का घर था। हमसे पैसे तो नहीं माँगता था लेकिन घंटों इंतजार करवाता था। अब अपने खुदा के हवाले हो गया…।’’ सिपाही भरत पांडे धीरे से खिलखिलाया लेकिन तुरंत ही चौंककर खामोश हो गया।

गली पार करके दोनों एक टूटे-फूटे मकान के पास रूके। भरत पांडे ने कुंडी खटखटायी। दो-तीन बार कुंडी खटखटाने पर भीतर हरकत सी हुई। फिर खिड़की की सुराख के पास एक रोशनी हुई। ‘‘शौकत मियां, हम हैं, तुम्हारे दोस्त। थाने वाले दोस्त। बुरा नहीं मानना। दरअसल हमें चाय की तलब महसूस हुई है।’’ भरत पांडे अपना चेहरा सुराख के पास ले गया और जवाब में टार्च जलायी।

दरवाजा खुला तो दोनों अपने-अपने लट्ठ टेढ़ा करते हुए अंदर दाखिल हो गये। शौकत ने दरवाजा भिड़का कर खाट पास में बिछा दी। दोनों सिपाही खाट पर बैठ गये। शौकत आँगन की तरफ गया। ढन-ढन की कुछ आवाजें आने लग गयीं। शायद उसने अपनी बीवी को जगा दिया था। फिर कुछ ही देर बाद वह दो गिलास और एक कप लिये वापस आ गया। चाय की

सुड़क-सुड़क कमरे की खामोशी को क्षत-विक्षत करने लगी।

‘‘शौकत भाई, हमने हमेशा तुम्हारी मदद की, आगे भी करेंगे। तूने कल पता लगा देने का वायदा किया था। अपना वायदा पूरा करो, शौकत भाई।’’ भरत पांडे ने आँखें शौकत पर गड़ाये रखीं।

सिपाही भरत पांडे और बिहारी राय की आँखों में चाहे जो भी उम्मीद छिपी बैठी हो, सामने कनस्तर पर बैठे शौकत मियां की हंसी उन्हें चौंका गयी, ‘‘आप मेरा यकीन कीजिए, मालिक! वैसी बत्ती कहीं से भी नहीं जलायी जा रही है, ये सिर्फ ख्याली बातें हैं।’’

दोनों सिपाही अनमना सा उठ गये और बाहर निकल आये।

गली में आकर भरत पांडे ने फुफकार छोड़ी, ‘‘इसने भी नहीं बताया। उलटे नाटक कर गया। चलें, हम खुद पता लगायें।’’

दोनों सधे हुए कदमों से आगे बढ़े। हर चीज पर निगाह दौड़ायी। हर छज्जा को टकटकी लगाकर निहारा। मुहल्ले के बीच में बनी कब्र के पास रूककर राय-मशविरा किया। कोई मुंडेर, कोई छत या कोई छज्जा ऐसी नहीं होगी जिसे दोनों की नजरों ने नहीं छुआ। अचानक एक छज्जे पर कोई चीज चमकी। कौन जाने, कोई चिमनी या फानूस हो। दोनों सहमकर रूके। बिहारी राय झुका तो भरत पांडे उसके कंधे का सहारा लेकर उचका। उसने आँखें गड़ा-गड़ा कर देखा लेकिन बदकिस्मती से यह एक मर्तबान थी।

रात धीरे-धीरे आधा के करीब गुजर गयी। कहीं कोई बत्ती नहीं दिखायी पड़ी तो दोनों गली के चौमुहाने के पास आकर खड़े हो गये। तभी घर्राती हुई आवाज उन्हें सुनायी दी। फिर जीप की दो रोशन आँखें दिखीं। दोनों ने अपना-अपना लट्ठ सीधा किया। फिर जयहिंद दागी। जीप आगे बढ़ गयी।

अब मुहल्ले का एक ही कोना बच रहा था। दोनों ने हिम्मत जुटायी, जब इतना हो गया तो बस जल्दी से इसे भी निबटा ही दिया जाये। दोनों थके-हारे मुहल्ले के इस चौथे कोने की तरफ भी बढ़ गये। दोनों ने इधर भी एक-एक जगह छान मारी। यहाँ भी छज्जों और छतों पर नजरें दौड़ायीं। मुंडेरों का अंदाज लिया। आते-जाते हुए मस्जिद की मीनारों पर नजरें गड़ाये रखीं। अचानक उन्हें सलीम बैंड मास्टर के घर के ऊपर इश्तहार के रूप में टंगा भोंपू नजर आ गया। वे चौंक गये। क्या पता, भोंपू में ही रोशनी का कोई इंतजाम हो।

लेकिन बिहारी राय को तभी कुछ सूझा। उसने इधर-उधर देख कर पास के नीम के पेड़ पर उछाल लगायी। फिर एक डाल से दूसरी डाल पर चढ़ते हुए काफी ऊपर तक पहुँच गया।

यहाँ से उसे दूर दूर तक सब कुछ दिखा… उत्तर पश्चिम के कोने में आसपास की तरफ गुमसुम आँखें उठाये रौजे का गुम्बद… उत्तर पूरब के कोने में मदार दरवाजा की मीनारें… छतों पर टेलीविजन के खंभे। गलियाँ, छतें, छज्जे। उसने दुबारा-तिबारा चारों तरपफ निगाहें दौड़ायीं लेकिन कहीं भी कोई जलती हुई बत्ती नहीं थी। बिहारी राय जैसे चढ़ा था, वैसे ही उतर आया।

वापस लौटते हुए दोनों सिपाहियों ने लंबी-लंबी जम्हाई ली। फिर एक ने समय का अंदाजा लेने के ख्याल से आसमान की ओर देखा, रात आधा से ज्यादा सरक गयी थी।

 ‘‘अब तो आँखें भी दुखने लगी हैं।’’ दूसरे ने साँसें छोड़ीं।

दोनों ने अपनी-अपनी उम्र का एक अच्छा-खासा हिस्सा सरकारी नौकरी में गुजारा था। इस छोटे से वाक्य के मतलब से दोनों ही वाकिफ थे।

दोनों गलियाँ पार करते हुए मुहल्ले के बिल्कुल किनारे की तरफ निकल आये। यहाँ गुम्बदवाली मजार थी। इसकी चिकनी चट्टानों पर बच्चे खेलते हैं, सुस्ताते हैं। घंटे-दो-घंटे के आराम के लिए इससे  अच्छी जगह और क्या हो सकती थी? बस एक ही मोड़ के बाद उन्हें मजार पर पहुँच जाना था। वे मुड़े लेकिन मुड़ते ही उन्हें सामने जो कुछ  दिखा, उसने उनके पाँव बाँध लिये। वे चौंके और एकबारगी ठिठक गये।

सामने मजार की कोठरी में रोशनी फैली हुई थी। यह ऐसा क्षण था जब उन्हें अपने भीमसेनी लट्ठ की बनिस्पत अपने तजुर्बे का खयाल ही ज्यादा आया। दोनों ने झटके से खुद को पास की दीवार से सटा लिया।

‘‘थानेदार ने जैसी बत्तियाँ बतायी थीं, वे तो कहीं नहीं हैं। फिर यह वैसी रोशनी…? बस थोड़ी हिम्मत करें।’’  एक फुसफुसाहट उभरी।

अगले क्षण दो परछाइयाँ रेंगते हुए मजार के पिछवाड़े जा पहुँचीं। दोनों ने अंधेरे में हाथों से दीवारों को टटोलना शुरू किया। अचानक उनमें से एक की अंगुलियाँ किसी नुकीली चीज से टकरायीं। उसने पत्थर का टुकड़ा धीरे-धीरे बाहर खींचा। अब सामने एक छोटा-सा छेद था। दूसरे ने छेद पर अपनी आँख गड़ायी। भीतर कोठरों में जो कुछ भी था, वह अब उसकी आँखों की पहुँच में था…।

एक बूढ़ी औरत हाथ में लालटेन लिये दरवाजे पर खड़ी थी। एक नौजवान ने उसे अपने दोनों हाथों से पीछे खींच लेना चाहा। भीतर एक कोने में एक टूटा हुआ बक्सा पड़ा था। दीवार से एक साईकिल खड़ी थी। जमीन पर खिलौनों की एक डोलची पड़ी थी। रंगीन कागज के कुछ टुकड़े, बांस की छोटी-छोटी फोफियां और मिट्टी का एक प्याला पड़े हुए थे।

बूढ़ी औरत ने नौजवान को झटक दिया और फिर बाहर जा खड़ी हुई, ‘‘देखो, तुम भी देखो। मेरा साजिद ही तो आ रहा है। कोई उसे रोशनी तो दिखलाये। शमीम थक गया है… मेरे बेटे साजिद। लो, लो… मैं दिखाती हूँ, रोशनी। आ, आ… साजिद आ, मेरे बेटा, आ…।’’

‘‘अब तो तू सो जा, अम्मी। साजिद को तो दंगाई दुकान से उठा ले गये। अब एक तू बची है। इस तरह तू रात-रात भर जगी तो तू भी नहीं बचेगी। सो जा, अम्मी।’’ शमीम ने अम्मी को घसीटते हुए बिछी हुई टाट तक ला दिया।

अम्मी लालटेन लिये हुए फिर बाहर आ खड़ी हुई है,  ‘‘हाँ-हाँ, मेरे बेटे साजिद, ये ले रोशनी…।’’

शमीम थककर दीवार पर उठंग गया।

‘‘बेटे शमीम, इस साईकिल पर चढ़कर जा। साजिद यहाँ का रास्ता ढूंढ़ रहा होगा। देख, वहाँ देख। मेरे कलेजे का टुकड़ा साजिद आ रहा है। दिखा बेटे, शमीम, उसे रोशनी दिखा।’’ अम्मी शमीम को खींचते हुए साईकिल तक ले आयी।

‘‘रामदेव की यह साईकिल मैं रामदेव को दे आऊंगा, अम्मी। साजिद होता तो मरम्मत से इसमें जान डाल देता। हमारा साजिद अब नहीं लौटेगा, अम्मी…।’’ शमीम की आवाज रूक गयी है और वह अम्मी को पकड़े सुबक-सुबककर रोने लगा है।

‘‘नहीं, नहीं, आ मेरे बेटे साजिद। हम इधर पनाह लिये हुए हैं। आ मेरे बेटे… मेरे कलेजे के टुकड़े…।’’ अम्मी विक्षिप्त सी लालटेन लिये हुए फिर बाहर आ खड़ी हुई थी।

शमीम ने अम्मी को फिर दोनों हाथों से खींचा और घसीटते हुए टाट पर ला बिठाया, ‘‘तू नहीं सोयेगी, अम्मी। ले, बना ये खिलौने। यह साँप, यह पंखा, यह चकरी, यह जोकर, यह मोर, यह तितली, यह सारंगी… और बांसुरिया तो तू ऐसी बनाती है कि दशहरे के मेले में सिर्फ बांसुरियाँ ही बांसुरियाँ बजती हैं। तुझे साजिद की कसम, तू ये बांसुरियाँ बना, अम्मी। बांसुरियाँ मैं पहले से ज्यादा बेच लूंगा, अम्मी। हाँ, अम्मी…

शाबाश अम्मी… बांस की ये फोफियाँ पकड़,  अम्मी… मेरी अच्छी  अम्मी…।’’

अम्मी ने बाँस की फोफियों को छीलना शुरू कर दिया है। कई फोफियों को चिकना करके एक तरफ रखा। शमीम ने प्याले में थोड़ा पानी डाला और अंगुली डुबोयी। रंग अब तैयार था।

 

तभी किसी पत्थर के गिरने की आवाज हुई। इस अनजानी आवाज से कबूतरों का एक झुंड गुम्बद के झरोखे से निकल आया और भटक कर फड़फड़ा उठा। अम्मी ने पल भर रूककर आँखें ऊपर उठायीं। फिर लालटेन की रोशनी तेज कर दी और एक तेज रोशनी फैल गयी।

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