नए विषय, नए फलक, नई दृष्टि : कहानी की नई ज़मीन

‘उद्भावना’ के कहानी विशेषांक में स्त्री कथाकारों की प्रभावशाली मौजूदगी है। इस अंक में प्रकाशित स्त्री कथाकारों की कहानियों में नए विषय हैं, नई  दृष्टि है और नए फलक हैं। इन कहानियों  पर सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की टिप्पणी

साहित्यिक पत्रिका ‘उद्भावना’ के हाल ही में प्रकाशित कहानी विशेषांक में आठ स्त्री कथाकारों की बहुत ही प्रभावशाली मौजूदगी है। ममता कालिया, नमिता सिंह, प्रज्ञा, श्रद्धा थवाईत, सरिता कुमारी, सिनीवाली, आयशा आरफीन की कहानियां हैं तो मधु कांकरियां का उपन्यास अंश। अंक को पढ़ना शुरू किया तो पता नहीं क्यों ख्याल आया कि पहले इन्हें ही पढ़ा जाए। फैसला सही रहा। इन कहानियों ने मुझे और ज्यादा समृद्ध किया। मैंने हमेशा यह पाया है कि इंसानी संवेदनाओं को प्रभावी स्वर देने में स्त्री कथाकारों का कोई सानी नहीं। आज इन कहानियों पर ही यहां चर्चा करूंगा।

दो गज की दूरी : ममता कालिया

वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया की कहानी ‘दो गज की दूरी’ पहल-123 में छपी उनकी कहानी ‘दूसरा मेघदूत’ के आगे की कहानी है। अतीत के ज़ख़्मों से मुक्त होने, अपने एकाकीपन से उबरने और खुल कर ज़िन्दग़ी जीने की कोशिश करती एक बुजुर्ग स्त्री समिधा की कहानी है। समिधा की दोस्ती श्यामल नाम के एक युवक से होती है, जो बैंक में काम करता है लेकिन साथ ही रेडियो जॉकी है और लाइव प्रोग्राम के एंकरिंग भी करता है। किस तरह सोशल मीडिया के जरिए उनकी दोस्ती होती है, किस तरह उनकी मुलाकात होती है-यह सब आप ‘दूसरा मेघदूत’ कहानी में पढ़ चुके होंगे। अगर आपने अभी तक यह कहानी नहीं पढ़ी है तो http://www.pahalpatrika.com/frontcover/getrecord/315 इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।

‘दो गज की दूरी’ कहानी में ममता जी ने समिधा के अतीत के पन्ने खोले हैं। टोक्यो पढ़ाने गए अपने पति वरुण की बेवफाई ने समिधा को ऐसा ज़ख्म दिया था, जिसे उबरना इतना आसान नहीं था लेकिन वह न केवल इस दुख से उबरती है बल्कि बेटे की उचित परवरिश भी करती है। लेकिन रिश्तों के ज़ख़्म कभी जाते नहीं। यादों की पछुआ हवा चलते ही टहकने लगते हैं। यादों की यह पछुआ हवा कभी भी चलने लगती है, इसके लिए किसी मौसम विशेष की जरूरत नहीं होती। इसलिए जब तब उसका दिल टीसने लगता है लेकिन ऐसे में श्यामल का साथ उसे जीने के लिए ऑक्सीजन देता है। यही वजह है कि ‘दूसरे मेघदूत’ से लेकर ‘दो गज की दूरी’ तक समिधा श्यामल से मिलने, उसके साथ वक्त बिताने के लिए बेसब्र दिखती है।

समिधा और श्यामल का रिश्ता जटिल है, इसे किसी नाम में नहीं बांधा जा सकता है। यह जितना सहज है, उतना ही जटिल भी। इस कहानी में समिधा के मोबाइल गुम होने से लेकर श्यामल के प्रोग्राम के मंच टूटने तक की ऐसी घटनाएं हैं, जो यह बताती हैं कि समिधा श्यामल का हद से ज्यादा चिन्ता करती है। श्यामल उसके बारे में नहीं सोचता — ऐसा भी नहीं है। वह घायल अवस्था में मोबाइल लौटाने समिधा के घर आता है। घायल श्यामल को रात को अपने घर रोकना चाहती है लेकिन तभी श्यामल खुशखबरी सुनाता है कि उसकी पत्नी समता मां बनने वाली है और उसे उसके पास होना चाहिए। समिधा उसे बधाई देती है लेकिन शायद कहीं न कहीं टूटती भी है। इसकी एक वजह यह भी है कि समिधा के साथ सोशल मीडिया चैट में या आमने-सामने मुलाकात में श्यामल हमेशा यह दर्शाने की कोशिश करता है कि समता के साथ उसके रिश्ते अच्छे नहीं है। उनके बीच दूरी है। वह कहता है, ‘देखो पलंग 6X6 का है। हमने अपनी-अपनी दीवार चुन रखी है।’ लेकिन समता मां बनने वाली है और उस तक पहुंचने की श्यामल की बेताबी बताती है कि वह झूठ बोल रहा था। मित्रता के लिए श्यामल का यह झूठ समिधा को आहत करता है। इसलिए वह टूटती है। 

     कहानी की बुनावट, किस्सागोई और भाषा की रवानी ऐसी कि एक बार पढ़ना शुरू करें तो छोड़ नहीं सकते। कहानी में कोरोना संक्रमण का वक्त दर्ज है। ‘दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी’ कोरोना से बचाव का यह सरकारी जुमला कहानी में कुछ इस ढंग से आया है कि इसे बिल्कुल नया मोड़ दे देता है। इसलिए कहानी का इससे सटीक टाइटल और कुछ नहीं हो सकता था। कहानी ऐसी जगह आकर खत्म होती है, जहां पाठक भौंचक रह जाता। क्या दोनों अपनी-अपनी दुनिया में लौट जाएंगे या श्यामल चैट में फिर कोई नया गिमिक खेलेगा?  कहानी यहां भी खत्म हो सकती है, जहां खत्म  हुई है या

फिर हो सकता है, ममता जी समिधा-श्यामल की कुछ और कहानियां लिखें।

एक और बनवास : नमिता सिंह
‘दो गज की दूरी’ की समिधा जिस धोखे और दर्द से उबर कर काफी निकल चुकी  है, ठीक उसी धोखे और दर्द का सामना मैथिली कर रही है। मैथिली इस अंक में छपी नमिता सिंह की कहानी ‘एक और बनवास’ की नायिका है। मैथिली का पति रामेंद्र बहुत ही शातिर किरदार है। वह मैथिली से प्यार नहीं करता बल्कि उसे अपने चंगुल में फांसता है। प्यार से लेकर शादी तक उसके लिए किसी प्रोजेक्ट की तरह है। प्रेम उसके लिए एक्टिंग था। वह जिस वक्त मैथिली से प्रेम का अभिनय कर रहा होता है, ठीक उसी वक्त अमेरिका में बैठी मानसी के साथ भी प्यार की पींगें बढ़ा रहा होता है। मानसी की मदद से उसे अमेरिका में नौकरी भी मिल जाती है और वह वहां जाने की तैयारी कर रहा होता है लेकिन तभी मैथिली का पूरी सच्चाई पता चल जाती है। इससे पहले कि रामेंद्र कोई झटका देता, मैथिली ने ही एक पत्र लिखकर रामेंद्र को बता दिया कि वह सब जानती है और उसकी हर एक्टिंग की उसे खबर है।

      इस कहानी में रामेंद्र के किरदार की विस्तृत डिटेलिंग है। उसकी शातिराना हरकत की शिकार मैथिली शुरू से ही होती रही। यहां तक कि बॉस के साथ उसके लंच करने या उसकी कार में जाने पर उसके ताने मैथिली के चरित्र पर किसी कीचड़ की तरह पड़ते हैं। मैथिली परेशान होकर छुट्टी पर चली जाती है लेकिन आखिरकार रामेंद्र उसे अपनी मुहब्बत और फिर शादी के जाल में फंसा ही लेता है। भोली भाली मैथिली को कभी उस पर शक नहीं होता। वह उसके अभिनय को मुहब्बत समझ कर खुश होती रहती है लेकिन जब भेद खुलता है तो वह सकते में आ जाती है। आप जिस पर आंख बंद कर भरोसा करते हैं, ऐसा अपना जब छलता है तो जो दर्द होता है, उसकी तुलना किसी और दर्द से नहीं हो सकती।

     लेकिन मैथिली वह नहीं, जो हार जाए। वह न केवल अपनी अलग राह चुनती है। मैथिली न केवल रामेंद्र को उसकी औकात बताती है बल्कि 6 साल बाद उस पर धावा भी बोलती है। 6 साल बाद वह 5 साल की अपनी जुड़वा बेटियों और मां को लेकर अमेरिका जाने का फैसला लेती है और रामेंद्र को सूचित करती है कि ‘धोखे से भरा बनवास…अब किसी को स्वीकार न होगा।’

रज्जो मिस्त्री : प्रज्ञा
     प्रज्ञा की कहानी ‘रज्जो मिस्त्री’ स्त्री के संघर्ष के दूसरे फलक की कहानी है। अपने अस्तित्व को बचाए रखने और उस हक को छीन लेने का संघर्ष, जिससे उसे सिर्फ इसलिए वंचित रखा गया है क्योंकि वह स्त्री है।

‘औरत है मर्द के पीछे रह। मर्द होने की कोशिश में न मर्द बन पाएगी और औरत होने से भी जाएगी।’ ठेकेदार रज्जो से ये तल्ख बातें तब कहता है, जब वो बेलदारी छोड़कर मिस्त्री का काम कर रही होती।

औरत के लिए मर्द होने की कोशिश क्या है?

औरत का मर्द बनना क्या है और औरत का औरत रहना क्या है?

प्रज्ञा की कहानी ‘रज्जो मिस्त्री’ इन्हीं सवालों की गहरी पड़ताल करती है।

रज्जो राजमिस्त्री है। उसके पिता बहुत ही ऊंचे दर्जे के राजमिस्त्री थे। रज्जो ने उन्हीं से घर बनाने का हुनर सीखा। वह सारे काम जानती है। दीवार खड़ी करने से लेकर लेंटर और शटिरंग डालने तक का लेकिन निर्माण कार्य में लगे मजदूरों से लेकर ठेकेदारों तक यह भरोसा ही नहीं कि औरत सिर पर ईंट-बालू-मसाला ढोने यानि बेलदार का काम करने की जगह मिस्त्री का काम भी कर सकती है। यहां तक कि रज्जो का भाई नरेश भी रज्जो का हौसला तोड़ने का कोई मौका नहीं चूकता, जबकि वह यह खूब जानता था कि रज्जो उससे अच्छी मिस्त्री है।

एयरकंडीशंड कार्पोरेट हाउस हो या तपती धूप में बिल्डिंग बनाने का काम-हर जगह पुरुषों का वर्चस्व है। हम जिसे पितृसत्ता कहते हैं, दरअसल वह कोई सत्ता नहीं बल्कि संक्रमण है। जन्म लेने के साथ ही इंसान इस संक्रमण का शिकार हो जाता है। महिला भी और पुरुष भी। आप देखिएगा पित्तृसत्ता ने औरतों के लिए जो नियम कायदे बनाए हैं या बनाते हैं, ज्यादातर मामलों में उसे लागू स्त्रियां ही करती हैं। इसलिए नहीं कि स्त्री स्त्री की दुश्मन है, बल्कि इसलिए कि पित्तृसत्ता का संक्रमण उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं होने देता कि वह किस तरह अपने ही पैरों में बेड़ियां डाल रही हैं। इसलिए दीवार बनाने की बात पर जब मैना कहती है, ‘अब तू तो रहने ही दे…जिसका काम उसी को साजे’ तो रज्जो तड़प कर रह जाती है। उसके आसपास के कई पुरुषों ने उसकी काबिलियत पर सवाल उठाए थे लेकिन जब मैना उठाती है तो वह ज्यादा आहत होती है।

औरत होने की परिभाषा ही है मर्द के पीछे रहना। किसी भी क्षेत्र में अगर वह मर्द से बेहतर काम करती है तो उसे याद दिलाया जाता है कि वह औरत है और उसे अपनी हद में ही रहना चाहिए। फेसबुक पेज Vidu’s Baton के  एक लाइव प्रोग्राम के दौरान किसी ने टिप्पणी की थी कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। बहुत ही सच्ची बात है यह। रज्जो स्त्री बनाने की इसी प्रक्रिया, इसी मानसिकता का विरोध करती है। मायके में भी और ससुराल में भी। स्त्री के प्रतिरोध से ही यह संक्रमण खत्म होगा और हो भी रहा है। बेटियां अब हर क्षेत्र में आगे जा रही हैं। पुरुषों से बेहतर कर रही हैं, चाहें लेंटर डालना हो या चांद पर पहुंचना।

कोरोना संक्रमण के दौरान कामगार वर्ग ने जिस संकट का सामना किया, उसका भी जिक्र इस कहानी में है। वैसे अब तक इस विषय पर जो भी कहानियां लिखी गई हैं, उनमें बस मजूदरों की बात कही गई है, मैंने यह पहली कहानी पढ़ी, जिनमें एक महिला कामगार की समस्या को बहुत ही मार्मिक ढंग से दिखाया गया है। दरअसल कोई भी संकट हो, पुरुषों के मुकाबले स्त्री पर उसका असर ज्यादा पड़ता है। लॉकडाउन में रज्जो जिन संकटों का सामना करती है, वह एक पुरुष कामगार के मुकाबले ज्यादा गंभीर है। मैं प्रज्ञा को इस बात के लिए बधाई दूंगा कि उन्होंने इस पक्ष को उठाया है।

यह कहानी बताती है कि एक कथाकार को लिखने से पहले कितनी मेहनत करनी चाहिए। राजमिस्त्री, भवन निर्माण से जुड़े काम, घर बनने की प्रक्रिया, शब्दावलियों का जिस तरह से इस कहानी में उपयोग है, वह प्रभावित करता है। इस कहानी को लिखने के लिए उन्होंने कितना फील्ड वर्क किया होगा, उनके काम को कितने महीन ढंग से ऑब्जर्व किया होगा—इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रज्ञा की लेखनी में यह बात हमेशा ही दिखती है। उनके उपन्यास ‘धर्मपुर लॉज’ में भी फील्ड वर्क खूब दिखता है।  प्रज्ञा अपनी हर कहानी में कुछ नया दे जाती हैं। इस कहानी के साथ भी ऐसा ही है।

ममता कालिया, नमिता सिंह और प्रज्ञा –तीनों की इन कहानियों की खास बात यह है कि इनकी नायिकाएं बहादुर हैं। वो न किसी से डरती हैं, न दबती हैं। हालात कैसे भी क्यों न हों, वो सर्वाइव करने की कला जानती है। उनकी यह जीजिविषा प्रेरक है।

साइलेंट किलर : सरिता कुमारी
     घर में जब किसी नवजात की किलकारी गूंजती है तो पूरा परिवार खुशियों के अंतहीन आसमान में उड़ने लगता है। जन्म से बड़ी खुशी इस दुनिया में और कुछ भी नहीं। फिर उस मां की खुशी की कल्पना भी आसानी से की जा सकती, जिसने नौ महीने तक बच्चे को गर्भ में रखा और तमाम कष्ट सहते हुए उसे जन्म दिया। लेकिन जरूरी नहीं कि मां बनने के बाद हर स्त्री खुशी के सागर में ही गोते लगाए। कभी-कभी मां बनने के बाद स्त्री में ऐसा परिवर्तन होता है, जो उसके लिए जानलेवा भी साबित हो सकता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसकी इस समस्या से परिवार अनजान ही रहता है। या तो इस समस्या की ओर ध्यान नहीं देता या इसकी अनदेखी करता है।

सरिता कुमारी की कहानी ‘साइलेंट किलर’ इसी गंभीर समस्या को बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ उठाती है। यह कहानी मनोहर की है, जिन्होंने अपनी पत्नी मीरा को इसी अवसाद की वजह से खो दिया था। मां बनने के दो महीने बाद ही मीरा ने खुदकुशी कर ली थी। कहते हैं कि मां बनना दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है लेकिन मीरा के लिए तो यह अभिशाप ही साबित हुआ। अब मनोहर मीरा वाले लक्षण अपनी बहू नेहा में भी देख रहे हैं। मीरा की तरह ही नेहा भी मां बनने बाद गुमसुम हो गई। अपने में खोई-खोई। न हंसती, न ज्यादा बोलती। यहां तक कि नवजात बच्ची को लेकर भी कोई उत्साह नहीं।

     उसके ये लक्षण देखते ही मनोहर अलर्ट हो गए लेकिन नेहा को डॉक्टर तक ले जाने के लिए उन्हें कम संघर्ष नहीं करना पड़ा। उनका बेटा पवन यह मानने को तैयार ही नहीं था कि नेहा बीमार है। किसी का उदास हो जाना, अचानक चुप हो जाना भी भला कोई बीमारी है? हम-आप और ज्यादातर लोग ऐसा ही सोचते हैं। साइकियाट्रिस्ट के पास जाने के नाम पर तो समाज में इतनी झिझक है कि मानो वहां जाते ही लोग पागल करार देंगे। डिप्रेशन जितनी बड़ी समस्या है, उससे भी कहीं ज्यादा बड़ी समस्या उसे स्वीकार नहीं करना और डॉक्टर के पास जाने से कतराना है। पवन भी इसके लिए तर्कसंगत आधार पर कहां तैयार हुआ?  मीरा का इलाज करने वाली डॉक्टर शालिनी ने पवन को इमोशनली इसके लिए मजबूर किया कि पिता का मन रखने के लिए चले जाओ।

     डॉक्टर से मिलने के बाद पवन की आंखें खुली। डॉक्टर ने कहा था, ‘नेहा प्रसवोत्तर अवसाद के खतरनाक अंधे मोड़ पर है, जिसके आगे क्या है, किसी को नहीं पता।’ मनोहर को भी कहां पता था? तभी तो वह मीरा को छोड़कर ऑफिस ट्रिप पर गए थे। ज्यादातर लोगों को ही यह मर्ज पता नहीं चल पता। बीमार को भी नहीं लगता कि वह बीमार है। मनोहर की समझदारी से नेहा को अंधे मोड़ से पहले ही रोक लेने में कामयाबी मिल गई थी। इसी दौरान मनोहर ने पवन को बताया था कि उसकी मां की मौत कैसे हुई थी। तब जाकर पवन को इस बीमारी की गंभीरता और ज्यादा समझ में आई थी।

     सरिता की यह खूबी है कि वो अपनी कहानियों में ज़िन्दगी के ऐसे मसले उठाती हैं, जिन पर समाज में जागरूकता की जरूरत है। ‘परिकथा’ के नववर्ष अंक में प्रकाशित उनकी कहानी ‘चलो घऱ चलें’  में भी उन्होंने ऐसा ही मुद्दा उठाया था। कोरोना काल में जान हथेली पर रखकर फ्रंटलाइन पर काम करने वाले डॉक्टरों के साथ कुछ जगह जिस तरह बदसलूकी हुई, उसे सरिता ने इस कहानी का विषय बनाया था। कोरोना के दौरान कितने ही डॉक्टरों को उनके मकान मालिकों ने घर खाली करने को कह दिया था, कितने ही डॉक्टरों को घर लौटने पर पड़ोसियों के विरोध का सामना करना पड़ा था। सभी इस बात को लेकर डरे हुए थे अस्पताल से लौटने वाला डॉक्टर कोरोना संक्रमण फैला सकता है। डॉक्टरों से बदसलूकी करने वालों की सोच पर इतनी मिट्टी पड़ी थी कि उन्होंने यह सोचने की जहमत ही नहीं उठाई कि डॉक्टर किसी और की ज़िन्दग़ी बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल अस्पताल में ड्यूटी कर रहे हैं।
कुछ कहानियां समाज को राह दिखाती हैं। लोगों की ज़िन्दगियां बचाती हैं। ‘साइलेंट किलर’ ऐसी ही कहानी है। जिन्हें प्रसवोत्तर डिप्रेशन के बारे में जानकारी नहीं है, वो इस कहानी को पढ़ने के बाद जाहिर तौर पर सजग होंगे। न केवल परिवार में बल्कि पास-पड़ोस में मौजूदा किसी नेहा को समय रहते डॉक्टर के पास पहुंचा पाएंगे, किसी मीरा को अकाल मृत्यु के मुंह में जाने से बचा पाएंगे।

हैप्पी जर्नी: सिनीवाली
‘एक दिन का बात नहीं है कि रुक जाएंगे…पेट है पेट…इसका अपना हाथ-पैर होता है…जो अपना रास्ता बना लेता है।‘

     यही ज़िन्दग़ी का कड़वा सच है। सिनीवाली ने अपनी कहानी ‘हैप्पी जर्नी’ में अद्भुत सूत्र वाक्य लिख दिया है। यह संवाद ठसाठस भरी कोसी एक्सप्रेस में एक हॉकर का है। जब लोग उसे अंदर जाने से रोकते हैं तो इस जवाब से वह सबको चुप करा देता है। उसे रोकने वालों को भी अपनी-अपनी भूख याद आ गई होगी और वो सारे रास्ते भी जो भूख से मजबूर उनके पेट ने बनाए होंगे।

     ‘हैप्पी जर्नी’ कोसी एक्सप्रेस के एक जनरल बॉगी के अंदर की कहानी है। ट्रेन पर चढ़ने से लेकर अपनी जगह बना लेने तक की कहानी। ट्रेन के पहिये यात्री नहीं समाज लेकर चलते हैं। जनरल बॉगी में यह समाज ज्यादा जीवन्त होता है क्योंकि इस डिब्बे में यात्रा करने वाले केवल ट्रेन में चढ़ने और अपने आराम लायक जगह बनाने के लिए ही संघर्ष नहीं करते बल्कि उनकी निजी ज़िन्दग़ी में भी कदम-कदम पर ऐसा ही संघर्ष है। थोड़े में खुश, थोड़े में दुखी, छोटी बात पर जान लेने-देने पर उतारू तो किसी बड़ी बात पर गहरी खामोशी। हमारे  समाज का यह चरित्र इस कहानी में खूब उभर कर आया  है।

     सिनीवाली ने एक डिब्बे के यात्रियों के बहाने बिहार के पूरे समाज को दर्शाया है। इसमें कोई एक किस्सा नहीं है। टुकड़े-टुकड़े में अलग-अलग स्थितियां है, जो एक साथ जुड़ कर एक बड़ा परिवेश तैयार करती है। बिहार का सामाजिक परिवेश।

अगर आपने कभी जनरल डिब्बे में सफर किया होगा तो इस कहानी को पढ़ते वक्त आपको लगेगा कि आप खुद सफर कर रहे हैं और अपने समाज को देख रहे हैं। रूमाल फेंककर सीट लूटने वाले पर गमछा लूट कर सीट फेंकने वाला भारी पड़ता है। कोई अपने दुख से दोहरा हुआ जा रहा है तो कोई इस विकटता में भी अपनी श्रेष्ठता का बखान करने से नहीं चूकता। एक-दूसरे की हकीकत से सब वाकिफ हैं लेकिन क्षण भर की खुशी के लिए ऐसा करने में उन्हें कोई झिझक नहीं होती।

     इस कहानी की खूबी इसकी भाषा भी है। बिहार की आंचलिक बोली बहुत ही स्वाभाविक ढंग से आई है। किरदार अपनी बोली बोलते हैं। उनमें कोई बनावटीपन नहीं है। कोई बनावटीपन नहीं होने की वजह से ही कहानी सहजता के साथ बांधे रखती है। संवेदना के स्तर पर आप हर किरदार से जुड़ते चले जाते हैं। परिकथा के संपादक और वरिष्ठ कथाकार शंकर ने एक बातचीत में कहा था, “लेखक अपने आसपास की चीज़ों से जितनी गहराई से जुड़ेगा, उतनी ही गहरी उसकी संवेदना होगी और जब उसकी संवेदना गहरी होगी तो कहानी भी उतनी ही गहरे रूप में संवेदनात्मक होगी। तब पाठक भी कहानी के साथ उतनी ही गहराई से जुड़ जाएगा। अगर लेखक गहराई से नहीं जुड़ेगा तो यह जुड़ाव कहानी में भी नहीं आएगा। इसलिए संवेदना की  तीव्रता, उसका घनत्व कहानी के सफल होने के लिए सबसे बड़ी शर्त है ।” इस कसौटी पर यह कहानी बिल्कुल खरी उतरती है।

नीली गली, बारिश और आल्हा : श्रद्धा थवाईत
     ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ स्लोगन के साथ जो संचार क्रांति शुरू हुई थी, उससे दुनिया मुठ्ठी में तो आई लेकिन ढेर सारी बुराइयों के साथ। यह इंसानी प्रवृत्ति है कि उसे अच्छाई के मुकाबले बुराई ज्यादा आकर्षित करती है। इन बुराइयों में सबसे खतरनाक है पोर्न वेबसाइट्स। देश-विदेश में कई अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि यौन अपराधों में बढ़ोतरी के पीछे पोर्नोग्राफी की भी अहम भूमिका है। श्रद्धा थवाईत की कहानी ‘नीली गली, बारिश और आल्हा’ में इसी गंभीर और संवेदनशील मसले को उठाया है।     इंटरनेट पर फैले पोर्नोग्राफी की इस दुनिया को श्रद्धा ने नीली गली कहा है। इस गली में जो एक बार भटक गया, उसका वापस लौटना मुश्किल है। ब्रह्मराक्षस उसे वापस नहीं आने देता। ब्रह्मराक्षस यानि मोबाइल का एडिक्शन, मोबाइल पर पोर्नोग्राफी देखने का एडिक्शन। मोबाइल अपने आप में कोई ब्रह्मराक्षस नहीं लेकिन उसके अन्दर ब्रह्मराक्षस रहता है। इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ ही यह जिन्दा हो उठता है और जो भी नीली गली से बाहर निकलना चाहता है, उसे तरह तरह के प्रलोभन से फांस लेता है।

     ब्रह्मराक्षस का मोडस ऑपरेंडी आप जानते हैं। श्रद्धा भी इसके बारे में कहानी में लिखती हैं,

“मोबाइल की मेमोरी तो कच्चा घड़ा होती है। मालिक ही अपनी इच्छाओं, जिज्ञासाओं से मेमोरी की मिट्टी को तैयार करता है। सोशल मीडिया, सर्च इंजन से जुड़ी कंपनियां कुछ मिट्टी को बेच भी देती हैं, अन्तत: सभी मिट्टी को डाटा एनालिसिस के चाक पर चढ़ाकर, थपथपाकर आकार देते हैं। इसे बना कर पका कर हमें ही वापस भेजते हैं। हमें विज्ञापन में वही दिखाते हैं, जो हम देखना चाहते हैं।”

     इसका अनुभव आप सबको होगा। अगर आप इंटरनेट पर कोई भी प्रोडक्ट खोजते हैं, तो फिर उसके बाद आप जिस भी साइट पर जाएंगे, जिस भी सोशल मीडिया साइट पर जाएंगे, उसी प्रोडक्ट का विज्ञापन दिखता रहेगा। ब्रह्मराक्षस का काम ही है आपकी प्राइवेसी में घुसपैठ करना और आपके बारे में सबकुछ जान लेना। इस कहानी में युवा हर्षित इसी नीली गली में  फंस गया है।  वह उससे निकलना चाहता है लेकिन ब्रह्मराक्षस बार-बार उसे अपने चंगुल में फंसा लेता है। वह खुद पर नियंत्रण करता है, लेकिन मोबाइल खोलते ही नीली गली वाली वेबसाइट्स के विज्ञापन उसे उकसाने लगते हैं।  ऐसे में खुद को नियंत्रित कर लेना सबके बूते की बात नहीं।

     अपनी इस आदत के  चलते हर्षित किस तरह खौफ और डर में जीता है, इसका बहुत ही प्रभावी वर्णन कहानी में श्रद्धा ने किया है। जब हर्षित का  मोबाइल खराब हो जाता है, तो वह अपना मोबाइल छोड़ दादी का मोबाइल लेकर हॉस्टल जाता है। अपने दोस्त की मदद से वह मोबाइल की फॉर्मेटिंग तो करवा देता है लेकिन हमेशा इस खौफ में जीता रहता है कि कोई वीडियो क्लिप छूट न गया हो, घर में किसी ने देख न लिया हो, उसका भांडा फूट न गया हो। ऐसी बुरी लत में फंसे किशोर-युवाओं अक्सर ही ऐसे खौफ़ में जीते हैं  और कुल मिलाकर उनकी पढ़ाई बर्बाद होती है, भविष्य खराब होता है।

     जब भी बारिश होती है, हर्षित की दादी का मन आल्हा सुनने के लिए मचलने लगता है। जब गांव में थी तो दादा के साथ बैठकर सुना करती थी लेकिन शहर में वह इसके लिए तरस जाती है। बारिश से सराबोर ऐसे ही एक दिन ब्रह्मराक्षस से पीछा छुड़ाने के लिए हर्षित दादी के पास आ बैठता है और तब उसे आल्हा के बारे में पता चलता है। वह मोबाइल पर ही आल्हा लगा देता है। ब्रह्मराक्षस तड़पता रह गया लेकिन हर्षित नीली गली से निकलकर अपनी सांस्कृतिक विरासत की गली में आने में कामयाब हो जाता है।

     इस कहानी की खासियत यह है कि इसमें सिर्फ समस्या ही नहीं है बल्कि समाधान भी है। मौजूदा समय में एक ही घर में सब अलग अलग और अकेले हैं। मोबाइल से चिपके हुए। हर्षित का दादी के पास पहुंचना इस एकांत से मुक्ति है। एकांत में ही ब्रह्मराक्षस की ताकत बढ़ जाती है। आज कोरोना काल में बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह तकनीक का बेहतर इस्तेमाल है लेकिन मोबाइल के साथ ज्यादा वक्त बिताने का एक और खतरा भी है कि ब्रह्मराक्षस कभी भी उन्हें बरगला कर गलत राह पर ले जा सकता है। इसलिए परिवार में बच्चों को एकान्त की आदत से बचाने की पूरी कोशिश होनी चाहिए।

     इस कहानी में आल्हा इस बात का प्रतीक है कि नीली गली जैसी बुराइयों से हमारी महान सांस्कृतिक विरासत ही बचा सकती है। कितना समृद्ध और विविधता से भरा हुआ। ऐसी तमाम अच्छी चीजें हैं, जिनमें बच्चे अगर दिलचस्पी लें, उसमें व्यस्त रहें तो ऐसी बुराइयों से बच सकते हैं। गांवों की लोक परंपरा शहरों तक पहुंच नहीं पाती और अब तो ब्रह्मराक्षस गांवों में भी इन्हें लीलने के लिए बेताब है। इन्हें बचाने की जरूरत है। ये बचेंगे तो हमारी अगली पीढ़ी ढेर सारी बुराइयों से बचेगी।

मुश्क : डॉ आयशा आरफीन

डॉ आयशा आरफीन की कहानी ‘मुश्क’ मुहब्बत की अद्भुत कहानी है । इस कहानी में मुहब्बत रूमानियत के खुले आसमान में नहीं उड़ती बल्कि कड़वी सच्चाई की खुरदरी ज़मीन पर चलती है और लहूलुहान होती है।

इस कहानी के दो हिस्से हैं। पहले हिस्से में लड़की अपनी मुहब्बत बयां करती है। दूसरे हिस्से में इल्हाम छूट गए समय को पकड़ने की कोशिश करता हुआ नायिका के साथ किए गए अपने बर्ताव को याद करता है और पश्चाताप की आग में जलता रहता है।

सधे सुर और सुरीली आवाज़ की मालकिन कहानी की नायिका इल्हाम से बेइंतहां प्यार करती है। जब कोई लड़की मुहब्बत में होती है तो वह अपना सबकुछ न्यौछावर कर देती है लेकिन इल्हाम? वह उससे प्यार के नाम पर टाइम पास करता रहा-अंग्रेजी में जिसे फ्लर्ट करना कहता है। फ्लर्ट भी शायद हल्का शब्द पड़ जाए। इल्हाम के दिल में उसके लिए प्यार जैसा कुछ था ही नहीं। वह उसे फुजूल सी शक्ल वाली फुजूल सी लड़की मानता था।

लेकिन अतीत जब 20 साल पीछे छूट गया है, समय हाथ से फिसल चुका है। इल्हाम अपनी ज़िन्दगी जी रहा है और नायिका अपनी। उसे नायिका के बेटे की मंगनी का दावत मिला है। दावत मिलने के बाद पुराने जख्म कुछ ज्यादा ही हरे हो गए हैं। इल्हाम को अब एहसासा होता है कि जिसे वह फुजूल मानता रहा, वाकई वह सब कुछ फुजूल नहीं था। उस प्रेम की टीस से इल्हाम को चैन से नहीं रहने तेदी। कभी-कभी इंसान अपने अहम में वक्त पर सही और गलत की पहचान नहीं कर पाता और बाद में पछताता है। इल्हाम की कहानी इस पछतावे की है।

आयशा के पास बहुत अच्छी भाषा है। उर्दू और हिन्दी शब्दों का इतना सधा और प्रभावी इस्तेमाल करती हैं कि पाठक उसकी रवानी में बहता जाता है। यह आयशा की चौथी कहानी है। इससे पहले भी मैंने आयशा की दो कहानियां –स्क्वायर वन और लकड़ी का घोड़ा पढ़ीं हैं। इन कहानियों में भी भाषा की ऐसी ही रवानी है। आयशा अपनी कहानियों में रिश्तों की जटिलताओं का विश्लेषण बड़े ही मनोवैज्ञानिक ढंग से करती हैं।

मधु कांकरिया के उपन्यास ‘अनकहा सा कुछ का अंश’

‘उद्भावना’ के कहानी विशेषांक में 7 स्त्री कथाकारों की कहानियों के साथ मधु कांकरिया के उपन्यास ‘अनकहा सा कुछ’ का अंश छपा है। उपन्यास का जितना अंश छपा है, वह एक मुकम्मल कहानी जैसा ही है। विदेश में बस जाने वाले बेटे मोह त्याग कर मां गरीबों की सेवा को अपना मिशन बना लेती है। यह सोचकर वह बेटे से मिलने से भी कतराती है कि कहीं यह मुलाकात उसे कमजोर न कर दे। इसीलिए वह बेटे के यहां विदेश भी नहीं जाती है। मां का किरदार बहुत ही मजबूत और अद्भुत है। बेटा उससे मिलने के उसे ढूंढता फिरता है लेकिन वह से मिलती ही नहीं। किसी यायावर की तरह उसका ठिकाना बदलता रहता है।

प्रकशित अंश में किसानों की कठिन और दुख भरी ज़िन्दगी का मार्मिक चित्रण है। मां को ढूंढता हुआ अविनाश अपने मामा के गांव कामथड़ी पहुंचता है। बातचीत के दौरान मामा बताता है कि किसानी कितनी मुश्किल हो कही है। वह कहता है, ‘हर दिन कोई किसान दफन हो रहा है और उसकी जगह कोई मजदूर, कोई दरबान, कोई सिक्योरिटी गार्ड उग रहा है।’ किसान के गुम होते जाने का ऐसे दर्द को कोई किसान ही समझ सकता है। किसान के सामने केवल भूख की समस्या नहीं है, अपना अस्तित्व बचाने की  चुनौती भी है। यही वजह है कि आज किसानों सड़कों पर है। अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।

हताश अविनाश सोचता है, “जरूरत से ज्यादा हर कुछ जहर है। उसके पास तो हर कुछ जरूरत से ज्यादा है-जरूरत से ज्यादा सुख, जरूरत से ज्यादा पैसा, जरूरत से ज्यादा सुरक्षा, जरूरत से ज्यादा सजावट। क्या इसलिए जिन्दगी में जहर है?  क्या करे वह कि बस जरूरत भर का रह जाए उसके पास?”  अविनाश क्या करेगा, यह जानने के लिए उपन्यास का इंतजार करना होगा। प्रकाशित हिस्से ने उपन्यास पढ़ने की ललक तेज़ कर दी है।

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