शशांक पांडेय की 7 कविताएं

शशांक पांडेय

सुभाष लाँज,

छित्तुपुर,

बी.एच.यू,

वाराणसी(221005)
● मो.नं-09554505947
● ई.मेल-shashankbhu7@gmail.com

 

1. खिड़कियाँ

मैंने बचपन में
ऐसे बहुत से घर बनाएं और फिर गिरा दिए
जिनमें खिड़कियाँ नहीं थीं
दरवाजें नहीं थे
बाकी सभी घरों की तरह
उस घर में 
मैंने सबकुछ लगाए थे
लेकिन फिर भी 
दुनिया को साफ-साफ और सुंदर देखने के लिए
हर घर में एक खिड़की और दरवाजे होने ही चाहिए।।

2. घर में पिता का ना होना

जब घर में ज्यादा खुशी होती है
तो मैंने देखा है
अपने पिता को उदास होते हुए
मेरे पिता कोई उत्कट विद्वान नहीं है
गाँवों की चारपाइयाँ बहसों में उन्होंने नहीं तोड़ी 
दूसरों पर कीचड़ कभी वे उछाले हो
मुझे याद नहीं 

अपने बच्चों से प्यार किये
यह कहना कविता की पंक्ति नहीं है
उन्होंने हमेशा दूसरों की खुशी में खुशी पाई है
मेरे पिता के सब सपने मेरे सपनों पर भारी है
लोगों ने जितना उनकी भावनाओं का जीवन भर कत्ल किया
अनेक आत्महत्याएं उसके लिये कमतर है
लेकिन वह विशाल हृदय वैसे ही खड़ा रहा
अपने लिए जीवन में 
कभी ढंग का एक कपड़ा भी तो नहीं सिलवा पाए
और लोगों ने क्या-क्या इल्ज़ाम लगा दिए
महानगरों की सैर करते हुए
वे खुश थे कि बच्चे पढ़ रहे हैं
पिता छुप छुपकर रो देते हैं
यह भी केवल हम ही जान पाए अन्य लोग नहीं
इसीलिये किसी भी घर में पिता का ना होना
पीढ़ी से खत्म हो जाना है।।

3. इस देश का नाम भारत है

जब मैंने लिखा-बेईमान
लोगों ने कहना शुरू कर दिया
कि वह धोखेबाज भी है
फिर मैंने लिखा-हत्या
अब सब हत्यारे के पीछे पड़े थे
जब अपने किसी परिचित की मृत्यु पर
मैंने लिखा- 
‘अब वे नहीं रहे’
तब लोगों ने झटपट लिखा-नमन!
फिर,जब मैंने लिखा-व्यवस्था
लोग उसे देने लगे गाली 
लेकिन वहीं जब मैं लिखने लगा-
शिक्षा
गरीबी
किसान
मजदूर
किताब
भुखमरी
आदि-आदि
तब किसी ने नहीं लिखा
इस देश का नाम भारत है।।


4. भावनाएँ

इस धरती पर
कुछ भी उग सकता है
जहाँ बो दो खिलखिलाकर उग आयेंगे
लेकिन जहाँ भरोसा टूटता है
वहाँ कुछ भी नहीं पनपता 
एक जीवन में कितना कुछ बीतता है
एक जीवन में कितने लोग मिलते हैं
एक जीवन में ही कितने लोग 
आपकी भावनाओं का मर्दन करते हैं
कौन कह सकता है कि
प्यार एक खिलवाड़ मात्र है
मैंने छतों से भावनाएँ टूटते देखा है
विश्वास टूटते देखे हैं
भरोसा बिखरते पाया है।।

5. रात भर नींद नहीं आती

काली नींद के बाद
उससे बाहर निकल आना
अनेक सपनों के मर जाने से बेहतर है
हाँ, नींद बिल्कुल भारी नहीं हैं
यदि भारी है तो उसका अंतराल
अब रात भर नींद नहीं आती है
उसकी याद बहुत आती है
उसके हाथ की गर्माहट में कितना कुछ होकर मन में पसरता है
उस चेहरे की बदहवास लालिमा
मुझे अपनी ओर खींच लाती है
रात भर नींद नहीं आती है।

6.  पेड़ों के झड़ने का समय आ गया

नये पत्तों को जन्म देने में
किसी गर्भवती स्त्री से कम दर्द नहीं होता होगा
किसी भी पेड़ को
हम मनुष्य तो 
अपने नवजात को जन्म के समय
कितना छुपाते हैं कि कहीं ठंड न लग जाये
पेड़ों के बच्चों को देखा है आपने
बिल्कुल ठंड में पनपते हैं और ठंड में ही मर जाते हैं
यह पेड़ों के झड़ने का समय है
उनके बच्चों के आत्महत्या का दौर है
हम जानते हैं कि वे बच नहीं सकते चाह कर भी
आदमी बहुत क्रूर है 
पेड़ों की तरह नरम बिल्कुल नहीं।।

7. पाँव

जब भी चौखट पर आती है 
किसी स्त्री की परछाई
लगता है माँ फिर से दस्तक दे रही है जीवन में
उसके देह की महक
चूड़ियों की खनखनाहट
किसी के होने भर से
उसका मुस्कुराहट भरा वो चेहरा
अचानक घुमने लगता है 
मेरे चारों ओर
लेकिन वह नहीं आती 
वह सब परछाइयाँ 
धीरे-धीरे किसी अपरिचित की होने लगती है
माँ गयी तो 
जीवन के रंगमंच पर भी कभी नहीं आयी
मुझको और उदास करने के लिये
आती है तो केवल सपने में
यदि फिर किसी दिन आयेगी सपने में ही
तो उसे बिठा लूँगा बिल्कुल पास
और पूछूँगा-‘कहाँ गयी थी इतने दिनों तक?’
मैं जानता हूँ
वह कुछ नहीं बोलेगी
बस अपने पास बुलाकर बालों में हाथ फेर देगी
उसके बाद 
मैं कुछ कह नहीं पाऊँगा।।

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