कमलेश की कहानी ‘ज़मीन’

पूस की एकदम ठंडी रात। काली-कलूटी और डरावनी। उस पर रात के दो बजे। अपने घर के बरामदे में निकलो तो डर लगे। सर्द हवा जैसे हड्डियों तक में घुस जाने के लिए बेताब हो। रजाई या कंबल से निकलना तो मानो सजा की तरह लग रहा है। इसमें रह-रह कर कुत्तों के रोने की आवाज। ऐसा लगता है जैसे श्मशान वाले सारे कुत्ते वहां से उठकर गांव में चले आये हों। अंधेरा इतना कि अपना ही हाथ-पांव दिखाई ना दे। अब किसी को डर लगे तो लगे, नवल के लिए तो ऐसी रात वरदान होती है। उसके लिए तो ना ठंड है और ना ही अंधेरा। इतनी ठंड में भी एकदम उघारे। बदन पर केवल लुंगी और हाथ में एक लोटा। अंधेरे में भी आंखें इतनी चौकन्नी कि दस बांस दूर से आते हुए किसी को भी देख ले। उसकी नाक कब आंख का काम करने लगती है पता ही नहीं चलता। पांव इतने सीधे और सधे हुए कि क्या मजाल जो नाली-नाले में पड़ जाए। ऐसा लगता था कि कुत्ते भी उसके कदमों की आहट पहचान रहे हों। रोते हुए कुत्ते के एकदम पास जाकर उसकी आंख में आंख मिलाता नवल और कुत्ता ऐसा सिटपिटाता कि घंटों उसके गले से आवाज नहीं निकलती।

एकदम चौकन्ने अंदाज में टहलता हुआ नवल एक घर के आगे रुका। उसने आसपास देखा और इसके बाद घर के चारो तरफ ऐसे घूमा जैसे परिक्रमा कर रहा हो। फिर एक जगह इतमिनान से खड़ा हो गया। उसने बांये हाथ में पकड़े लोटे को अपने सर के ऊपर उठाया। अब वह उस काम को अंजाम देने वाला था जो उसे कतई पसंद नहीं था। लेकिन उस्ताद ने चेताया था- ‘‘इसे किये बगैर काम में निकले तो आधा खतरा तुम्हारे सर पर रहेगा बाबू। इसे कर लिया तो आधा खतरा दूर।’’

उसने सिर के ऊपर ले जाकर लोटे को उलट दिया। लोटे में भरा सरसो का तेल उसके सिर के ऊपर से होता हुआ पूरे बदन पर फैलने लगा। चेहरे से होते हुए कंधे पर और सीने से होता कमर तक पूरा चप-चप। नवल ने पूरे शरीर में तेल को मिलाना शुरू किया और देखते-देखते ऐसा लगने लगा जैसे वह तेल की नदी से नहा कर निकला हो। जिस घर के पीछे वह खड़ा था उसके चारो तरफ  दीवार थी। उसने दीवार कीऊंचाई मापी। उसके सिर के बराबर। उसने अपने दोनों पांव की एंड़ियों को उठाकर अपनी लम्बाई बढ़ाई, दीवार का ऊपरी सिरा पकड़ा, फिर पूरा जोर अपने पंजों पर डाला और एकदम सीधी उछाल। बिजली की तेजी से वह दीवार के पीछे पहुंचा था। हल्की सी धम की आवाज हुई। जहां गिरा था नवल वहीं चुपचाप पड़ा रहा। दो मिनट तक हिला भी नहीं। वह अभी घर के छोटे से अहाते में था और ठीक सामने था घर का ओसारा। एकदम झारा-बुहारा, चिकन-चुनमुन। एक तरफ खाट पड़ी थी लेकिन पूरी तरह खाली। ठंड की रात का यही आनन्द है। बाहर कोई नहीं सोता। ओसारा में एक दरवाजा और दरवाजे के उसपार आंगन। ओसारा का दरवाजा अंदर से बंद था। नवल ने एक हल्का सा धक्का दिया और दरवाजा भीतर से खुल गया। अब वह घर के आंगन में था और आंगन से सटा था वह कमरा जिसे देखकर नवल मुस्कुराया। ना जाने उसे कैसे पता चल जाता था कि असली माल किस कमरे में होगा। यह कमरा भी अंदर से बंद था। दरवाजे मजबूत और चौखट से दीवार की तरह चिपके हुए। नवल ने पता नहीं दरवाजे पर बित्ते से क्या नापा। इसके बाद उसने उस जगह जोर लगायी जहां दरवाजे के दोनों पल्ले आपस में सटे थे। एक हलका से झटका। दरवाजे से धीमी सी आवाज आई। नवल थोड़ा रुका। आवाज का कोई असर नहीं। लगता है अंदर सो रहा आदमी इस आवाज से कुनमुनाया तक नहीं होगा। उसने फिर उसी जगह झटका दिया जहां पहली बार कोशिश की थी। इस बार झटका जोरदार था। अंदर खटाक से आवाज हुई। शायद छिटकीनी टूट गई थी। इस काम में वह एकदम मास्टर था। उसके उस्ताद भी कहते थे-‘‘इतने लड़कों को टिरीक सिखाया बाकिर नवला जितना एसपट चेला नहीं मिला। एतना आराम से किली खोलता है कि साला जागे हुए आदमी को पता नहीं चलेगा, सोया आदमी क्या जानेगा।’’

उस्ताद की बात सोलह आने सही थी। अंदर छिटकीनी टूटी जरूर लेकिन जमीन पर नहीं गिरी। वहीं अझुराकर रह गई। लिहाजा कोई खतरा नहीं। ना तो घर के भीतर से कोई आवाज आई और ना कोई जगा। नवल ने थोड़ी देर तक इंतजार किया और इसके बाद हौले से दरवाजे को खोल दिया। अंदर के अंधेरे की थोड़ी देर तक वह थाह लेता रहा। कुछ ही देर के बाद उसे इस अंधेरे में भी सब कुछ दिखाई पड़ने लगा। बड़ा सा पलंग। पलंग पर बड़ी सी मसहरी। मसहरी में गरमा गरम रजाई और रजाई में लिपटे दो लोग। एक मर्द और एक औरत। वह मुस्कुराया- पूस की रात और जवानी की नींद। उसपर मेहरारू साथ हो तो परलय में भी नींद ना टूटे। उसने एक-एक कर सामान बटोरना शुरू किया। बक्से के ताले से तो जैसे उसके हाथ की दोस्ती थी। बक्से को खोलने के साथ उसने कमर में खोंस कर रखे बोरे को निकाला। कपड़े, बरतन और बहुत थोड़े से रुपये-पैसे। कुछ गहने जिन्हें उसने बोरे से अलग अपनी कमर में खोंस लिया। कपड़े तो कौड़ी के मोल चले जाएंगे। रुपयों में से थोड़ा उस्ताद का और थोड़ा उसका। गहने खालिस उसके। उसने आसपास मुड़कर देखा। टेबुल पर गिलास में दूध रखा था। एकदम ठंडा। लगता है इतनी जल्दी में था सोने वाला कि दूध भी नहीं पी सका। वह मुस्कुराया और दूध उठाकर गटागट पी गया। घर में और कुछ नहीं था जिसे वह समेटता। दस मिनट में घर खाली। इधर पलंग पर सोने वाला अपनी बीबी के साथ जैसे किसी और दुनिया में था। कुछ ही देर में नवल उसी तरह घर की दीवार के बाहर था जैसे वह आया था।

पिछले पांच साल से हफ्ते की दो से तीन रात ऐसे ही गुजरती थी नवल की। सतरह साल की उमर में पहली चोरी की थी। अब बाइस साल का जवान था। एकदम काला-कलूटा, घुंघराले लेकिन एकदम छोटे बाल, ठिगना सा कद, पतला-दुबला शरीर और छोटी-छोटी मिचमिचाई सी आंखें। होठों पर हमेशा हंसी रहती। कई बार टोले की लड़कियों की गाली सुन चुका था। लड़कियों को लगता कि वह उन्हें ही देखकर हंसता है। अब वह क्या बोले कि उसका चेहरा ही ऐसा है। बाप गांव के बड़े किसान रामनरेश यादव के खटाल पर गाय-भैंस धोता था तो बड़ा भाई उन्हीं के खेत पर काम करता था। लेकिन नवल को इसमें से कोई काम पसंद नहीं था। उसे लगता था कि ये काम गुलामी के हैं। लेकिन उसकी समझ में नहीं आता कि वह क्या करे। रात-दिन भटकता। बेचैन। घर पर केवल खाने के लिए आता। छोटा था तो बाप ने स्कूल भेजा लेकिन कुछ ही दिन में बाप की भी समझ में आ गया था कि पढ़ना इसके बस में नहीं है।

रात-दिन बिना वजह के भटकने के क्रम में मिला था उस्ताद नरेश मुसहर। उसी के टोले का था। पचास साल के नरेश की ना तो बीबी थी और ना परिवार। चोरी का मास्टर। कभी बिजली के तार काटकर बेचता था और बाद में घरों की सेंधमारी में जबर्दस्त कलाकार बन गया। पूरे इलाके में कहीं भी बड़े घर में चोरी होती तो पुलिस उसे ही खोजती। इसलिए वह टोला छोड़कर अक्सर सोन नदी के किनारे रहता। उस समय वह पांच साल की जेल काट कर आया था। नवल से मिलते ही उस्ताद ने उसके भीतर की कला को पहचान लिया। उससे एक दिन कहा था- ‘‘देख रे बाबू, मुसहर के लिए केवल तीन ही रास्ते हैं। पहला तो यह कि वह खेत पर काम करे, ढ़ोर-डांगर चराये और चराते-चराते मर जाए। दूसरा रास्ता है कि नसलाइट हो जाए और किसी दिन पुलिस की गोली उसे ठंडा कर दे। तीसरा रास्ता है कि चोर बने और जबतक जीए मौज में जीए। और कोई रास्ता नहीं। चोरी में जेल जाने का खतरा है। मारे जाने का भी खतरा है लेकिन कम है। अगर चोर एसपट हो तो न पकड़ा जाएगा और न गोली खाएगा।’’

नवल को अपने उस्ताद की बात समझ में आ गई। उसके बाद तो सोन नदी के किनारे उस्ताद ने चोरी के सारे तरीके समझाये। एकदम एसपट बनाने वाला। एक बार पकड़ाया था नवल। माल लेकर भाग ही रहा था कि गांव में जगरम हो गया। दौड़ा कर लोगों ने पकड़ लिया। बड़ी मारा लेकिन कुछ लोगों को दया भी आ गई। ऐसे लोगों ने कहा- ‘‘बच्चा है, ज्यादा मारोगे तो मर जाएगा।’’

पिटाई करने के बाद लोगों ने उसे थाने के हवाले कर दिया। दारोगा ने उसे देखते ही कहा- ‘‘नरेसवा का चेला हो गया है का रे?’’ फिर उसने एक सिपाही को इशारे से बुलाया और हंसते हुए कहा- ‘‘मुसहर के लउके केतना, थरिया में धान जेतना। साले को चार लाठी मार के छोड़ दो। जेल भेजोगे तो नरेसवा से भी बड़का चोर हो जाएगा।’’

वो दिन है और आज का दिन। कभी-कभी जगरम भी होता है लेकिन तब उस्ताद के बताये उपाय काम आ जाते हैं। कई बार तो अपनी मेहनत से चोरी किया हुआ सामान छोड़कर भागना पड़ता है। ऐसे में अफसोस बहुत होता है। वह अपने उस्ताद की एक बात हमेशा याद रखता है- चोर ने उसूल से किनारा किया तो समझो पकड़ा गया। उसूल पर कायम रहो तो पुलिस तो क्या उसका बाप भी नहीं पकड़ सकता। अलबत्ता माघ और पूस की रात में पकड़े जाने के खतरे ऐसे भी कम हो जाते थे। लिहाजा इन दो महीनों में उसका धंधा खूब जोरों पर रहता।

नवल मुसहर जरूर था लेकिन उसकी नजर केवल थरिया के धान भर नहीं जाती थी। वह इसके आगे देखना चाहता था। चकाचक कपड़े पहनना चाहता था, मोटरसाइकिल चलाना चाहता था और दुनिया घूमना चाहता था। कई बार वह दिन में आरा चला जाता, सिनेमा देखता और दिन भर आवारा घूमता रहता। शाम होते ही गांव में। ऐसी ही एक शाम जब वह आरा स्टेशन के पास घूम रहा था तो उसे दिखाई पड़ा था एक शानदार दुमंजिला मकान। देखने से ही लगता था कि मकान वाले के पास काफी पैसा होगा। उसने चारो तरफ घूमकर मकान का मुआयना किया। एकदम साफ-सुथरा मकान। मकान में घुसने पर काफी माल मिल सकता है। और फिर ऐसा लगता है कि मकान में ज्यादा लोग रहते भी नहीं हैं। दो घंटे तक वह इधर-उधर टहलकर मकान की थाह लेता रहा लेकिन एक भी आदमी दिखाई नहीं पड़ा। मतलब खतरा कम है। घर में आदमी कम माने चोर की आधी मुश्किल आसान। नवल चुपचाप जाकर आरा स्टेशन के एक प्लेटफार्म पर लुढ़क गया। देर रात काम करना था इसलिए अभी सोना जरूरी था। रात के बारह बजे तक सोया रहा नवल। उठा तो जैसे पूरा शहर शांत पड़ गया था। वह डेढ़-दो घंटे तक यूं ही रात में घूमता रहा। और रात दो बजे वह अपने पुराने अंदाज में उस घर में घुसा।

अंदर जाते ही चौंका। अंधेरे में डूबा हुआ घर। बिजली तो दूर, कहीं दीया-बाती का नामो निशान तक नहीं। लगा, घर के सारे लोग कहीं बाहर गये हैं। लेकिन घर के लोग बाहर गये हैं तो यह इतना साफ-सुथरा कैसे। उसने बरामदा पार किया। बरामदा के बाद गलियारा था और गलियारे से सटा एक कमरा। वह दबे कदमों से उस कमरे की तरफ बढ़ा। कमरे के दरवाजे को झटका देना ही चाहता था कि किसी के खांसने की आवाज आई। किसी बूढ़े आदमी के खांसने की आवाज। नवल रुका। खांसने की आवाज बता रही थी कि अंदर वाला आदमी जगा हुआ है और अगर वह कमरे में घुसा तो जगरम हो सकता है।

उस कमरे के ठीक सामने एक दूसरा कमरा था। बीच का गलियारा दोनों कमरों को अलग करता था। नवल ने दरवाजे के दोनों पल्लों के सटे हुए जगह पर हाथ लगाया और झटके से खुल गया कमरा। मतलब दरवाजा अंदर से बंद नहीं था। थोड़ी देर तक शांत खड़ा रहा नवल। सांस भी बंद, एकदम मुर्दे की तरह। लेकिन अंदर भी श्मशान वाली ही खामोशी थी। नवल दबे कदमों से अंदर घुसा। कमरे में अंधेरा था लेकिन इस अंधेरे में भी देखने की कला सीखी थी नवल ने। अंदर एक चौकी बिछी थी। चौकी के ऊपर मसहरी और उसमें कोई सोया हुआ। रजाई में पूरी तरह लिपटा था सोने वाला इसलिए नवल को पता नहीं चल पाया कि वह मर्द है या औरत। नवल ने आसपास देखा। एक कोने में टेबल। उसपर कुछ किताबें। एक तरफ बड़ा सा बक्सा और दूसरी तरफ अलगनी जिसपर करीने से सरियाकर कपड़े टांगे हुए थे। नवल इतमिनान के साथ बड़े बक्से के पास गया। इसमें कोई ताला नहीं। उसने बक्से को खोला- कुछ कपड़े और बरतन। शहर में चोरी बोरे में नहीं की जा सकती। वह गहना और रुपये खोज रहा था। बक्से में ही एक बैग मिला। कंधे पर टांगने वाला बड़ा सा बैग। उसने बैग खोला और जो भी भर सकता था वह भरने लगा। कपड़े, पीतल के छोटे के बरतन और कुछ पैसे। बैग कंधे पर रखकर पीछा मुड़ा ही था कि लगा जैसे उसपर बिजली गिरी हो। ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे। सामने जो कुछ देख रहा था वैसा कुछ पिछले पांच साल में किसी चोरी के दौरान उसने नहीं देखा था। डर के मारे पांव कांपने लगे। सामने खड़ी थी एक औरत। चुपचाप। केवल ब्लाउज और साया पहने। बड़ी-बड़ी आंखें और अंधेरे में भी दिखाई पड़ने वाली एकदम गोरी देह। बाल खुले हुए और आंखें एकटक उसे देखती हुई। नवल को थूक भी घोंटने में परेशानी हो रही थी। पता नहीं भूत-चुड़ैल है या देवी का रूप। अचानक वह मूर्ति हिली। वह टेबुल की तरफ मुड़ी और उसपर रखे  लैम्प को जला दिया। कमरे में हल्की पीली रोशनी फैल गई। उसने अंदाज लगाया- 30-32 साल की होगी। लम्बी और भरी हुई देह। खुले लम्बे बाल। नवल ने कमरे में खोंसे चाकू का हत्था पकड़ा और तय कर लिया कि इसे डराकर निकल जाना है। उसने चाकू निकाला भी लेकिन औरत नहीं डरी। वह चौकी पर बैठ गई। फिर हंसी और धीरे से कहा- ‘‘बस यही ले जाना था।’’

नवल चुप। वह धीरे-धीरे एक तरफ दरवाजे की ओर बढ़ने लगा। औरत फिर हंसी- ‘‘इसी माल के लिए आये थे? कुछ और भी है इस कमरे में तुम्हारे लिए जो तुम छोड़ कर जा रहे हो।’’

नवल ने हैरत से उसका चेहरा देखा। औरत चौकी से उतरी, उसकी तरफ बढ़ी और एकदम पास आकर रुक गई। इतने पास कि उस औरत की देह की खुशबू नवल के नथनों में भर गई। उसे अच्छा लगने लगा। लगा, जैसे भीतर से कुछ पिघल रहा है। माथा एकदम हल्का सा हो गया। बांह फड़की और उसके हाथ से बैग छूट गया। चाकू भी पता नहीं कहां गिर गया। शायद कोई जादू हो रहा था। उसने उस औरत के कंधे पर हाथ रखा। औरत ने कोई विरोध नहीं किया। नवल ने गौर किया, उसकी आंखें आधी बंद हो रही थी। नवल ने झटके से औरत को अपनी ओर खींचा और उसकी पीठ को अपने हाथों से घेर लिया। उस पर झुका ही था कि अचानक याद आई उस्ताद की बात- लंगोट ढ़ीला हुआ मतलब चोर खत्म। लम्बा जीवन जीना हो तो लंगोट और जीभ पर काबू पाना सीखो। नवल जैसे नींद से जागा। उसने औरत को झटके से छोड़ा, पीछे घूमा और तेजी से कमरे के बाहर निकला। बाहर निकलते हुए उसने पीछे मुड़कर एक बार देखा। औरत हैरत से उसे देख रही थी। उसने मुंह से तो कुछ नहीं कहा लेकिन आंखों में अजीब से भाव थे। शायद हिकारत के भाव। घबराये नवल ने एक बार जो उड़ान थामी तो सीधे स्टेशन जाकर ही रुका। वह कुत्ते की तरह हांफ रहा था और हाड़ कंपाने वाली ठंड में भी माथे पर पसीने की बूंदे छलछला रही थी।

तीन बज गये थे। उसने तय किया कि वह ट्रेन पकड़ेगा और सीधे डुमरांव और उसके बाद अपने गांव कोरान सराय। ट्रेन आ भी रही थी। नवल प्लेटफार्म के एकदम किनारे पटरियों के पास खड़ा था। बस ट्रेन आएगी और चढ़कर अंदर। ट्रेन अभी प्लेटफार्म पर ठीक से रुकी भी नहीं थी कि उसने सीढ़ी पर पांव रखे और फांदकर चढ़ गया। अंदर घुसने के साथ उसे लगा कि उसके साथ कोई और अंदर घुसा है। वह घूमा, कोई नहीं था। ट्रेन हौले-हौले रुकने की कोशिश कर रही थी और महज दस-बारह लोग स्टेशन पर थे जो इस इंतजार में थे कि ट्रेन रुक  जाए तो आराम से अंदर जाएं। तभी उसे लगा कि कोई पीछे है। कौन? उसका दिल जोर से धड़का। वही खुले बालों वाली लम्बी औरत। साया और ब्लाउज में। वह घूमा लेकिन कोई नहीं। मन का वहम है। उसने बाहर झांका, लेकिन किसी के एकदम पास होने के अहसास से उसके बदन में फिर से झुर्री दौड़ी। उसके नथने फिर उसी खुशबू को महसूस करने लगे जो उस औरत की देह से निकल रही थी। पर आसपास तो कोई नहीं। धत तेरे की। उस औरत ने कोई जादू टोना कर दिया क्या? उसके अंदर से बाहर क्यों नहीं निकल रही है? अब क्या उसके साथ-साथ गांव तक जाएगी?  उस औरत की आंख उसे याद आई। हिकारत से भरी हुई। नवल बेचैन हो गया। उसने डब्बे में बाथरूम के पास बैठने की कोशिश की लेकिन लगा जैसे वह औरत ट्रेन के दरवाजे के पास खड़ी है और उसे घृणा और उपेक्षा के साथ देख रही है। नवल ट्रेन से उतर गया। सामने पत्थर वाली बेंच थी और वह चुपचाप उसपर जाकर बैठ गया। इतना बेचैन वह जीवन में कभी नहीं हुआ। देर तक उसी बेंच पर बैठा रहा। ट्रेन ने अब दुबारा चलना शुरू कर दिया था। नवल चुपचाप उसे जाते हुए देखता रहा।

उसी बेंच पर वह आठ बजे सुबह तक बैठा रहा। इस दौरान उसने सोने की कई बार कोशिश की और हर बार आंखों के सामने वही औरत आकर खड़ी हो जाती। हिकारत से उसे देखती हुई। झटके से खुल जाती उसकी आंख।

वह चुपचाप प्लेटफार्म से बाहर निकल आया और सीधे फिर उसी घर के सामने आकर खड़ा हो गया। घर रात की ही तरह शांत था। वह घंटों घर के चारो तरफ टहलता रहा। लेकिन घर के अंदर से ना तो कोई बाहर आया और ना ही कोई अंदर गया। अचानक साइकिल की घंटी की आवाज से उसकी तंद्रा टूटी। एक आदमी साइकिल पर दूध के ड्रम लादे आया और सीधे घर के अंदर गया। थोड़ी देर के बाद बाहर निकला तो नवल ने उसे रोका।

‘‘इ किसका घर है भाईजी?’’ उसने धीरे से पूछा।

‘‘काहे?का काम है तोरा?’’ दूधवाले ने तीखी नजरों से उसे देखा था।

‘‘बस ऐसे ही पूछा था। इतना बड़ा घर है और इसमें रहने वाला कोई नहीं।’’ नवल अभी भी घर की ओर ही देख रहा था।

‘‘तिवारीजी का घर है। जनारदन तिवारी का। वही रहते हैं। अउर कुछ?’’ संदेह भरी नजरों से उसे देखता हुआ दूधवाला आगे निकल गया। नवल चुपचाप घर की ओर देखता रहा। सन्नाटे में डूबा हुआ घर। एकदम रहस्यमय और चुप। अचानक नवल को याद आया कि उसने रात से कुछ खाया नहीं है और वह टहलते हुए स्टेशन की तरफ निकल गया था।

रात दो बजे वह फिर उसी घर के पीछे खड़ा था। दीवार फांदी और सीधे उसी कमरे के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसने दरवाजे पर हाथ रखा ही था कि वह आराम से खुल गया। इस बार कमरे में अंधेरा नहीं था। टेबुल लैम्प की हल्की पीली रोशनी कमरे में भरी थी। सामने चौकी पर वही औरत। उसने अपने पांव पसार रखे थे और पीठ दीवार के सहारे सटा रखी थी। उसने साड़ी पहन रखी थी और बाल भी संवारे हुए थे। थोड़ा बनाव सिंगार भी। नवल दरवाजे पर खड़ा होकर उसे देखे जा रहा था और औरत के चेहरे की मुस्कुराहट खत्म  होने का नाम नहीं ले रही थी।

‘‘मैं जानती थी कि तुम आओगे।’’ उस औरत ने धीरे से कहा। उसने नवल को  आकर पास बैठने का इशारा किया। नवल किसी मशीन की तरह उसके बगल में जाकर बैठ गया।

‘‘मैंने तुमको सुबह में घर के बाहर खड़ा देखा था. तभी समझ गई थी कि तुम आओगे। कल सामान छोड़कर चले गये थे उसे ही लेने आये हो?’’ कहते हुए औरत हंसी।

‘‘इस घर में तुम अकेली रहती हो?’’ पहली बार आवाज निकली थी नवल के गले से।

‘‘नहीं। हैं ना?मेरे ससुर हैं। जनारदन तिवारी। बस दो ही जने हैं हमलोग।’’ कहते हुए औरत की आवाज उदासी से भर गई थी।

‘‘बाकी  लोग? माने तुम्हारा आदमी? सब कहां रहता है?’’ नवल ने गौर से उसका चेहरा देखा।

‘‘मर गया। मतलब मारा गया। घर का एक-एक आदमी मारा गया। कोई नहीं बचा। बस सोग मनाने के लिए घर में मैं हूं और बाबूजी।’’

‘‘कौन मार दिया?’’ नवल ने महसूस किया कि वह औरत एकदम उससे सट गई है। उसकी पूरी देह गर्म होने लगी थी।

औरत हंसी- ‘‘लालच ने मार दिया। यहां से बाइस कोस पर हमारा गांव है- गोसाईंपुर। वहां अपने घर के बांई तरफ जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा है। एकदम खाली और उजाड़, मेरी तरह।’’ नवल चिहुंका था। औरत ने बोलते-बोलते अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया था।

फिर औरत ने लम्बी सांस ली और धीरे से कहा- ‘‘उस जमीन को लेकर खूब लड़ाई हुई। बाबूजी के पटीदार के परिवार का कहना था कि जमीन उनकी है और बाबूजी का कहना था कि इसको उनसे कोई छीन नहीं सकता। दोनों परिवार भरे-पूरे थे। लेकिन जमीन के उस टुकड़े के लिए दस साल तक लड़ते रहे लोग। हर साल किसी न किसी की लाश गिरती। हालत यह हो गई कि दोनों परिवार में कोई मर्द नहीं बचा। सब मारे गये। केवल औरतें बच गई हैं। रोने के लिए और सोग मनाने के लिए। जमीन अब भी है लेकिन जोतने वाला कोई नहीं। सब मारे गये. फिर भी उस जमीन पर किसी का कब्जा नहीं। पता नहीं कितनों का खून पीयेगी निगोड़ी।’’ 

नवल को अपने कंधे पर गरम पानी का अहसास हुआ। शायद वह औरत रो रही थी। नवल ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और अपनी तरफ खींचा। उसने कोई विरोध नहीं किया और सीधे उसकी गोद में आ गिरी। नवल ने उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा- ‘‘दिन भर घर से ना तो कोई बाहर निकलता है और ना कोई अंदर आता है? एकदम सन्नाटा रहता है, ऐसा क्यों?’’

‘‘बाबूजी पूरे दिन बरामदे में बैठे रहते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं वे घर से बाहर निकले और मैंने अंदर किसी को बुला लिया तो?जवान विधवा औरत का क्या भरोसा? पहरेदारी करते हैं। मेरा भी घर से बाहर निकलने को जी नहीं करता। घर से बाहर निकलते ही निगोड़ी जमीन की  याद आ जाती है जिसके लालच ने पूरे घर को बरबाद कर दिया।’’

अचानक बरामदे में किसी के चलने की आवाज आई और औरत चुप हो गई। थोड़ी देर तक चलने की आवाज आती रही और कुछ देर के बाद फिर सब शांत पड़ गया। औरत ने धीरे से कहा- ‘‘लगता है बाबूजी को शक हो गया है। जब भी ऐसा होता है तो वे पूरी रात बरामदे में ही टहलते रहते हैं। अब वे आकर दरवाजा खटखटाएंगे। तुम अब जाओ। चोर हो, तुम्हें कौन पकड़ेगा?’’

नवल झटके से उठा। औरत ने उसकी बांह पकड़कर खींची और गालों को चूम लिया। नवल की पूरी देह थरथरा गई। लगा जैसे उसने बिजली का नंगा तार छू दिया हो। पहली बार किसी पराई औरत ने उसे चूमा था। फिर औरत ने धीरे से कहा- ‘‘कल फिर आओगे ना? ’’

 नवल ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने गलियारे में झांका। बूढ़ा आदमी शायद फिर से अपने कमरे में चला गया था। नवल  ने मुड़कर औरत की तरफ देखा। उसका मन नहीं हुआ कि वह बाहर निकले। जी किया कि वह वापस उस औरत के पास जाए और एक बार फिर गाल चूमने के लिए कहे। लेकिन खतरा माथे पर था। सुबह होने वाली थी। उसने सिर झटका और तेजी से बाहर निकल गया।

वह उस दिन गांव गया जरूर लेकिन दिन भर इधर-उधर घूमता रहा। एकदम बेचैन। कहीं मन नहीं लग रहा था। शाम होते-होते वह एक बार फिर आरा स्टेशन पर रात का इंतजार करते हुए टहल रहा था। और रात के दो बजते-बजते वह फिर उसी औरत के कमरे में था जिसने दो दिनों से उसका जीना मुश्किल कर दिया था। आज औरत ने रंगीन साड़ी पहन रखी थी। माथे में बिंदी लगा रखी थी और चेहरे से पाउडर की गंध भी आ रही थी। जैसे ही नवल अंदर घुसा, औरत ने उसकी बांह पकड़ कर खींची और चौकी पर बैठा लिया। फिर मुड़कर कमरे से बाहर निकल गई। नवल की समझ में नहीं आया कि वह कहां चली गई। थोड़ी ही देर के बाद औरत प्रकट हुई। हाथ में एक थाली। थाली में पूड़ी, सेवई और भुंजिया के साथ आम का गमकता हुआ अचार। अचार तो बस कमजोरी थी उसकी। कई दिनों के बाद रात को जमकर खाया। खाने के बाद चौकी पर लुढ़का। बगल में औरत। नवल के सारे लगाम टूट गये। उस्ताद किनारे रह गये और नवल नदी की धार में बहता हुआ दूर चला गया।

अब तो यह जैसे रोज का क्रम बन गया। सारा दिन इधर-उधर घूमता और रात होते ही औरत के पास पहुंच जाता।

और ऐसी ही एक रात जब सुबह में बदलने वाली थी वह उस औरत के कमरे से निकला। दबे पांव घर के बरामदे में पहुंचा। बरामदे से वह अहाते में निकलने ही वाला था कि जैसे कोई उसकी देह पर कूदा। हमला जोरदार था और एकदम अनजाने में हुआ था। नवल मुंह के बल नीचे गिरा। उसके मुंह से चीख निकलने वाली थी लेकिन कूदने वाले ने अपने हाथ से उसका मुंह दबा दिया। दोनों नीचे जमीन पर गिरे पड़े थे। कूदने वाला उसके ऊपर था और वह नीचे। पकड़ मजबूत थी और नवल चाहकर भी हिल नहीं पा रहा था। कूदने वाले ने उसके कान के पास अपना मुंह ले जाकर कहा- ‘‘साले, आवाज निकाली तो गोली मार दूंगा।’’

अब नवल को समझ में आ गया था कि कूदने वाला आदमी बूढ़ा है और हो ना हो वह जनारदन तिवारी है। लेकिन बूढ़े आदमी की पकड़ इतनी मजबूत? नवल का पोर-पोर दर्द कर रहा था। कूदने वाले आदमी ने उसे पकड़ कर खींचा और एक तरफ घसीटते हुए ले गया। नवल ने देखा कि बूढ़े आदमी की धमकी बेकार नहीं थी। उसके पास सचमुच एक बंदूक थी जिसे उसने बरामदे में रखा था। बूढ़े आदमी ने एक हाथ से उसे पकड़ा, दूसरे हाथ से बंदूक उठाई फिर लगभग उसे धंसोरते हुए अपने कमरे में लेकर गया। उसने कमरे का दरवाजा बंद किया और बत्ती जला दी। इसके बाद उसने नवल को ऊपर से नीचे तक निहारा। उसके देखने के अंदाज से नवल सिहर गया।

‘‘का नाम है रे तोर?हियां तक कैसे पहुंचा?’’ उसके शब्दों से घृणा टपक रही थी।

‘‘जी, नवल। नवल मुसहर। घर में चोरी करने आया था।’’ 

बूढ़े के चेहरे पर घृणा की लकीर और गहरी हो गई। उसने नवल के कुरते का कालर पकड़ कर अपनी तरफ खींचा – ‘‘साला, बोका किसको बनाता है रे? तू रोज रात को हियां चोरी करने आता है रे? हमको पता नहीं चल  रहा था का? हरामजादी। उसका मन भी लगा तो किससे? मुसहर से?’’

नवल चुप। मतलब बूढ़ा सब जान रहा था। बस मौके के इंतजार में था। साले ने पकड़ लिया। नवल का दिमाग तेजी से काम कर रहा था। अब यह बूढ़ा क्या करेगा? पुलिस को देगा? चोर-चोर कह के लोगों से पिटवायेगा? क्या करेगा? या फिर उसे गोली मार देगा? उसने सिर झटका।

‘‘कवन गांव का रहने वाला है तू?इधर का तो नहीं लगता?’’ बूढ़े ने अपनी बंदूक एक तरफ रख दी और अपनी चौकी पर पसर गया। नवल ने पहली बार उसे पूरी तरह देखा। छह फीट लम्बी देह, एकदम गोरा-चिट्टा। सफेद दाढ़ी और मूंछ। आंखों से झांकती क्रूरता और घृणा।

नवल ने धीरे से कहा- ‘‘जी, कोरानसराय के मुसहरटोल में घर है।’’

‘‘साला, कोरानसराय से रोज आरा आ जाता है। बड़का इश्कबाज है।’’ बूढ़ा ने धीरे से कहा और उठकर कमरे में टहलने लगा। नवल चकित था कि उसे पकड़ने के बावजूद बूढ़ा ना तो उसके साथ मारपीट कर रहा है और ना ही पुलिस को देने के बारे में बोल रहा है। बूढ़ा उसके पास आया, उसकी बांह पकड़ी और जोर का झटका दिया। नवल नीचे गिरते-गिरते बचा।. बूढ़े ने उसके कंधे पर जोर डाला और उसे नीचे बैठा दिया। एकदम अपने पैरों के पास. खुद चौकी पर बैठ गया और अपनी दोनों जांघों पर दोनों हाथों को रख लिया। फिर उसने नवल की आंखों में झांका- ‘‘लेकिन वो भी क्या करे बेचारी। शादी के एक साल भी नहीं गुजरे थे कि हरामजादों ने उसके आदमी को गोली मार दी। भरी  जवानी में विधवा हो गई। मैं उसका ससुर हूं तो क्या हुआ, उसकी देह की पीड़ा नहीं समझता? मैं नहीं जानता कि उसे इस उमर में केवल भोजन और कपड़ा भर नहीं चाहिए? लेकिन करुं क्या? ससुर हूं उसका। और जाति से ब्राह्मण। उसकी दूसरी शादी भी तो नहीं कर सकता।’’

नवल चुप। बूढ़ा भी इतनी बात कहकर चुप हो गया और उसकी आंखों में झांका। फिर धीरे से कहा- ‘‘उसे लगता है कि मैं उसकी पहरेदारी करता हूं। मैं उसकी पहरेदारी नहीं करता। इस घर के मान-सम्मान की पहरेदारी करता हूं। इसी मान-सम्मान के लिए तो तीन बेटों की बलि चढ़ा दी वरना उतनी सी जमीन की क्या औकात। मामला बस यह है कि जमीन पर दूसरा कोई चढ़ जाएगा तो हमारा मान-सम्मान सब खत्तम।’’

 नवल चुपचाप सुन रहा था। उसने गौर किया- बूढ़े की आंखें आंसू से भरी थी जिन्हें वह बार-बार अपनी दोनों बांहों से रगड़कर पोंछ रहा था।

फिर उसने नवल की आंखों में झांका- ‘‘तू तो चोर है। आज नहीं तो कल उसे छोड़ देगा। वह तुझसे उमर में बड़ी है। तूझे तो जात-बिरादर में दूसरी मिल जाएगी लेकिन वह तो बरबाद हो जाएगी।’’

नवल ने खांस कर गला साफ किया- ‘‘जी, मैं भी नहीं छोड़ पाउंगा। अब तो कहीं भी जाने का मन नहीं करता है।’’

बूढ़ा हंसा। फिर उसने नवल की ठुड्डी पकड़ी- ‘‘नहीं छोड़ेगा तो इस तरह रात-बिरात में आएगा? इस ब्राह्मण की इज्जत लेगा?’’

नवल चुप। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि बूढ़ा कहना क्या चाहता है? वह बूढ़े का चेहरा देखने लगा। बूढ़े ने धीरे से कहा- ‘‘एक बात कहूं? मानेगा मेरी बात? तू इसे लेकर चला जा कलकत्ता। मैं कुछ पैसे दे देता हूं। वहां मेहनत-मजदूरी करना। दोनों रहना।’’

नवल सन्न। उसने तो यह कल्पना भी नहीं की थी। वह चुपचाप बूढ़े आदमी का चेहरा देखे जा रहा था। मान-सम्म्मान की बात करने वाला बूढ़ा खुद अपनी पतोह को लेकर भाग जाने के लिए कह रहा है? यह क्या मामला है? बूढ़े ने उसके दोनों हाथ पकड़ लिये थे। उसकी आंखों से आंसू अब बहने लगे थे जिन्हें पोछने की भी कोशिश वह नहीं कर रहा था। अभी थोड़ी देर पहले गोली मारने की धमकी देने वाला आदमी उसके आगे गिड़गिड़ा रहा था। उसके चेहरे की सारी क्रूरता खत्म हो गई थी। उसकी जगह मानो कोई ऐसा बच्चा था जो एकदम असहाय था। गाय के बछड़े की तरह हो गया था उसका मुंह। वैसा ही कोमल और पसीजा हुआ।

नवल कुछ बोलता तभी उसने धीरे से कहा- ‘‘लेकिन मेरी एक बात मानना। दोनों साथ रहना लेकिन तुमलोगों का जब बच्चा होगा तो उसे मुझे दे देना। मैं उसे पाल-पोसकर बड़ा करुंगा।’’

चौंका नवल। इसका मतलब क्या?आखिर कहना क्या चाहता है यह आदमी? उसने बूढ़े की ओर गौर से देखा। बूढ़े के चेहरे की सारी कोमलता जैसे खत्म हो गई थी। उसका चेहरा बदलने लगा था। फिर से एकदम क्रूर और दृढ़। उसकी पूरी देह तन गई थी। आंखों से जैसे आग निकलने वाली थी। उसने दांत पीसते हुए कहा- ‘‘बच्चे को दे देना मुझे। तू भले मुसहर है। वह तो ब्राह्मणी है। मैं बच्चे को बड़ा करुंगा और मजबूत बनाउंगा। फिर उस जमीन के लिए लड़ेगा वह। मरेगा या मारेगा। जमीन मेरी होगी। चाहे कुछ भी हो जाए।’’

नवल की पूरी देह थरथरा गई थी। उसकी पूरी देह पसीने से भींग गई थी। बाहर सुबह का उजाला फैलने लगा था।

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