रविशंकर सिंह की कहानी ‘पान-प्रसाद और पेंशन’

रविशंकर सिंह

जन्म : 8 अक्टूबर 1958, ग्राम : धनौरा, भागलपुर (बिहार)
शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिन्दी), पीएचडी
प्रकाशन : हंस, कथादेश, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, जनसत्ता, अक्षरपर्व, परिंदे, संवेद, जनमत, अलाव, प्रगतिशील वसुधा, कथाबिंब, कल के लिए, किस्सा, अंगचम्पा, समकालीन भारतीय साहित्य आदि पत्रिकाओं में कहानियां, कविताएं, आलेख प्रकाशित
कहानी संग्रह : कथा-लघुकथा, तुमको न भूल पाएंगे
सम्मान : महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान, कमलेश्वर कथा लेखन सम्मान
संपादन सहयोग : अंगचम्पा पत्रिका
संपर्क : रघुवंशम, ए/4, सालडांगा, वरदेही रोड, पोस्ट रानीगंज, जिला- पश्चिम बर्धमान, प. बंगाल, 713347, 

मोबाइल नंबर – 9434390419 / 7908569540.
Email : ravishankarsingh1958@

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” अरी ओ अरुनिया माय! सुन रही हो जी,  कुछ जलखय-पानी का इंतजाम  है कि नहीं? ” , पांडे जी ने पूजा घर से ही हांक लगाई।

” क्यों टोले भर को सुना रहे हैं जी। लोग तो यही सोचेंगे न कि मैं आपको भूखी ही रखती हूं। स्कूल के दिनों में ही आप अच्छे थे। कम से कम  घर में शांति तो बनी रहती थी। जब से आप रिटायर हुए हैं , तब से आपने घर में आफत मचा रखी है। दिन भर फरमाइश पर फरमाइश करते रहते हैं। अब मेरी भी उमिर हुई कि नहीं?  अब मेरा भी खून ठंडा पड़ने लगा है। भोरे – भिनसारे से चूल्हे में लगी हुई हूं। आलू की भुजिया तैयार है। केवल रोटियां सेंकनी बाकी  है। ठाकुर जी की पूजा से ज्यादा अपनी पेट पूजा पर आपका ध्यान लगा रहता है। पूजा हो गई है तो बोलिए न,   मैं चौका लगा देती हूं।”  उनकी पत्नी ने रसोई घर से ही जवाब दिया।

” लो भला! जेबा से कि, सुबह-सुबह विविध भारती शुरू हो गया। मैं क्या केवल अपनी खातिर हाय- हाय करता हूं। कम से कम यात्रा के समय तो शुभ-शुभ बोला करो। तुम्हें बताया तो था कि मुझे मिनिस्टर साहब से मिलने के लिए जाना है। ठाकुर जी की कृपा हुई तो कोई ना कोई जुगाड़ हो जाएगा।”  पांडे जी ने अपने स्वर में मिठास घोलते हुए कहा।

” अजी, मिनिस्टर साहब सुनेंगे क्यों नहीं ? जिन्दगी भर खवासगिरी छोड़कर आप ने किया क्या है ?  जब चुनाव आता है तो आपकी भूख- प्यास हरण हो जाती है। महीनों प्रचार गाड़ी में घूमते रहते  हैं। घर में जवान बेटी बैठी है, इसकी आपको तनिको परवाह नहीं है , लेकिन नेताजी को जिताने के लिए आपका बल दोगुना हो जाता है। वे एमएलए बने , किसके बूते पर?  आपके बूते पर ।…फिर वे एमपी बने , किस के बूते पर ? आपके बूते पर ।….और आज आपको जरूरत पड़ी है तो वे कैसे इंकार कर सकते हैं ! उनकी आंखों में पानी है कि नहीं?”, पंडिताइन रसोईघर में बड़बड़ा रही थी।

” जेबा से कि तुमको कितनी बार कहा है कि तुम अपने आप में घनर – घनर करना बंद करो। तुम्हें जो भी कहना है मेरे सामने आकर  बोला करो। … लेकिन नहीं, तुम तो अपनी आदत से लाचार हो। क्या तुम्हें नहीं पता है कि मैं आज जो कुछ भी हूं , उन्हीं की बदौलत हूं। मेरे जैसे कितने  मिडिल पास आज भी घास छील रहे हैं। उन्हीं की कृपा से मुझे प्राईमरी स्कूल में मास्टरी मिली। वह भी अपने ही गांव में। भले ही मेरी तनख्वाह कम थी , लेकिन उसी की बदौलत मैंने दो-दो बेटियों का ब्याह किया । तुम्हारे नौनिहालों को पढ़ा – लिखा कर नौकरी करने के लायक बनाया। … और तुम्हारे लाडलों ने क्या किया ? अपने बीवी-बच्चों को लेकर शहर में जाकर बस गए। नमक हराम निकले दोनों के दोनों। उन्हें तनिक भी परवाह है कि घर में बूढ़े मां -बाप हैं। एक जवान बहन ब्याह के लिए बैठी है। कुछ ऊंच- नीच हो गया तो हमलोग कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। मिट्टी की दीवारें जगह- जगह ढह रही हैं। हर साल बंदर खपरैल तोड़ देते हैं। चूती हुई छप्पर के नीचे नींद नहीं आती। ससुरों से इतना भी नहीं होता है कि एक पक्का मकान बनवा दें। यह तो बोलो कि रसूखदार लोगों से मेरी जान- पहचान है तो रोटी – पानी का जुगाड़ हो जाता है। उसमें भी तुम किच- किच लगाए रहती हो!”  पांडे जी ने भी अपने मन की भड़ास निकाल दी।

  ” क्यों मेरे बच्चों को कोसते हैं जी! वे अपने बाल-बच्चों को पाल रहे हैं कि नहीं?  आपको पता है कि शहर में कितना खर्चा है। आप को तो पेंशन मिलती ही है। डॉक्टरी से ऊपरी कमाई हो जाती है। खेती-बाड़ी से भी कुछ आ ही जाता है। फिर भी आपको संतोष नहीं है! कहते हैं कि कर बहियां बल आपने, छोड़ पराई आश। लेकिन नहीं आप की नजर तो उनकी कमाई पर लगी रहती है। लीजिए नाश्ता कीजिए और भगवान का नाम लेकर प्रस्थान कीजिए। और हां ! पान लगाकर पनौटे में रख दिया है। अरुनिया से मांग लीजियेगा। आज इतवार है पान खाकर निकलने से यात्रा शुभ होती है।”  पत्नी ने उनके सामने थाली रखते हुए कहा।

       पूरब के क्षितिज पर अवतरित बाल रवि की रेशमी रश्मियों की तरह अरुनिया ने जवानी की दहलीज पर कदम रख दिया था। गांव भर में उसके दमकते हुए रुप- लावण्य के चर्चे चलते। जिसने गूदड़ में लाल छुपा रखा हो , उसे चोरी की चिंता से नींद कहां आती है। अपनी बेटी के सौंदर्य के चर्चे सुनकर गुरुजी को जहां एक ओर गर्व होता , वहीं  उन्हें उसके हाथ पीले करने की चिंता भी सताती रहती।

     हरिहर गुरुजी के घर का पुराना दरवाजा ऐसा हो गया है कि उसकी फांक से कोई कुत्ता आराम से अंदर प्रवेश कर जाता है और पिछवाड़े से निकल जाता है। रात में कमरे की छप्पर-छानी से आकाश के तारे नज़र आते हैं। घर के पिछवाड़े में चहारदीवारी की जगह बांस और बेहया की टांटी लगी है।  बावजूद इसके हरिहर गुरुजी एक नंबर के चटोर और अव्वल दर्जे के आलसी।  वे कभी अपने खेत की मेड़ पर गये हैं कि नहीं, यह तो ऊपरवाला ही जानता होगा,  जैसे “अजगर करे न चाकरी, पक्षी करें न काम। “

    काम-काज के मामले में केवल हरिहर गुरुजी ही नहीं, बल्कि पूरी बभनटोली का यही हाल था। नयी पीढ़ी में कुछ युवकों ने पढ़-लिख कर नौकरी की ओर रुख किया , वरना उनके पुरखे पुश्तैनी जमीन बेच कर गुजर-बसर कर रहे थे। जमीन बिक गई तो उन में से अधिकतर ने यजमानी शुरू कर दी।

      हरिहर गुरुजी को गांव में मास्टरी मिल गई , इसलिए उन्होंने पुरोहिती का धंधा नहीं अपनाया। उनदिनों जब दस-दस कोस दूर कहीं- कहीं स्कूल हुआ करते थे, तब हरिहर गुरुजी ने मिडिल तक की पढ़ाई की थी।

    गुरुजी ने अपने घर के सामने पीपल और पिछवाड़े में कुएं के पास  बरगद का पेड़ लगा रखा है। कारण पूछने पर वे मुस्कुराते हुए बताते हैं, ” जेबा से कि, यही तो है मेरी सेहत का राज। इससे हमें भरपूर आक्सीजन मिलती है। हंह… हैं ! “

      अपनी बोली- बानी और चाल -ढाल के कारण हरिहर गुरुजी गांव भर में चर्चा के पात्र बने हुए हैं। उनका बातचीत करने का अपना अंदाज है। अपने संवाद के अंत में वे ‘ हंह… हैं ‘ की हुंकारी भरते हुए अनोखे अंदाज में जब ताली पीटते हैं तो श्रोताओं को मजा आ जाता है। ‘ जेबा से कि ‘ उनका तकिया कलाम है। इसके बिना उनकी बात ही पूरी नहीं होती है। गेंहुआ रंग, गोलाकार चेहरा, ठिगनी कद-काठी,  थुल थुल करती हुई तोंद और गंजी खोपड़ी वाले हरिहर गुरु जी को बच्चे पीठ पीछे छोटा हाथी कहकर चिढ़ाते हैं।

    स्कूल में मास्टरी करने का भी उनका अपना अंदाज था। ना उनके स्कूल जाने का निश्चित समय, ना स्कूल से आने का। बसंती हवा के झोंके की तरह अपनी मर्जी के मालिक। क्या मजाल कि कोई टोका-टोकी कर दे। स्कूल इंस्पेक्टर तक उनसे भय खाते थे। अजी,  मिनिस्टर साहब से उनका डाइरेक्ट कनेक्शन था। इंदिरा गांधी से लेकर स्थानीय एम एल ए और एम पी तक की चिट्ठियां उन्होंने संभालकर रखी थी। गांव वाले तो इसलिए उनसे डरते थे कि कहीं वे उल्टी-पलटी दवा नहीं दे दें। गांव में दो ही झोलाछाप डॉक्टर हैं। एक हरिहर गुरुजी और दूसरे शिवनाथ सिंह। शिवनाथ सिंह एलोपैथी चिकित्सा करते हैं। उनकी दवा महंगी होती हैं। हरिहर गुरुजी एक-दो रुपए की होम्योपैथिक दवा से इलाज कर देते हैं। अब यश-अपयश तो विधाता के हाथ में है। दुनिया में रोग का इलाज है , लेकिन मौत पर किसका वश चला है।

     हरिहर गुरुजी एक बड़ा सा पीतल का लोटा लेकर स्कूल जाया करते थे। उसी से वे पानी पीते , निपटान भी कर लेते थे और उसी में ईंट के चूल्हे पर उनकी चाय बनती रहती थी। गोयठा-लकड़ी का इंतजाम करने की जिम्मेदारी छात्रों पर होती थी।

    शगुन विचार कर गुरुजी अपनी यात्रा पर निकले। देह पर खादी का सफेद कुर्ता-धोती,  सिर पर गांधी टोपी और हाथ में लाल कपड़े की झोली। गर्मियों के दिन थे, लेकिन अभी धूप नहीं निकली थी। इसलिए उन्होंने अपनी छतरी को कांख में दबा लिया था। घर से थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर उन्होंने सामने से मनसुख को आते हुए देखा। मनसुख आंखों से काना। उसे देखते ही उन्होंने मन ही मन भिन्नाते हुए कहा, ” काने को आज मेरे सामने आना था। ससुरे ने सगुन ही बिगाड़ दिया। “

    उन्होंने अगल- बगल से निकल जाने की सोची, लेकिन दूसरा कोई विकल्प ही नहीं था। मनसुख से स्वयं को बचाने के लिए उन्होंने झट से अपनी छतरी तान ली। लेकिन हुआ वही जिसका उन्हें अंदेशा था। करीब आते ही मनसुख ने कहा, ” राम-राम पांडेजी! भोरे भोर कहां की यात्रा है? “

” साले ससुर के नाती! कहां की यात्रा है!! तुमरी महतारी का गौना कराने के लिए जा रहे हैं। कर दिया न अमंगल। साले तुमको इतना भी शऊर नहीं है कि यात्रा पर टोका-टोकी नहीं करना चाहिए। हम जहन्नुम में जा रहे हैं। तुमको इससे क्या मतलब है? ”  गुरुजी भड़क गए जैसे लाल कपड़े को देख कर सांड़ भड़कता है।

    बेचारा मनसुख अपना सा मुंह लेकर चलता बना। एक तो वह गुरु जी का लिहाज करता था, दूसरे उम्र के साथ-साथ उसके स्वभाव में भी काफी परिवर्तन आ गया था। मनसुख जन्म से काना नहीं था। जवानी के दिनों में बहुत दबंग और गबरु जवान था मनसुख। इलाके में उसके जोड़ का पहलवान नहीं था। रामनवमी के अखाड़े में कुश्ती के लिए और मोहर्रम के दिन ताजिया के जुलूस में लाठी, भाला, वाणा के करतब दिखाने के लिए हर साल उसे इनाम – इकराम मिलता था। बात ब्रिटिश जमाने की है। एक अंग्रेज अफसर घोड़े पर सवार होकर गांव से गुजर रहा था। उसकी कमर में लटकते हुए पिस्तौल को देखकर मनसुख का मन मचल गया। उसने घोड़े समेत अफसर को जमीन पर गिरा दिया और उसका पिस्तौल छीन कर भागा। मनसुख आगे – आगे और अंग्रेज अफसर उसके पीछे-पीछे। गांव के सिवान पर घनी बंसवारी और अमराई थी। मनसुख छिपने के लिए बंसवारी में घुस गया। उसी क्रम में बांस की एक नुकीली करची उसकी बाई आंख में घुस गई। बावजूद इसके वह भागने में सफल हो गया। बाद में सैनिकों की पलटन ने आकर गांव को घेर लिया और मनसुख पिस्तौल सहित पकड़ा गया। बेचारे को जेल की हवा खानी पड़ी। जेल से आने के बाद उसके स्वभाव एवं हाव- भाव में काफी परिवर्तन हो गया था।

      हरिहर गुरुजी भगवान का सुमिरन करते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ गए। उन्हें लग रहा था कि आज का मुहूर्त ही ठीक नहीं है। पहले घर में पंडिताइन ने किच-किच शुरू कर दी। रास्ते में काने ने टोक दिया। पता नहीं  मिनिस्टर साहब से मुलाकात होगी कि नहीं। मिनिस्टर साहब के गांव आने की उन्हें पक्की खबर थी, लेकिन बड़े आदमी क्या ठिकाना। वे कहीं रिश्तेदारी में नहीं निकल गये हों तो ?  वे चिट्ठी-पत्री भेजे बिना ही निकल पड़े हैं।

     संशय और द्वन्द्व के भंवर में गोते लगाते हुए गुरुजी तीन – चार घंटे की पैदल यात्रा करके मिनिस्टर साहब के गांव पहुंचे। मंजिल ज्यों- ज्यों करीब आ रही थी, उनकी धड़कन तेज हो रही थी। मिनिस्टर साहब के दरवाजे पर पहुंच कर उन्हें पता चला कि वे घर में ही हैं तब उनकी जान में जान आई। धूप और पसीने के कारण उनका बुरा हाल था। उन्होंने अपने आने की खबर मिनिस्टर साहब को भेजवा दी और थकान मिटाने के लिए वे दालान में बिछी हुई चौकी पर पसर गये। थोड़ी देर बाद खबरिया ने आकर उनसे कहा, ” साहब ने आपको अंदर ही बुलाया है।”

      मिनिस्टर साहब ने गर्मजोशी से उनका स्वागत करते हुए कहा, ”  पांडे जी! आप मेहमानों की तरह बाहर दालान में ही क्यों रुक गये ? अरे भाई ! आपको सीधा अंदर आ जाना चाहिए था। “

     मिनिस्टर साहब के बात-व्यवहार को देखकर गुरुजी के मन में बाग-बाग हो गया। वे सोचने लगे,  इसे कहते हैं आदमियत। इतने बड़े आदमी हैं , लेकिन मन में थोड़ा भी अभिमान नहीं है। उन्होंने गदगद होकर कहा, ” जेबा से कि, बात तो आप ठीक कह रहे हैं झा जी, लेकिन बहू- बेटियों का घर है। इसलिए मैंने खबर भेजवाना उचित समझा। “

” सो सब तो ठीक है। पहले आप हाथ – मुंह धोकर भोजन ग्रहण कीजिए। उसके बाद हम लोग बैठ कर बातें करेंगे। इतनी गर्मी में आप पैदल चलकर आए हैं। आपने खबर भेजवा दी होती तो मैं आपके लिए गाड़ी भेजवा देता। “, मिनिस्टर साहब बोले।

” जेबा से कि झा जी, प्यासा कुएं के पास आता है। मैंने कुएं को प्यासे के पास जाते हुए नहीं देखा है। हंह… हैं ! “, गुरु जी ने अपने अंदाज में ताली बजाते हुए ठहाका लगाया।

      भोजन आदि ग्रहण करने के उपरांत वे आपस में बातें करने के लिए  बैठे। पहले कुछ देर तक दुनिया- जहान की बातें होती रही। अंत में गुरुजी ने अपने आने का मकसद बताया, ” जेबा से कि झा जी! हम तो रिटायर हो गए हैं। पेंशन से गुजारा मुश्किल हो रहा है। मेरी इनकम के लिए कोनो जुगाड़ हो जाता तो बहुत बड़ी कृपा होती। “

मिनिस्टर साहब ने कहा, ” पांडे जी , आप मेरे खास आदमी हैं।  आपका मेरे ऊपर बहुत एहसान है । आपके लिए मुझसे जो कुछ संभव हो सकेगा मैं जरूर करूंगा। “

मिनिस्टर साहब की बातें सुनकर हरिहर गुरुजी का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने परम सत्य का उद्घाटन करते हुए कहा, ” जेबा से कि ,इसमें एहसान की क्या बात है झा जी! बेटी और वोट तो जाति में ही दी जाती है। “

     हरिहर गुरु जी ने ठीक ही कहा। इलाके में वोट का गजब समीकरण है। कांग्रेस पार्टी की तरफ से लोकसभा की सीट के लिए भगवती प्रसाद आजाद खड़े होते हैं और विधानसभा की सीट के लिए नित्यानंद सिंह। भगवती प्रसाद आजाद जाति के ब्राह्मण और नित्यानंद सिंह कुर्मी। इसलिए लोकसभा के चुनाव में बाभन- ठाकुरों की वोट कांग्रेस को मिलती है और कुरमी की वोट दूसरी पार्टी को। विधान सभा के चुनाव में यह क्रम उलट जाता है। मुसलमानों की संख्या कम है, लेकिन किसी भी पार्टी की जीत-हार  में उनकी निर्णायक भूमिका होती है। सभी राजनीतिक पार्टियां उनकी मांगों का विशेष रूप से खयाल रखती हैं।

    हरिहर गुरु जी से बातचीत करते हुए मिनिस्टर साहब ने पूछा, ”  यह बताइए पांडे जी!स्वतंत्रता आंदोलन में अपने कोई योगदान दिया है ? “

” नहीं झा जी , ऐसे कामों के लिए घर से इजाजत ही नहीं मिलती थी। “

” उन दिनों किसी मामले में आपने कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाए हो तो बताइए।”

पांडे जी ने बहुत मगजमारी की। अचानक उन्हें बचपन की एक घटना याद आ गई। वह अंग्रेजों का जमाना था। वे अपने घर से दस कोस की दूरी पर एक बोर्डिंग में रहकर पढ़ाई कर रहे थे। स्कूल के हेड मास्टर गणपत गुरुजी गांधीजी के पक्के अनुयाई थे। वे अपने हाथों से सूत कातते और खद्दर पहनते थे। एक बार गणपत गुरु जी ने उनसे कहा , ” मैं गांधी जी के आह्वान पर दिल्ली जा रहा हूं , चलोगे ? “

उन्होंने सोचा कि दिल्ली घूमने का मौका ना जाने जिंदगी में कब मिलेगा। उन्होंने अपने एक सहपाठी जोधन मंडल को भी राजी कर लिया। दोनों मित्र गुरुजी का लोटा- कंबल लेकर दिल्ली के लिए रवाना हुए। रेलगाड़ी में जगह-जगह अनेक आंदोलनकारी जुड़ते गए और कारवां बनता गया। दिल्ली प्लेटफार्म पर पहुंचकर आंदोलनकारियों ने भारत माता की जय के नारे लगाने शुरू कर दिए। ब्रिटिश पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया। प्लेटफॉर्म पर भगदड़ मच गई। गणपत गुरु जी ने अपनी गिरफ्तारी दी। गुरु जी का ऐसा हाल देखकर वे दोनों मित्र दुम दबाकर भागे। उन्होंने वापसी की गाड़ी पकड़ ली। उनके पास टिकट के पैसे थे नहीं, इसलिए टीटीई ने उन्हें पकड़ कर जेल भेज दिया। गणपत गुरुजी जल्दी ही जेल से रिहा हो गए। अपने घर वापस आकर उन्होंने अपने लापता चेलों की खोज शुरू कर दी। काफी मशक्कत के बाद उन्हें ढूंढ कर जेल से रिहा करवाया गया।

इस घटनाक्रम को सुनते ही मिनिस्टर साहब की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने हरिहर गुरु जी से पूछा यह, ” बताइए आप किस जेल में बंद थे ? वहां आपका रिकॉर्ड जरूर मिल जाएगा। “

“… लेकिन झा जी, वह तो विदाउट टिकट का मामला था। “, उन्होंने कहा।

भगवती प्रसाद आजाद ने अपनी बाईं आंख दबाते हुए कहा, ” पांडे जी ! यह तो हम आप जानते हैं , लेकिन सरकार नहीं जानती है। जेल में आपके रिकॉर्ड से आपको स्वतंत्रता सेनानी सिद्ध करने में मुझे देर नहीं लगेगी। बस पान-प्रसाद में आपको कुछ खर्चा लगेगा समझे कि नहीं ? “

” जेबा से कि, आप तो नंबरी घाघ हैं झा जी। आप कोशिश कीजिए और पान प्रसाद की फिकर मत करिए। बस काम हो जाना चाहिए। “

    कुछ महीनों के उपरांत हरिहर गुरुजी के नाम स्वतंत्रता सेनानी सम्मान प्राप्त करने के लिए एक सरकारी पत्र आया। पत्र का मजमून पढ़ कर उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज दी, ” अजी अरुनिया माय! सुनती हो। आओ तुम्हें अच्छी खबर सुनाता हूं। “

 उनकी पत्नी ने करीब आकर कहा, ” क्या हुआ जी ! आज तो बहुत चहक रहे हैं। “

” अरी भाग्यवान ! यही समझ लो कि मुझे कारु का खजाना मिल गया। तुम तो अब तक मुझे गोबर का चोंथ ही समझती रही। लो देख लो, सरकार ने मेरे लिए स्वतंत्रता सेनानी सम्मान समारोह आयोजित किया है। अब मास्टरी के पेंशन के साथ- साथ मुझे स्वतंत्रता सेनानी का भी पेंशन मिलेगा। अब करो मजे। धूमधाम से करो अरुनिया का ब्याह। “, हरिहर गुरुजी ने कहा।

      स्वतंत्रता सेनानी पेंशन की बात तो उन्होंने केवल अपनी पत्नी को बताई थी, लेकिन यह खबर आग की लहर की तरह गांव में इस कोने से उस कोने तक फैल गई। यह खबर सुनकर कितनों के कलेजे पर सांप लोट गया। लोग दांतों तले अंगुली दबा रहे थे, ” यह अजगुत कैसे हो गया भाई ! पांडे जी ने कब, कहां और कौन सा आंदोलन किया है ? हमने ना कभी देखा, न सुना। जिंदगी भर मास्टरी करते रहे। हां, चुनाव के समय जरुर प्रचार गाड़ी में घूमते रहे। बस इसी के बल पर बन गये स्वतंत्रता सेनानी ! “

     हरिहर गुरुजी को अपनी उस दिन की करनी पर पछतावा हुआ।जिस  दिन वे मिनिस्टर साहब से मिलने के लिए जा रहे थे, उस दिन उन्होंने मनसुख को बहुत बुरा- भला कह दिया था। ग्लानि और पश्चाताप के कारण अचानक उनके कदम दुसाध टोली की ओर बढ़ गए। गांव की संकरी गलियों को पार करते हुए उन्होंने मनसुख की झोपड़ी के सामने जाकर आवाज  लगाई, ” अरे मनसुख,  घर में हो भाई ! “

संयोगवश मनसुख घर में नहीं था। घर से बाहर निकल कर घूंघट काढ़ते हुए उसकी लुगाई ने कहा, ” वे तो घर में नहीं है मास्टर जी ! वे भैंस चराने के लिए बैहार की ओर निकले हैं। कोनो काम होखे तो बोल देवें। “

 

” अरे , कोई बात नहीं। वह आए तो उसे मेरे पास भेज देना । “, गुरुजी ने कहा।

     गोधूलि बेला में गांव के ढ़ोर -डांगर चारागाह से लौट रहे थे। उनके गले में बंधी हुई घंटियों की रुनझुन ध्वनि गूंज रही थी। भैंस की पीठ पर बैठे चरवाहे की बंसी की टेर वातावरण में अमृत घोल रही थी। हरिहर गुरुजी अपना पितरिया लोटा लेकर उधर ही दिशा – मैदान के लिए निकले हुए थे। चरवाहों के बीच मनसुख को देखकर उन्होंने उसे अपने पास बुला कर कहा , ” अरे मनसुख! मैं आज तुम्हारे घर गया था। “

” कोनो काम-काज रहा क्या मास्टर जी!”  मनसुख ने कहा।

” कोई विशेष काम नहीं था मनसुख ! मैं तो तुम्हें धन्यवाद देने के लिए गया था भाई । उस दिन यात्रा पर टोका-टोकी के लिए नाहक मैंने तुम्हें भला बुरा कह दिया।  तुम्हें बुरा लगा हो तो मुझे माफ कर देना भाई । तुम्हारे फायदे की एक बात बताता हूं। तुम कुछ खर्चा पानी करो तो मैं तुम्हें स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन दिलवा सकता हूं। “

” मैंने तो देश भक्ति का कोई काम नहीं किया है गुरुजी ! “

” अरे बुड़बक कहीं का! जेबा से कि अंग्रेजों के जमाने में तुम जेहल गए थे कि नहीं?  वह भी एक अंग्रेज अफसर को घोड़े से गिराकर पिस्तौल छीनने के जुर्म में, …हंह हैं ! तुम अपना कागज – पत्तर लेकर आना। मैं तुम्हारा दरखास्त लिख दूंगा। बाकी का काम अपने मिनिस्टर साहब कर देंगे।….और हां , आज शाम को पांच सेर दूध मेरे घर भेज देना। गोतिया- दियाद को खीर – पूड़ी खिलाने का विचार है। “, गुरु जी ने कहा।

  नियत तिथि को हरिहर गुरुजी सपत्नीक जिला के सैंडिस कंपाउंड में पहुंच गए। इस गौरवशाली दिन को  यादगार बनाने के लिए उनके बेटे- बहू भी गांव आ गए थे। वे मनसुख को भी अपने साथ ले गए थे। सैंडिस कंपाउंड में डीएम से लेकर सरकारी अफसरों की भारी भीड़ जमा थी। पूरे मैदान को रंगीन कागजों से सजाया गया था। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ढेर सारी कुर्सियां बिछी हुई थी। वहां अनेक स्वतंत्रता सेनानी और विधवाएं उपस्थित थीं। मिनिस्टर भगवती प्रसाद आजाद ने स्वतंत्रता सेनानियों एवं उनकी विधवा के हाथों में ताम्रपत्र सौंपते हुए अपने भाषण में कहा , ” इस देश की आजादी को प्राप्त करने के लिए इन स्वतंत्रता सेनानियों ने जो योगदान दिया है, इस पर हमें गर्व है। देश के इन सच्चे सपूतों ने यदि अपनी कुर्बानी नहीं दी होती तो आज हम आजादी का सूरज नहीं देख पाते। मैं व्यक्तिगत रूप से हरिहर पांडे , इनके मार्गदर्शक गणपत गुरु जी एवं इनके ग्रामीण मनसुख को भली-भांति जानता हूं। इन लोगों ने आजादी की लड़ाई में पुलिस की लाठियां खाई , जेल गए। गणपत गुरुजी तो अब इस संसार में नहीं रहे। मैं उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। मैं उनकी पत्नी के त्याग को भी नमन करता हूं, जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेने से इंकार कर दिया। “

       तालियों की गड़गड़ाहट और सरकारी बैंड बाजों के उपरांत कार्यक्रम समाप्त हुआ। कार्यक्रम के अंत में हरिहर गुरु जी ने मिनिस्टर साहब से पूछा, ” झा जी, स्वतंत्रता सेनानियों की लिस्ट में जोधन मंडल का कहीं नाम नहीं था। “

मिनिस्टर साहब ने गुरु जी के कानों में फुसफुसाते हुए कहा  , ” आपने जोधन मंडल का नाम जरूर लिया था पांडे जी , लेकिन उसने ना तो अप्लाई किया और ना खर्चा – पानी की बात की । सरकार को क्या पता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में किसने, कब और कितना योगदान दिया है। और हां ! आपने  पान – प्रसाद का इंतजाम कर लिया है कि नहीं ? “

” इसके लिए आप निफिकिर रहें झा जी ! मेरा और मनसुख का चढ़ावा आपके निवास पर जरूर पहुंच जाएगा।”, हरिहर गुरु जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

      हरिहर पांडे जीते हुए खिलाड़ी की तरह  स्टेशन  से अपने कुनबे के साथ बैलगाड़ी पर सवार होकर गांव वापस आ रहे थे। कोयली नदी के किनारे  टिटहरी के बोलने की आवाज सुनाई दे रही थी, ” टी…टी…टीई!टी…टी…टीई!! “

हरिहर गुरुजी मन ही मन सोच रहे थे कि ऐसे शुभ मुहूर्त में टिटहरी का बोलना ठीक नहीं है।

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1 Response

  1. P K Singh says:

    कहानी में अपने गाँव से लिया गया सभी पात्रों व स्थानों का नाम काफ़ी रोचक लगा।

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