श्रीधर करुणानिधि की 6 कविताएं

श्रीधर करुणानिधि

जन्म पूर्णिया जिले के दिबरा बाजार गाँव में

शिक्षा- एम॰ ए॰(हिन्दी साहित्य) स्वर्ण पदक,

   पी-एच॰ डी॰, पटना  विश्वविद्यालय, पटना।

 

प्रकाशित रचनाएँ-     विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। आकाशवाणी पटना से कहानियों का तथा दूरदर्शन, पटना से काव्यपाठ का प्रसारण।

प्रकाशित पुस्तकें-1. ’’वैश्वीकरण और हिन्दी का बदलता हुआ स्वरूप‘‘(आलोचना पुस्तक, अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, बिहार

 

  1. ’’खिलखिलाता हुआ कुछ‘‘(कविता-संग्रह, साहित्य संसद प्रकाशन, नई दिल्ली)

 

संपर्क-   श्रीधर करुणानिधि

द्वारा- श्री मती इंदु शुक्ला

आलमगंज चौकी, गुलजारबाग पटना-800007

मोबाइल- 09709719758

ई-मेल- shreedhar0080@gmail.com

  1. फूल उगाने वाले

 धरती बंजर हो गई होती 
यदि शहतूत के पेड़ की ओट से
चाँद को देखने की तसल्ली लिए
कोई दीवाना सारी रात चकोर न बनता

चाँद प्यार कबूल ले जरूरी नहीं 
हरियाली उगाने वाले 
फूल को सींचते हुए
धरती को रंगों से आबाद करते हुए 
इंसान को बंजर होने से बचाते रहे..

 

2. देवताओं की उम्र नहीं पूछी गई

 वे दीर्घायु हैं
शतायु होने के आशीर्वाद से ऊपर उठ कर वे
न जाने किन-किन पहाड़ों की कन्दराओं तक
बरगद की तरह हजारों सालों से फैल रहे हैं
वे दिकू हैं लेकिन कैफीयत है कि वे छाए हुए हैं 
राज भोगते हुए उबे हुए चालाक राजनेता की तरह

कहते हैं कि उनकी उम्र नहीं पूछी गई है अब तक
और यही उनकी खुशहाली की वजह है
उनकी मौत का इंतजार करने वालों के लिए 
वक्त बड़ा निर्दयी है
दिव्य व्यंजनों ने उनके चेहरे के तेज को 
ऐसा बढ़ाया है 
कि चांद और सितारे भी कुम्हला गए

वे आशीष देते हैं 
धन लुटाते हैं
उनके बाहुओं के बल से खौफ होता है

भक्त ऐसा मानते हैं कि उनके प्रताप से
हर ओर शांति है 
अशांति वहीं है जहां जंगली रहते हैं
और उनके जासूस और सिपाही उन्हें ढूंढते रहते हैं

जो लोग देवताओं के कहने पर 
ऋचाओं का पाठ नहीं करते 
और देवताओं की उम्र पूछने की जुर्रत करते हैं 
दरअसल वही जीवित रखते हैं लोकतंत्र

देवता टिके हुए हैं 
क्योंकि देवताओं की उम्र पूछने वाले बहुत कम हैं

3. तारों को कभी शुक्रिया नहीं कहा

अंधेरे को कम करने में
जो भी भूमिका निभाई हो उन्होंने 
हमने कभी नहीं कहा
आँखों जितनी रोशनी के लिए एक भी शब्द
और उनका भी क्या
जिन्हें अंधेरे के लिए पता हो
कि घने बादल की मोटी परतों को छीलकर 
कोई रास्ता नहीं बनाता…

बाजार सजे थे 
प्रशंसा में शब्दों की फिजूलखर्ची के
क्योंकि हमें भी लत लग गई
किसी तीसमारखाँ चाँद की
क्योंकि हमें नहीं समझाए गए
अंधेरे और उजाले की पहचान के तरीके

और उजाले के भ्रम जाल में
भेड़िए की तरह अंधेरे के तेवर 
हत्यारे के तीखे नाखून से धंसते हैं
कंठ को चीरकर आवाज को पत्थरों के नीचे दबाकर …

आपको शायद चीखने वाले हत्यारे पर तरस आए
क्योंकि आप कहें कि “नहीं”!
कुछ भी हो पर ये नहीं हो सकता
कि उजाले की शक्ल वाला कोई इस तरह…

ओह! हमने तारों को कभी शुक्रिया नहीं कहा….

 

4. बस एक

एक ही दिन 
हमें मिला
एक ही शाम हमें मिली
हो सकता है एक ही रात
हमारे हिस्से आए
और हर रात की एक सुबह की गलतफहमी आए हमारे हिस्से
एक उनींदी चिड़िया के बड़बोलेपन के कारण…

क्योंकि हम अकेली अंधेरी रात के साए में
पेड़ को ऊनी चादर से जी भर ढकते रहे
और तारों को ओस की तरह सोख लिया
इसलिए हो न हो
हमें अपनी शिकायत खुद सुनानी पड़े
पेड़ की शाख पर सोती गिलहरियाँ भी 
हमसे कुछ न कह पाएँ

एक दिन हमारी आवाज का जादू
उजले फूल सा झड़ कर
शाम की थाली में रौनक याद सा महके
बस एक दिन 
हम अपनी खुशबू की गिरफ्त में रहें
बिना कोई वादा निभाए सपनों से….

 

5. रैन

धूप खरगोशी
खिली बड़ी देर से
दोपहर तुम्हारी तीखी नाक सी
ढलती हुई बिना ठहरे दूर जा रही है

किस्त दर किस्त 
ठंडी बर्फीली खेप 
हथियारों की नुकीली चुभन सी
पश्चिम सीमांत से
आ रही है

उजाले की वे सारी किताबें 
बालकनी में जिनके पन्ने 
तुम्हारी फूल सी उंगलियों में उलझे
रोशनी की स्याही हुए

तुम्हारे नेलपॉलिश का रंग
बीते साल की धुंध में चमकीला रहा
रैन गुलाबी! हमें पैगाम में
आने वाला एक खरगोशी दिन दे दो

 

6. वाजिब

 “हक तेरा भी उतना ही है”
उस पहले दिन की धूप में 
जब मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा 
तो वह नरम इंसान
पीपल का पत्ता हो गया

जैसे धरती यह हक देती है 
जैसे नदिया नींद में बहती हुई 
हरेक को प्यास बुझाने का हक देती है 
जैसे खजूर के पेड़ 
एक मीठे फल की याद के गीत गाते
मेरी जेब में मीठा फल रखकर 
मुझे यह हक देते हैं
कि दुनिया के हर प्यासे के लिए 
पानी के गीत लिखूं

तेरी याद से मेरी जेब भरी हैं
मेरे हक की नुमाइश में
धरती, चाँद और सितारे 
तुम्हें फिर तन्हा कर गए

मैंने अब तुम्हारे कंधे पर हाथ रखा
अब तुम पठार में बदल रहे हो 
तुम एक विशाल पेड़ में तब्दील हो रहे हो

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