रामनगीना मौर्य की कहानी ‘बेचारा कीड़ा’

रेखा चित्र : रोहित प्रसाद पथिक

‘तू शायर है, मैं तेरी शायरी’…समर अपने मोबाइल के ‘सिंग-टोन’ पर जगा। लेकिन,फोन तुरन्त बन्द भी हो गया। शायद, किसी का मिस्सड-कॉल था। असमय नींद टूटने से समर को झल्लाहट हुई। फोन बन्द हो चुका था, सो इतनी सुबह किसका फोन हो सकता है? ये देखने वास्ते उसने हाथ बढ़ाकर फोन उठाने की जहमत नहीं उठायी।

      वह दोबारा सोने की कोशिश कर ही रहा था कि उसके मोबाइल का मैसेज ट्यून गूंजा। उसकी तन्द्रा फिर टूटी। इस बार उसने फोन देखा, और मैसेज पढ़ा। किसी इन्श्योरेन्स-कम्पनी की ओर से उसे जन्मदिन की बधाई दी गयी थी। उसकी निगाह सामने की दीवार पर टंगे, ‘गांव की गोरी’ की तस्वीर वाले कैलेण्डर पर गयी। उसे याद आया, आज मार्च महीने की तेइस तारीख है। अभिलेखों के अनुसार आज उसका जन्मदिन है।

     वैसे तेइस के अंक को समर अपने लिए शुभ ही मानता आया है। इस अंक के साथ उसकी ढ़ेरों सुखद यादें जुड़ी हैं। तेइस साल की उम्र में उसे नौकरी मिली। एंट्रेन्स-इग्जाम में उसकी तेइसवीं रैंक थी। साइन्टिस्ट से सीनियर-साइन्टिस्ट के पद पर उसका प्रमोशन भी तेइस नवम्बर को हुआ था। अपने ऑफिस में जहां वो बैठता है, उस कमरे का नम्बर भी तेइस ही है। उसे यकीन था कि भूमिका की उम्र भी तेइस साल ही होगी।

       लेकिन, आज तो उसे वर्तिका ने स्टेशन पर मिलने के लिए बुलाया है। पता नहीं क्या कहना होगा उसे? समर थोड़ी देर और सोना चाहता था। पर अचानक ही उसे वर्तिका की ट्रेन का खयाल आया। मोबाइल में उसने टाइम देखा। वर्तिका की ट्रेन आने में अभी लगभग एक-डेढ़ घण्टा बाकी था। वो थोड़ा निश्चिन्त हुआ। इतनी देर में तो आराम से फ्रेश होकर, नहा-धोकर…स्टेशन पहुंचा जा सकता है। अपने आज के कार्यक्रम की हवाई रूपरेखा बनाते, वो झट उठा और गुसलखाने में घुस गया।

      गुसलखाने से निबटने के बाद अब वो मंजन करने वास्ते वाश-बेसिन के आगे खड़ा था। मंजन करते वक्त वॉश-बेसिन में अपना चेहरा देखते उसने महसूस किया कि उसके गालों और ठुड्ढ़ी पर हल्की खस-खस खूंटियां सी निकल आयीं हैं। लड़की से मुलाकात करने जाना है, वो भी ऐसी मनहूस सूरत बनाये, अच्छा इम्प्रेशन नहीं पड़ेगा। यही सोच उसने मंजन करने के बाद झट शेव भी कर लिया।

      शेव के बाद समर ने जब आईने में खुद को देखा तो मन-ही-मन बड़बड़ाया…‘चेहरे-मोहरे से तो मैं कहीं से भी खूबसूरत-आकर्षक नहीं दिखता, फिर भी जाने क्यूं वर्तिका मुझ पर जान छिड़कती है?’…आईने में अपना थोबड़ा देखते उसे, हाल ही में पढ़ी ‘टॉलस्टॉय’ की ये उक्ति बरबस ही याद आ गयीं…‘‘औरतें अक्सर अनाकर्षक और सीधे-सादे आदमियों को ही पसन्द करती हैं।’’

      डार्क-ग्रे शर्ट और स्टील-ग्रे पैण्ट…तिस पर ताजा पॉलिश किए हुए चमचमाते जूतों के धज में वो कमरे से बाहर निकला। उसने अपने मोबाइल में टाइम देखा। अभी ट्रेन आने में काफी टाइम था। क्यों न सड़क उस पार ढाबे पर ही कुछ नाश्ता कर लिया जाय? यही सोच दरवाजे पर ताला डालते, स्कूटर पर सवार हो, सड़क उस पार ढाबे पर चला गया। ढाबे पर चाय-टोस्ट और दो उबले अण्डों का ऑर्डर देकर वो वहीं टेबल पर रखा अखबार उलटने-पलटने लगा।

     अखबार के पन्ने उलटने की कवायद वो कर ही रहा था कि उसे अपने बाएं पैर में कुछ चुभने सा महसूस हुआ। उसने बाएं पैर को एक तरफ झटका दिया, और खड़ा हो गया। पिछली रात एक बस डिवाइडर पर चढ़ गयी थी। अखबार में छपी उसकी फोटू देखते, ‘सान्नूं की फरक पैंदा ए.’..का सा हाव-भाव दर्शाते…नाश्ते का पेमेण्ट करने के बाद, वो स्टेशन की ओर बढ़ चला।

      समर की दुविधा भी अजीब थी। वो न तो वर्तिका से सम्बन्ध तोड़ना चाहता था, न भूमिका को ही अपनी जिन्दगी से अलग करना चाहता था। वर्तिका से हालांकि उसका परिचय डेढ़-दो साल पुराना था, पर इधर कुछ महीनों से वर्तिका जिस फील्ड में काम करती थी, वहां ज्यादा व्यस्त होने के कारण, उसकी समर से मुलाकात कम ही हो पा रही थी। समर को भी लग रहा था जैसे, वर्तिका का अब दिनों-दिन उसमें इण्ट्रेस्ट कम होने लगा है।

     वर्तिका से मिलना-जुलना कम होने की वजह से इधर समर अपने ऑफिस की नई कॅलीग भूमिका में कुछ ज्यादा ही इण्ट्रेस्ट लेने लगा था। चूंकि समर और भूमिका एक ही डोमेन में काम कर रहे थे, और भूमिका को ट्रेनिंग दिलाने का काम बॉस ने समर को ही सौंप रखा था। ऑफिस में पहले दिन के सामान्य इण्ट्रोडक्शन में ही समर ने भूमिका से उसका डिटेल जान लिया। समर जैसे मेधावी के अधीन वो काम-काज सीखेगी, यह सोच कर ही भूमिका अभिभूत थी।

     समर को भूमिका से बातों-बातों में ये भी पता चला था कि वह यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री के जिन प्रोफेसर चटर्जी के अण्डर में पी.एच.डी. के लिए एनरोल्ड था, भूमिका उन्हीं की बेटी है।

     पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई खत्म करते ही समर को केमिकल-फैक्ट्री में साइंटिस्ट की जॉब मिल गयी थी, जिससे वो अपनी पी.एच.डी. पूरी नहीं कर पाया। आज वह इस केमिकल-फैक्ट्री में सीनियर- साइंटिस्ट के पद पर काम कर रहा है, और भूमिका उसकी जूनियर-असिस्टेन्ट है।

      खैर…ये तो बात हुई कहानी में आये पात्रों की पृष्ठभूमि की। अब चर्चा समर की दुविधा की…जहां से कहानी में नया मोड़ आना है।

     कल शाम को ही वर्तिका का फोन आया था। वो समर से मिलना चाहती थी, और कुछ परेशान भी लग रही थी। समर से मिल कर डिटेल बात करना चाहती थी।

     इस समय वो, प्लेटफॉर्म-टिकट लेकर वर्तिका का इन्तजार कर रहा था। प्लेटफॉर्म स्थित बेंच पर बैठने की वो सोच ही रहा था कि उसने अपने जूते में फिर कुछ काटने-रेंगने सा महसूस किया, और बाएं पैर को झटका। आज सुबह से ही समर के बाएं पैर के जूते में रह-रह कर कुछ काट रहा था…पर उसे इत्मिनान से कहीं बैठकर जूते उतारकर देखने का मौका नहीं मिल पा रहा था। बेंच पर बैठते समर ने एक बार फिर अपने बाएं पैर को झटका, उसे अपने पैर में फिर कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ। समर ने प्लेटफॉर्म पर ही सामने लगी घड़ी देखी। घड़ी देखते उसे लगा…आज समय बहुत धीमे-धीमे बीत रहा है।

    बेंच पर बैठे-बैठे समर को ऊब सी महसूस होने लगी थी। ‘गारण्टीशुदा शर्तिया इलाज। बांझपन अब अभिशाप नहीं। चमत्कारी बाबा शट-अप से गेट-अप तक…तीस दिनों में अंग्रेजी सीखें। रोजगार ही रोजगार। विग से छुटकारा पाएं। गुमशुदा की तलाश।’ अभी समर, प्लेटफॉर्म पर जगह-जगह चिपकाये गये किसिम-किसिम के इन इश्तिहारों को पढ़ने की असफल कोशिश कर ही रहा था कि प्लेटफॉर्म पर धड़धड़ाते हुए ट्रेन का आगमन हुआ। ट्रेन के आते ही हमेशा की तरह समर अपनी जानी-पहचानी बुक-स्टाल पर जाकर खड़ा हो गया। वर्तिका से उसी दुकान के सामने मिलने की बात तय हुई थी। समर को बुक-स्टाल पर खडे़ हुए अभी पांच मिनट ही हुए होंगे कि सामने से वर्तिका आती दिखाई दी।

     समर ने एक बार फिर अपने बाएं पैर को झटका, उसे अपने पैर में फिर कुछ चुभता हुआ सा महसूस हुआ।

   ‘‘सॉरी यार! आज ट्रेन कुछ ज्यादा ही लेट हो गयी…तुम्हें इन्तजार करना पड़ा होगा न?’’

   ‘‘नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुआ…ऐसे मौकों पर तो तुम जानती ही हो, मैं खुद को व्यस्त रखने का कोई-न-कोई तरीका ईजाद कर ही लेता हूं। आज भी मैं यहां प्लेटफॉर्म पर लोगों की बॉडी-लैंग्वेज से, उनके अन्दर क्या-कुछ चल रहा होगा, वे खुद से या एक-दूसरे से क्या कुछ बतिया रहे होंगे इत्यादि बातों को लेकर अपने तरीके उनका अध्ययन कर रहा था। फिलहाल तुम बताओ कैसी हो? मुझसे कुछ खास बात करनी है क्या?’’

     ‘‘अरे भई…तुमने तो आते ही धड़ाधड़ क्वेश्चन-पर-क्वेश्चन दागने शुरू कर दिये। दो घड़ी सांस तो लेने दो। बतियाने के लिए हमारे पास पूरा दिन है, और फिर तुमसे इतने दिनों बाद मिल रही हूं। ये क्या कम खास बात है, हम-दोनों के लिए?’’

     ‘फिर आज कहां ले चलने का इरादा है? सिटी-कैफे में चलना है या किसी मॉल में पिक्चर-सिक्चर देखने-घूमने के बाद किसी अच्छे से रेस्त्रां में खाना खा कर तुम अपने घर, मैं अपने घर, क्यों यही इरादा है न?’’ ये बातें समर ने थोड़ा अनमने, पर विश्वसनीय तरीके कही थी।

    ‘‘अभी तो आयी हूं…और तुम अभी ही जाने की बातें भी करने लगे। आज हम अपने प्रिय पार्क, फव्वारे वाले तिकोनिया-पार्क में चलेंगे। वहां इत्मिनान से बैठ कर बातें-वातें करेंगे। मैं, हम-दोनों के खाने-भर का टिफिन साथ ले आयी हूं। खाने की टेन्शन मत लो तुम। खाने के बाद हम वहीं पार्क स्थित रेस्त्रां में चल कर काफी-वाफी भी पियेंगे।’’

    ‘‘बस्स. इसी काम के लिए तुमने मुझे बुलाया है?’’

    ‘‘नहीं…मुझे तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी हैं।’’

    ‘‘वो बातें यहां नहीं हो सकतीं क्या?’’

    ‘‘कत्तई नहीं, वहीं चल कर बताऊंगी। मामला गम्भीर है, स्थिर मन से तुम्हारी राय जानना चाहती हूं। अब चलो भी।’’

   ‘‘जैसी तुम्हारी मर्जी।’’ वर्तिका इस बार कोई प्रति-प्रश्न करने के बजाय समर को लगभग ठेलते, उसका हाथ पकड़ कर प्लेटफॉर्म से बाहर आ गयी।

    समर ने एक बार फिर अपने बाएं पैर को झटका, उसे अपने पैर में फिर कुछ चुभता हुआ सा महसूस हुआ।

    समर ने पार्किंग से अपनी स्कूटर निकाली, और वे दोनों तिकोनियां पार्क की ओर चल दिये। अगले पन्द्रह मिनट बाद वे दोनों, तिकोनिया-पार्क के मेन-गेट पर थे। 

   ‘‘किधर चला जाये?’’ समर ने वर्तिका से पूछा।

   ‘‘कहीं किनारे चलते हैं…आज तो पार्क में काफी भींड़ दिख रही है।’’

   समर ने एक बार फिर अपने बाएं पैर को झटका, उसे अपने पैर में फिर कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ।

   वर्तिका की नजरें पार्क में सुकून का कोई कोना ढ़ूंढ़ रही थीं, और बेशक…समर भी चाहता था कि इस बार वो जहां कहीं भी बैठेगा…सबसे पहले अपने जूते उतार कर, उसके काटने की वजह जानने की कोशिश करेगा।

   वो दोनों पार्क में कोई छांह वाली जगह अभी तलाश ही रहे थे कि उन्होंने देखा, इमली के पेड़ के नीचे वाले पत्थरों की बेंच पर बैठा वो जोड़ा अभी-अभी उठा है। शायद उनकी बातें खत्म हो गई होंगी या हो सकता हो उन्होंने समर और वर्तिका को अपनी तरफ आता देख, कुछ असहज सा महसूस किया हो, और वहां से जाने का इरादा कर लिया हो।

    वर्तिका ने समर को वहां चल कर, बैठने का इशारा किया।

   ‘‘समर, मैं जो कहने जा रही हूं उसे ध्यान से सुनना, और अपनी स्पष्ट राय देना। मैं तुम्हारा मशविरा लेने आई हूं।’’

   ‘‘हां बोलो…क्या कहना है…काफी देर से तुमने रहस्य बना रखा है…लगता है कुछ गम्भीर बात कहनी है तुम्हें?’’

  ‘‘समर, शायद इतनी ही दूर तक हमारी किस्मत में साथ-साथ चलना लिखा था। आज के बाद, जीवन-पथ पर तुम्हारे और मेरे रास्ते अलग-अलग हो रहे हैं। मैं, तुम्हारे उज्ज्वल भविष्य की कामना ही कर सकती हूं। उम्मीद है हम हमेशा अच्छे दोस्त बने रहेंगे, और कभी-कभार मिलेंगे भी। तुम कोई अच्छी सी लड़की देख कर शादी कर लेना।’’ अपने हैण्ड-बैग में रखे टिफिन से टोस्ट का एक टुकड़ा निकाल कर समर की ओर बढ़ाते, बिना किसी पृष्ठभूमि के, वर्तिका ने समर से कहना शुरू किया।

   ‘‘काफी अच्छे डायलॉग्स हैं। तुम्हारा ये नाटक जरूर सफल होगा। क्या नाम है, तुम्हारे इस नाटक का?’’

  ‘‘मैं नाटक की बात नहीं कर रही हूं…ये रियलिटी है।’’

  ‘‘ओह…कम्मऑन वर्तिका….ये ठीक है कि तुम स्टेज-नाटकों में काम करती हो, पर जरूरी नहीं कि उनका रिहर्सल तुम मेरे साथ करो। ये रिहर्सल तुम अपने घर पर या अपने नाटक टीम के साथ भी तो कर सकती हो…?’’ वर्तिका के मुंह से ऐसे नाटकीय संवाद सुनकर, समर ने तनिक झुंझलाते हुए कहा।

   ‘‘समर, तुम अभी भी सीरियस नहीं हो। काश कि ये नाटक होता।’’ इस बार वर्तिका गम्भीर थी।

  ‘‘पर तुमने तो कहा था कि तुम अभी कुछ वर्षों तक नाटकों में ही अपना कैरियर बनाने का इरादा रखती हो, तुम्हारा अभी शादी-वादी करने का कोई इरादा नहीं है। फिर ये अचानक क्या हुआ?’’ इस बार समर गम्भीर था।

  ‘‘समर मैं खुद चाहती थी कि कुछ साल तक अपने स्टेज के कैरियर पर ही ध्यान दूं पर तुम तो जानते ही हो हर मां-बाप की तरह मेरे मां-बाप को भी मेरी शादी की चिन्ता है। मेरे पापा के एक दोस्त हैं। उन्होंने कभी मुझे देखा होगा। उनका बेटा इन्जीनियर है, और अमेरिका में सैटल है। उन्होंने ही पापा से अपने बेटे के लिए मेरा रिश्ता मांगा था, और पापा ने इस रिश्ते के लिए हां कह दी।’’

   ‘‘क्या तुम्हारे पापा को हमारी दोस्ती के बारे में जानकारी नहीं?’’

  ‘‘क्यों नहीं जानकारी है, पूरी जानकारी है। बल्कि, कभी-कभी तो मेरी अनुपस्थिति में उन्होंने ही तुम्हारा फोन अटेण्ड किया है। उन्होंने मुझसे तुम्हारे बारे में पूछा भी था। मैंने उन्हें बता रखा है कि हम, सिम्पली दोस्त हैं। उन्होंने हमारी दोस्ती को कभी गम्भीरता से नहीं लिया। वो इसे इस उम्र का आकर्षण मात्र मानते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं।’’

  ‘‘और तुम्म…?’’

  ‘‘देखो समर, बी प्रैक्टिकल। आजकल कौन नहीं चाहता एक वेल-सैटल्ड, सेफ एण्ड सेक्योर लाइफ…? फिर तुम भी तो हमारे रिश्ते को लेकर कभी गम्भीर नहीं रहे। हम लगभग डेढ़-दो साल से तो एक-दूसरे को जानते ही हैं, और बराबर मिलते भी रहे हैं। ये तुम भी जानते हो कि इस बीच मेरे पापा का ट्रांसफर कानपुर हो गया तो हमारा मिलना-जुलना थोड़ा मुश्किल हो गया। या तो तुम कभी काम-काज के बहाने कानपुर आ जाते हो, या मैं नाटकों के सिलसिले में यहां आ जाती हूं। मैंने इस बारे में तुम्हें एक-दो बार संकेत भी किया था कि पापा से बात कर लो, पर इस बीच मैंने ये भी महसूस किया है कि शायद तुम, हमारे रिश्ते को लेकर…गम्भीर नहीं हो? मैंने अन्दाज लगाया…शायद तुम अपने काम में ज्यादा व्यस्त हो गये हो। तुमसे बात किये भी दो-दो…तीन-तीन दिन हो जाते हैं। कभी तुम्हारा फोन इंगेज रहता है तो कभी तुम ही बात नहीं करते। यही सब सोच कर मैंने आज तुमसे मिल कर डिटेल बात करने की सोची, ताकि इस मसले पर मैं तुम्हारी स्पष्ट राय जान सकूं। अब बोलो…तुम क्या कहते हो…?’’

  ‘अब जब तुमने तय कर ही लिया है तो भला मैं क्या कह सकता हूं, सिवाय तुम्हें शुभकामनाएं देने के।’’

   ‘‘फिर भी मेरा निर्णय सही है या गलत, तुम इस बारे में कुछ नहीं कहोगे?’’

  ‘‘देखो वर्तिका, आज वो पुराना वाला जमाना तो रहा नहीं, जब घर-बाहर के ज्यादातर मामलों में निर्णय बड़े-बुजुर्ग पुरूष सदस्य ही लेते थे। आज अपने भविष्य…अपने कैरियर के बारे में महिलाएं स्वयं निर्णय ले सकती हैं, और फिर जीवन-साथी चुनने का तुम्हें अधिकार भी है।’’

  ‘‘पर तुम भी प्रॉमिश करो। तुम एक अच्छी सी लड़की देख कर जल्दी ही शादी कर लोगे। देखो अपनी शादी में मुझे बुलाना मत भूलना।’’

  ‘‘तुम्हारी जैसी अच्छी सी लड़की। मिलेगी…?’’

  ‘‘हां-हां क्यों नहीं? अगर देखने का नजरिया दुरूस्त हो, तो तुम्हें तुम्हारी पसन्द की अच्छी लड़की जरूर मिल जायेगी, जो तुम्हें समझ सके, जिसका तुम भी साथ दे सको। जो तुम्हारी हमखयाल हो। फिर तुम्हारे उज्ज्वल भविष्य के लिए ये जरूरी भी तो है। देखो, तुम मुझे कभी भूलना मत। न मैं तुम्हें कभी भूलूंगी। आखिर तुम, मेरा पहला प्यार जो हो।’’

   कहानी की पृष्ठभूमि के बारे में ही यहां कुछ और उपयोगी जानकारी देना उपयुक्त एवं प्रसंगानुकूल होगा।

 वर्तिका की समर से मुलाकात नाटकों के सिलसिले में ही हुई थी। एक चैरिटी-शो का टिकट बेचने वो समर के दफ्तर आयी थी। वर्तिका की बातों से प्रभावित हो उसने अपने साथ अपने सहयोगियों से भी टिकट खरीदने का अनुरोध किया था। अगले दिन समर अपने सहकर्मियों के साथ वर्तिका का नाटक देखने वास्ते प्रेक्षागृह में मौजूद था। इससे वर्तिका, समर से अत्यन्त प्रभावित हुई थी। फिर कालान्तर में समर, वर्तिका के लगभग सभी नाटकों को देखने जाने लगा। इस तरह दोनों कब अच्छे दोस्त हो गये वो जान ही नहीं पाये। उसी बीच वर्तिका के पिता का इस शहर से ट्रांसफर हो जाने के कारण उनका मिलना-जुलना कम हो गया। इसी बीच समर के दफ्तर में नवनियुक्त साइंटिस्ट भूमिका को काम आदि समझाने की जिम्मेदारी समर को मिल गयी। भूमिका खूबसूरत और सौम्य लड़की थी। एक तरह से देखा जाय तो रचनाकारों के मन में एक बाइस-तेइस साल की युवती की खूबसूरती को लेकर जो मापदण्ड बसते हैं, भूमिका उन सब पर खरी उतरती थी। काम-काज के सिलसिले में समर कब भूमिका के अत्यन्त नजदीक होता चला गया उसे पता ही नहीं चला।

   ऐसा नहीं कि समर के मन में सिर्फ वर्तिका को लेकर ही दुविधा हो। उसके मन में भूमिका को लेकर भी उतनी ही दुविधा थी। उसे हमेशा ही लगता, जैसे वो तो भूमिका को चाहता है परन्तु क्या भूमिका भी उसे उतना ही चाहती है? भूमिका को लेकर अपने भविष्य के जो सपने संजोये बैठा है, क्या भूमिका के मन में भी वही सब कुछ चल रहा है? काहे से कि भूमिका ने अपने हाव-भाव से कभी ऐसा कुछ संकेत नहीं दिया था, जिससे समर निश्चिन्त हो सके। कार्य-स्थल पर भूमिका केवल अपने काम-से-काम रखती थी।

    इन्हीं उहा-पोह में वो अभी कुछ भी नहीं तय कर पा रहा था कि उस दिन शाम को वर्तिका का फोन आ गया। वो समर से मिलना चाहती थी। वर्तिका को उससे क्या कहना था, यही सोच कर, वो पूरी रात ऊभ-चूभ होता रहा था।

   ‘‘अब हम चलें? हमें काफी देर हो गयी यहां बैठे-बैठे।’’ समर ने वर्तिका से कहा।

   ‘‘इतनी जल्दी ऊब गये। क्या बात है? अब तुममें, मुझसे मिलने की वैसी गर्मजोशी नहीं रही?’’

   ‘‘नहीं ऐसी बात नहीं है वर्तिका। आजकल दफ्तर में, काम बहुत ज्यादा हो गया है। ऊपर से टारगेट पूरा करने का दबाव भी है। कभी-कभी तो ओवर-टाइम भी करना पड़ जाता है।’’

   ‘‘अभी तुम्हारे पास इतना समय तो होगा ही कि हम कम-अज-कम, एक-एक कप कॉफी साथ-साथ पी सकते हैं?’’

    ‘‘ओह! श्योर, व्हाई नॉट? चलो वहां कॉफी-शॉप में चलते हैं।’’

   समर ने खड़े होकर अपने पैण्ट की धूल झाड़ी, और वर्तिका के साथ कॉफी-शॉप की ओर चल दिया। समर ने एक बार फिर अपने बाएं पैर को झटका, उसे अपने पैर में फिर कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ।

   कॉफी पीकर समर और वर्तिका पार्क से बाहर निकले। समर के मन-मस्तिष्क में ढ़ेरों विचार आलोड़न-विलोड़न हो रहे थे।        

   समर ने स्कूटर, पार्किंग से निकाली, और वर्तिका को वापस स्टेशन छोड़ने के लिए अपनी स्कूटर स्टेशन की ओर मोड़ दी। हालांकि उसी समय उसने अपने बाएं पैर के जूते में फिर से चुभन सी महसूस की थी।

    वर्तिका को स्टेशन तक छोड़ने के बाद लौटते वक्त, समर काफी हल्का महसूस कर रहा था। रात के खाने के लिए उसने रास्ते में ही खाना पैक करवाया। स्कूटर चलाते…‘‘छोटी सी ये दुनिया…पहचाने रास्ते हैं…’’ गुनगुनाते हुए वो ये सोच कर मुतमैयन था कि वर्तिका ने उसकी मुश्किल खुद ही आसान कर दी थी। अब वो किसी दिन अच्छा सा मौंका देख कर भूमिका को आसानी से प्रपोज कर सकता है।

    इसी धुन में मगन वो कब घर पहुंच गया उसे पता ही नहीं चला। उसकी तन्द्रा तब टूटी जब समर ने अपने बाएं पैर में फिर कुछ चुभता हुआ सा महसूस किया। एक बार फिर उसने अपने बाएं पैर को जोर से झटका। स्कूटर स्टैण्ड पर लगाकर, अपने घर के दरवाजे का ताला खोलते, उसने सोचा कि घर में घुसते ही, सबसे पहले वो इस जूते को उतार कर देखेगा…कि उसके जूते में क्या चीज है, जो आज सुबह से ही उसे चुभ रही है। जिसने उसे पूरे दिन तंग कर रखा।

   दरवाजा खोल कर वो घर के अन्दर आ गया। तखत पर बैठते उसने सबसे पहले अपने जूतों के तस्में खोले। बाएं पैर के जूते में हाथ डाल कर देखा, पर वहा उसे कुछ भी चुभने जैसी चीज नजर नहीं आयी। तभी अपने बांएं पैर में फिर उसे कुछ रेंगता हुआ सा महसूस हुआ। इस बार उसने अपने मोजे उतारे। बाएं पैर का मोजा उलटते ही उसमें से एक छोटा सा कीड़ा निकला, जिसे उसने झटका तो वो कीड़ा झट वहां से भाग कर तखत के नीचे चला गया। समर ने जब उसे ध्यान से देखने के लिए तखत के नीचे झांकना चाहा, तो देखा कि अब वो कीड़ा वहां नहीं है। शायद तखत के नीचे जाकर कहीं गायब हो गया था।

    ‘सुबह घर से निकलने से लेकर शाम को घर आने के बीच में मैं जो भी खट्टे-मीठे अनुभव लेता रहा…ये बेचारा कीड़ा भी मेरे अनुभवों को साझा करते, उन  देश- काल- स्थिति- परिस्थिति का मूक साक्षी रहा। इसके बार-बार दबने या काटने के वाबजूद भी मैं लापरवाह बना रहा। इसे हो रही पीड़ा से मैं अनजान रहा…शायद तभी ही ये भी अपने बचाव में मुझे काटता रहा। वाबजूद पूरे दिन मेरे साथ चहलकदमी करते, मोजे में रहते, तमाम झंझावात झेलने के, ये जिन्दा रहा…‘सारी यार! कीड़े भाई। आय एम एक्स्ट्रीमॅली…वेरी-वेरी सॉरी…!’…थोड़ी देर तक समर, खुद से जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहा।

     जूते-मोजे उतारकर हाथ-मुंह धोने के बाद, तखत पर ही बैठ कर खाने का पैकेट खोलते, समाचार सुनने की ललकवश, उसने टी.वी. ऑन किया।…‘‘किताबों में छपते हैं चाहत के किस्से, हकीकत की दुनिया में चाहत नहीं है’’…टी.वी. खोलते ही एक चैनल पर ये गाना आ रहा था। पूरा गाना सुनने के बाद, अगले क्षण कोई विज्ञापन आ जाने के कारण उसने टी.वी. बन्द कर दिया, और जल्दी-जल्दी खाना खाकर, सोने का उपक्रम करते सिरहाने रखी किताब लेकर पढ़ने लगा। पर उसकी आंखों में नींद कहां, वो तो अगले दिन भूमिका से मिलने को बेताब था। भूमिका के खयालों में खोया, वो कब सो गया, उसे पता ही नहीं चला।  

  अगले दिन दफ्तर पहुंचते, समर अपनी सीट पर आकर बैठते आज के कार्यों की लिस्ट, अभी पढ़ ही रहा था कि उसके चैम्बर में भूमिका ने प्रवेश किया।

 ‘‘मे आई कम इन सर?’’       

 ‘‘ओह…भूमिका, कम इन!’’

 ‘‘सर…ये मेरी शादी का कार्ड है।’’ भूमिका ने उसकी मेज के सामने पड़ी कुर्सी खींचते बैठते हुए, समर के हाथों में अपनी शादी का एक खूबसूरत सा कार्ड दिया। ‘भूमिका वेड्स…’, इसके आगे की सुनहली इबारतें वो ठीक से पढ़ नहीं पाया। कार्ड देख कर समर की आंखों के सामने पहले हल्का…फिर गहरा…धुंधलका…अंततः अंधेरा सा छा गया। समर को प्रकृतिस्थ होने में एक-दो मिनट लगे। सामने मेज पर पड़ा, शादी का कार्ड उसे चिढ़ाता नजर आया। समर को महसूस हुआ…जैसे किसी कीड़े ने उसके बांएं कान के नीचे जोर से काटा हो। उसने एक जोरदार थप्पड़ अपने कान के नीचे जमाते…उस कीड़े को मसलना चाहा। पर अफसोस कि वो कीड़ा, वहां से उड़ने में कामयाब हो गया था। सिवाय हथेलियां मलने के, समर के हाथ कुछ भी नहीं लगा।

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रामनगीना मौर्य
5/348 विराज खण्ड-गोमती नगर
लखनऊ- 226010-उत्तर प्रदेश
मोबाइल नम्बर-9450648701,
ई-मेल- ramnaginamaurya2011@gmail.com
संप्रति : उत्तर प्रदेश सचिवालय,लखनऊ में विशेष  सचिव के पद पर कार्यरत
प्रकाशन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। अब तक तीन कहानी संग्रह आखिरी गेंद, आप कैमरे की निगाह में हैं और सॉफ्ट कॉर्नर प्रकाशित। चौथा कहानी संग्रह यात्रीगण कृपया ध्यान दें जल्द ही प्रकाशित होने वाली है

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