सपना सिंह की कहानी ‘उसका चेहरा’

         मैं उससे पहली दफा एक दोस्त के घर मिला था और एक लम्बे अर्से बाद मेरा मन कविता लिखने को होने लगा था।

          दोस्त ने ही उसका परिचय कराया था, इनसे मिलो, अनुसूया अपने शशांक की पत्नी। उसने अन्यमनस्कता से मुझे देखकर हाथ जोड़ दिये थे तभी उधर शशांक भी आ निकला था, इससे मिली… मेरी लंगोटिया है…।’’ उसने बेजारी से सिर हिला दिया था हाँ में। शशांक हम दोस्तों में सबसे ज्यादा हंसमुख मिलनसार और सुदर्शन था। बीवी भी उसने चुनकर छांटी थी।

          मैं पिछले दस वर्षों से प्रदेश के कई शहरों की खाफ छानने के बाद, हाल ही में अपने शहर लौटा था इस संकल्प के साथ कि अब यहीं बस जाऊॅँगा। दोस्त खुश थे मुझे अपने बीच पाकर। खुश मैं भी था पर, शायद तब तक जब तक उससे नहीं मिला था।

          अपने शहर लौटने के बाद से मैं अपने दोस्तों की पत्नियों से मिलता ही रहा था, कभी किसी समारोह में या कभी उनके घर जाकर। कइयों से मैं पहली बार ही मिल रहा था क्योंकि उनकी शादी में मैं शामिल नहीं था, कइयों से मेरी काफी घनिष्ठता थी। सारे दोस्तों की पत्नियां मेरे लिये आदरणीय भाभीजी ही थीं पर, अनुसूया को मैं कभी भाभी जी नहीं कह पाया। मेरे लिये वो अनुसुया ही रही शशांक उसे अनु बुलाता था। मेरे द्वारा उसे इस तरह पुकारने पर, सभी ने समान्य रूप से लिया था खुद अनुसूया ने भी।

          मैं बेचैन था, पता नहीं क्यों थी ये बेचैनी। पिछले आठ वर्षो में, मेरी पत्नी के अलावा और कोई औरत मेरी जिंदगी में नहीं थी, पत्नी के साथ मैं खुश भी था। वह शान्त और खुशमिजाज औरत थी, मेरा और मेरे बच्चों का ख्याल रखने वाली।

          उससे तीसरी मुलाकात के बाद ही मुझे पता चल गया था… मैं उसकी तरफ सिर्फ आकर्षित नहीं हूँ . बल्कि उसे प्यार करने लगा हॅूँ।  ये बात महसूस होते ही मैं घबरा गया था, घबराहट कई कारणों से थी। मेरी उम्र और पोजिसन मुझे इस बात की इजाजत नहीं देती थी कि मैं किसी से प्रेम करूँ। मैं एक जिम्मेदार पति, प्यार करने वाला पिता था। मुझे दस से पांच नौकरी करनी थी और अपने परिवार के लिये सुविधा के साधन जुटाने थे…अपने बच्चों के भविष्य के लिये बैंक में पैसा जमा करते जाना था, कुछ दिन बाद जमीन खरीदनी थी… मकान बनवाना था, बड़ी होती बेटी की शादी करनी थी,  दोस्तो… रिश्तेदारों के यहां शादी, ब्याह, जन्म-मरण में शामिल होकर सामाजिक दायित्व पूरे करने थे। प्रेम करना वो भी अपनी जिगरी दोस्त की पत्नी के साथ मेरे लिए गैरकानूनी, अनैतिक और वर्जित था एक अहमकाना हरकत।

          मैं घबरा इसलिए भी गया था क्योंकि मैं प्रेम की तकलीफ से डरता था, बहुत पहले किशोरावस्था और जवानी के बीच के दिनों में एक बार प्रेम हुआ था पड़ोस की लड़की से। उस वक्त वह दुनिया की सबसे सुंदर लड़की थी मेरे लिए। शायद प्रेम में पड़ने पर सारी दुनिया ही सुन्दर दिखाई देती है, कोई वस्तु अपने वास्तविक रूप में नहीं दिखाई देती … इसकी उल्टी बात भी सही हो सकती है, प्रेम में ही वस्तुएं अपनी वास्तविक रूप में नजर आती हैं।  बहरहाल प्रेम का वो दौर मेरे लिए तकलीफदेह रहा। महबूबा की जुदाई से मैं दिनों बाद उबर पाया। आज वो लड़की चार बच्चों की मां है, मोटी और भद्दी। उसे देखकर आज मैं दहल जता हूं, कभी इसी पर मैं किस कदर फिदा था।

          लेकिन अनुसूया की बात अलग थी। वो थी भी तो अपने आस-पास में सबसे अलग। मेरी तरफ उसका भी झुकाव था। हम दोनों ही उबे हुए थे। वो मुझसे ज्यादा। मुझे तो उससे मिलने के बाद पता चला कि मैं उबा हुआ हूँ, जबकि अपने बारे में उसे पता था, अपने बारे में उसे सबकुछ पता था, कोई दूसरा उसे उसके बारे में कुछ नहीं बता सकता था। उससे कहो, तुम बहुत सुन्दर हो। वो कहेगी मुझे पता है उससे कहो ‘ तुम 32 की उम्र में 22 की लगती हो। वह उकताहट से मस्कुरा देगी, जैसे यही बात बहुतों से बहुत बार इसी तरह सुन चुकी हो। मैं उससे मिलने के बहाने ढूढ़ने  लगा था। वक्त-बेवक्त उसके घर  चला जाता। बातें शशांक से करता, नजरें अनुसूया पर रहती। अनुसूया बातचीत में कम शामिल होती। कभी-कभी तो बाहर भी नहीं निकलती। कभी पास बैठी भी होती तो टी.वी. या मैगजीन्स में उलझी होती।

          मैंने उससे तीसरी या चौथी मुलाकात में ही जता दिया था कि मैं उससे प्यार करता हॅूँ और उसने बिना कोई आश्चर्य व्यक्त किए बड़ी सहजता से इसे स्वीकार कर लिया था।

          हमारी मुलाकात बहुत कम होती थी। सिर्फ एक दूसरे से मिलने के लिए हम बहुत कम मिले। मैंने शुरू में ऐसी कोशिश की थी, लेकिन जब हमने आपस में इकरार कर लिया मेरी वो बेतुकी कोशिशे भी बंद हो गई। हमारे लिए ये एहसास ही खुशी का कारण बन गया था कि रिश्तों से परे हम दोनों एक दूसरे के लिए महत्वपूर्ण है।

          हम अक्सर दोस्तों परिचितों, अपने उसके बच्चों, मेरी पत्नी या उसके पति की मौजूदगी में ही मिलते। मुझे देखकर उसका चेहरा खिल उठता, आंखें चमक उठती, उसे देख मेरी बेचैनी बढ़ जाती… लगता  इन सब के बीच से उसे उठाकर फुर्र हो जाऊं।

          वह हमेशा संयत और सहज बनी रहती। मैं ही दीवाना हुआ जा रहा था। उसका जादू मेरे सिर चढ़कर बोल रहा था। एकाएक मैं दिल तो पागल है के गाने गुनगुनाने लगा था। एक दिन अचानक  घर के आदमकद शीशे में मैं अपने आपको मोटा दीखने लगा, एकदम से मुझे याद आया…  एक जमाने से मैंने कोई कसरत नहीं की। अब मुझपर अपनी तोंद घटाने, जो शायद थी ही नहीं और मसल्स बनाने की धुन सवार हो गई थी। ये सब देखकर पत्नी को सुखद आश्चर्य हुआ था, वो अक्सर मेरे बढ़ते वजन को लेकर चिन्तित रहती थी, तुम अपना कोलेस्ट्राल बढ़ा लोगे, वह मुझे ताबड़तोड़ खाता देखकर चिढ़कर कहती थी।

          जरा मेरे बालों के लिए भी मेंहदी बना देना… हर पन्द्रहियन मैं पत्नी से इसरार करने लगा था, पत्नी चिढ़ाती क्या बात है, किसी पर दिल तो नहीं आ गया।

          क्या बात करती हो… कहकर मैं झेंपी हॅँसी हंस देता…अपनी असामान्य हरकतों को मैं महसूस कर रहा था लेकिन इन सब पर मेरा वश नहीं था। एक मीठी सी रोमानी अनुभूति मुझपर तारी हो गयी थी, जिससे मैं एक अर्से से वंचित था।

          अपने दीवानेपन में मैं एक बार उससे कह बैठा था अगर वो तैयार हो तो मैं सबकुछ छोड़कर उससे शादी कर सकता था।

          सुनकर वो देर तक हंसी थी फिर गम्भीर हो गयी थी – प्रेम से जी भर गया है क्या? उसने पूछा था।

          ऐसा क्यों कह रही हो?

          इसलिए कि शादी प्यार के लिए ज़हर है, सायनाइड। उसके शब्द ही नहीं उसका पूरा चेहरा ही तीता गया था…जैसे कोई कड़वी दवा निगल रही हो।

          उस दिन पहली बार मुझे पता चला था कि अपने पति के साथ उसका प्रेम विवाह था। एक लम्बे अर्से तक दोनों ने आपस में प्रेम किया था, फिर विवाह किया। विवाह के फौरन बाद शशांक खालिस पति में तब्दील हो गया था। मनुहार की जगह आदेश ने ले लिया था। रोमान्स की जगह एक कभी न खत्म होने वाली उब ने। 

‘ प्रेम में आप बंधे होने पर भी स्वतंत्र महसूस करते हैं।एक दूसरे के समकक्ष महसूस करते हैं लेकिन शादी…. कहते कहते वो घृणा से मुंह बिचका देती। पता है, जब मैं प्रेम करती थी बहुत खुश थी। सबकुछ सुन्दर लगता था, बहुत बहुत अच्छा होने का मन करता था, सच, दुनिया की सभी खूबसूरत चीजें प्रेम से ही शुरू होती है न, … लेकिन फिर पता नहीं क्या हो गया? सब गड़बड़ा गया, वही वो है…वही मैं हॅूँ … लेकिन सब उसी का है, मेरा कुछ नहीं। उसका घर, उसके बच्चे, उसकी पत्नी, उसका स्टेट्स इन सब के बीच हर दिन मैं अपने आप को तलाशती रही। अपनी जगह तलाशती रही।’’

     सचमुच, आदमी जो दीखता है, अक्सर वो होता नहीं। शशांक दोस्तों में कितना लोकप्रिय था, सबके दुख सुखः में शामिल। लेकिन , अपनी पत्नी के साथ उसका व्यवहार एकदम दूसरा होता… अनुसूया बताती, शशांक को ना सुनने की आदत नहीं। वही सर्वोपरि है ………… उसकी मर्जी उसका मन, उसके विरूद्ध उसे कुछ भी करने कहने की छूट नहीं, अगर उसने कोशिश की भी तो नतीजा उसकी देह ने भुगता … चेहरे के निशान हफ्तो नहीं मिटे और वह सबको अपनी चोट की झूठी कैफियत देती रही, ’’

     अनुसूइया कहती रहती उसने शादी की तमाग अच्छाइयां और बुराइयां एक साथ झेल ली है!

     मैं पूछता, “अच्छाइयां क्या?’’

     वह मुझे भेदती दृष्टि से देखती, तुम क्या समझते हो, शशांक मुझे प्यार नहीं करता … मेरे बिना वो एक मिनट नहीं रह सकता। मेरी बीमारी में वो मुझे किसी बच्चे की तरह संभालता है। मेरी देखभाल करता है दरअसल वो मुझे हर तरह से अपने पर निर्भर रखना चाहता है …मैं चीखती चिल्लाती हूँ, तर्क देती हूँ तो वो मेरी पिटाई कर देता है … मैं बीमार होती हूं तो मेरी केयर करता है। इससे उसे आत्मतुष्टि होती है। वह मुझे कुछ करने नहीं देता। कहता है मुझमें इतनी क्षमता ही नहीं लेकिन मैंने अपने से हर मामले में कमतर औरतों को काम करते, पैसा कमाते देखा है। वह बोलती जाती धाराप्रवाह। उसके साथ मैं ढे़र सारे विरोधाभासों को झेलती हूँ,  कभी-कभी मैं उसको ढेर सारा प्यार करना चाहती हॅूँ, कभी इतनी नफरत महसूसती हूँ, कि क्षण भर भी उसके साथ रहना दुश्वार लगता है, कभी वो मुझमें संसार की सबसे अधिक सुखी होने का गुमान भर देता है और कभी अपने व्यवहार से इस कदर आहत कर देता कि मैं अपने आप को कगांल, ठूंठ महसूस करती हूँ… अकेली और असुरक्षित।

          छोड़ क्यों नहीं देती उसे …फिर से जिदंगी शुरू करो’’ मुझे शशांक किसी कसाई सदृश्य लगता कैसे सहती होगी वो उसको, इतनी नाजुक सी लड़की।

          क्या होगा उसे छोड़कर सिर्फ भटकाव। हर पुरूष में मैं वही खोजूगीं जो शशांक में नहीं है। उसे छोड़ किसी और से शादी? मुझे लगता है सभी शादियां एक सी होती हैं …। सभी शादीशुदा लोग भी एक से पुरूष। हर जगह शशांक होता है। परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, बहुत से पति मारपीट नहीं करते होंगे दूसरी तरह से टार्चर करते होंगे…’’

     “ऐसा नहीं है। बहुत से लोग सुखी दांपत्य बिताते है’ ’ मैं उसे टोकता तो वह बिफर जाती, ‘‘ये सिर्फ भ्रम बनाये रखना है’’  सुखी विवाह की सिर्फ एक शर्त है  औरत अपने आपको अपने आदमी के मन और मिजाज के मुताबिक ढाल ले… बस्स। फिर चाहे वो लव मैरिज हो या अरेन्ज। ये ईश्वर ने औरतों के दिल और दिमाग पता नहीं क्यूं बनाया जबकि  इसकी कोई जरूरत नहीं होती।  इन दो चीजों ने औरतों को सिर्फ तकलीफें ही दी है…।’’

          मैं अनुसूया की बातें सुनता और डर जाता अपनी पत्नी के प्रति अपने व्यवहार को अंदर ही अंदर तौलने लगता। उसके चेहरे को पढ़ने लगता। मुझे वो पूरी तरह खुश और मगन नजर आती… मैं घबराकर सोचता लगता कि ईश्वर ने इसके दिल और दिमाग नहीं बनाये। अगर बनाये होते तो अनुसूया के अनुसार ये भी तकलीफ में होती…।

          एक दिन मैंने पत्नी से कहा, “सुनो तुम कोई काम क्यों नहीं शुरू कर देती?’  पत्नी ने यूं देखा मुझे जैसे मैं चिड़ियाघर से निकला कोई अजीबोगरीब जानवर होऊं, ‘‘तुम्हें भी क्या सूझी? जब मैं चाहती थी कुछ करना तो तुमने घर का वास्ता देकर रोक लिया था। अब मैं सब भूलभाल गई… अब बुढ़ौती में क्या काम? आराम से तो चल रहा है सब ’’  काम करने से उसका मतलब सिर्फ पैसा कमाने से  था जो मैं अच्छी तरह से कमा ही रहा था।

          अचानक एक दिन पत्नी ने एलान सा किया – वो घर के बाहरी कमरे का, जो अब तक मेरा ऑफिस था (हॉँलाकि मैंने उसमें कभी कोई काम नहीं किया) ब्यूटी पार्लर का रूप देने जा रही है मैं परेशान हो गया – पता नहीं क्यों? अनुसूया को बताया वो वह हमेशा की तरह हंस दी, व्यंग्य भरी हंसी।

          तुम हंस रही हो। यहां मेरा घर डिस्टर्ब हो रहा है। उसकी हंसी, मुझमें खीज पैदा कर रही थी,

          ‘‘हो आखिर तुम भी वही। एक टीपिकल पति, जो अपनी पत्नी की उन्नति अवनति सब का कारण खुद ही बनना चाहता है अब आपकी पत्नी ने अपने मन से काम करने का निर्णय ले लिया तो आप तिलमिला गये। आपकी प्रेरणा आपकी सहायता और आपके आदेश से उन्हें ये निर्णय लेना चाहिये था’’

          मैं निरूतर था क्योंकि यही सच था। पत्नी ने ब्यूटी पार्लर खोल लिया, खुद का ड्रेसिंग टेबल और ड्राइंग रूम का दीवान उसके पार्लर का फर्नीचर था, उसकी शुरूआती कस्टमर मेरे दोस्तों की बीवियां, मोहल्ले की लड़कियां, औरतें थीं। पत्नी ने एक अन्य ब्यूटी पार्लर में नियमित जाना शुरू कर दिया था, हेयर कंटिग वगैरह सीखने।

          वह व्यस्त थी, और खुश भी। खुश तो वह पहले भी, रहती थी… कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता रहा था। उसकी आंखों में चमक और चेहरे पर रौनक थी। मैं अजीब-अजीब सा महसूस रहा था कुछ अकेलापन अपने आप को हाशिये पर जाता हुआ।

          घर थोड़ा बदल सा गया था, मुझे अटेण्ड करने के लिए अब हर वक्त पत्नी नहीं होती। बहुत दिनों तक मेरा घर मुझे अजनबी सा लगता रहा।

     पत्नी का ब्यूटी पार्लर चल निकला था। वह व्यस्त होती, थकी होती, फिर भी आत्मतुष्टि का भाव उसके चेहरे पर अलग से दिखता। मैं सोचने पे पर मजबूर हो जाता आखिर हम मर्द औरतों को यूं घरों में कैद कर उनके सुख के तमाम साधन इक्कट्ठा कर उन्हें बच्चों और रसोई में उलझाकर उन्हें बाहर के कठोर यथार्थ से बचाकर क्या सचमुच उन्हें सच्ची खुशी दे पाते हैं?

     मैं और अनुसूया एक दूसरे की जरूरत बन गये थे। हम जब भी मिलते या ज्यादातर फोन पर ही– बातें अक्सर वही करती। मैं सिर्फ उसे देखता या फिर सुनता। उसके पास बातों के ढेर होते। लगता उसने एक अर्से से किसी से बात नहीं की है, अजीब सी बात थी। उसकी ज्यादातर बातें पहले की थीं, उसके छुटपन की उसके मम्मी पापा की… उसकी सहेलियों की… स्कूल कॉलेज की ढेरों बातें, जिसे शायद उसने किसी से नहीं बताया था।

          उसके चेहरे पर अन्दरूनी तृप्ति का भाव होता। मुझे खुशी होती कि इस तृप्ति की वजह मैं हॅूँ। किसी से बात कर सकना भी कितनी बड़ी बात है। कहने को तो दुनिया में कोई आपका दुश्मन नहीं होता, सभी दोस्त ही होते हैं,  हितैषी होते हैं लेकिन कितनों से हम मन की बाते बांट पाते हैं … कितनों के सामने हम अपने अंतर की सारी गांठें खोल कर निर्बाध बहने देते हैं खुद को।’’

          एक दिन अनुसूया ने मुझे टोका, तुम हमेशा मेरा नाम गलत उच्चारते हो “अनुसूइया नहीं, अनुसूया कहा करो’’  मैंने अपना उच्चारण तो नहीं बदला था, हाँ, उससे उसके नाम का मतलब जरूर पूछ बैठा था, उसने बताया था। सती अनुसूइया की कहानी, जिन्होंने अपने सत् के बल पर तीनों देवों को बालक रूप में परिवर्तित कर दिया था, जिन्हें शंकर ने दुर्वासा जैसा पुत्र दिया था। मैं उसके नाम के पौराणिक महत्व और उसकी जिंदगी के यथार्थ की मीमांसा करता रहा था, कितना कंट्रास्ट था दोनों में। शायद कंट्रास्ट में रहना ही उसकी नियति थी।

     हमारे बीच जो रिश्ता था … हम दोनों ही उस पर सोचने से डरते थे। कभी – कभी वो बहुत उदास होकर कहती, तुम और मैं ऐसी राह पर चल रहे हैं, जिसकी कोई मंजिल नहीं और बगैर मंजिल की राहें चाहे कितनी ही खुशगवार और खूबसूरत क्यों न हो बेमतलब होती है।

          एक दिन अचानक अनुसूइया ने मुझे फोन किया – भराई हुई रूआंसी आवाज। ‘‘क्या बात है?’’  मुझे लगा शशांक से से फिर उसका झगड़ा हुआ है

          “मुझसे अभी मिलो’’  कहकर उसने फोन काट दिया था। मैं उजबक की तरह बैठा सोचता रहा था कहां जाकर मिलूं, ये तो उसने बताया ही नहीं …… मैं घर ही गया दरवाजा उसी ने खोला था।

          एकबारगी मैं अचकचा सा गया था उसका चेहरा… मैं वो चेहरा आज तक नहीं भुला पाया। उसके बाएं गाल पर आंख के ठीक नीचे खून का काला पड़ चुका गहरा निशान था। उसे पूरी ताकत से और कई बार उसी जगह पर मारा गया था जिसका असर उसकी गर्दन और पीठ तक था, उसके चेहरे पर दर्द, अपमान, क्रोध बेचारगी और शर्म के गडमड भाव यूं पसरे थे वह वर्षो की बीमार लग रही, वह वो अनुसूइया बिल्कुल नहीं थी जिसे मैं जानता था ………..। उसका चेहरा मुझमें एक हताशा …………. एक थकान पैदा कर रहा था।

‘‘तुम तुम उस जानवर के साथ रह क्यों रही हो ’’ मेरे मुंह से यही निकला पता नहीं क्यों ’ आंसू उसके गालों पर वह रहे थे,’’ मेरे पास कोई और विकल्प नहीं। शायद किसी रोज वह बहुत जोर से मारे और मेरे दिमाग की कोई नस फट जाये और मैं…।’’

          मैं चुपचाप सुन रहा था मेरे पास कहने को कुछ नहीं था। मैं जानता था मैं उसकी कोई मदद नहीं कर सकता था, उसके आंसू उसके गालों से ढलक कर उसके आंचल को भिगो रहे थे, ’’ मुझे नहीं पता मुझे मारकर उसे कैसी अनुभूति होती है, लेकिन मेरा तो सबकुछ छिन्न भिन्न हो जाता है… कुछ समझ में नहीं आता क्या कंरू … कभी लगता है अपने सारे बाल नोच डालूं कपड़े फाड़ डांलू और सड़क पर निकल पंडू ……………… या कि भीख मागने लगूं ………… या फिर शरीर बेचने लंगू कुछ भी ……………. वो जो तकलीफ होगी वो सच्ची तो होगी, ऐसी तो नहीं कि समाज में तुम सुखी समझे जाओ ………. किस्मत के धनी समझे जाओ और असल जिंदगी इतनी बदसूरत हो ……………….।’’ वह विक्षिप्तों ……………. की तरह रोते जा रही थी। मैंने उसे शान्त करना चाहा।

     ‘‘ मैं शीशे में  अपना चेहरा देखने से डरती हूँ। मेरा ये टूटा – फूटा चेहरा उसकी गहरी नफरत का प्रतीक है। मुझसे बरर्दाश्त नहीं होता जिसके लिये मैंने सबको छोड़ दिया … सबकुछ भुला दिया … मुझे अपने आपसे नफरत होती है। मैंने ऐसे व्यक्ति से प्यार क्यों किया? शादी क्यों की? और अब क्यों रहे चली आ रही हूं उसके साथ?’’

          वह देर तक रोती रही … मैं चुपचाप उसकी पीठ पर हाथ फेरता रहा। कुछ देर बाद वह उठी जाकर मुंह धुला, पानी पिया, फिर आकर मेरे पास बैठ गयी …………… मैं अब भी सीधे उसके चेहरे पर नहीं देख पा रहा था।

          “सुनो…तुम यहॉँ से ट्रान्सफर ले लो।’’ उसकी आवाज़ संयत थी ।

          “क्या… क्यों…?’’ इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से मैं अचकचा गया था।

          “देखो मेरे चेहरे पर ये निशान पहली बार नहीं बने हैं लेकिन मैं नहीं चाहती तुम इसकी वजह बनो।”

          मैं चला आया था उसके घर से  और फिर उसके शहर से भी। मैं नहीं जानता मैंने ऐसा क्यों किया? क्यों चुपचाप अनुसूइया की बात मान गया? पता नहीं  ये अनुसूइया के प्रति मेरा प्रेम था या फिर मैं डर गया था उसके चेहरे पर पड़ी भयानकता की तस्वीर देखकर…।

          उस चेहरे को मैं कभी नहीं भूल पाया। वो बेहद सुन्दर थी, जहीन भी थी, और साहसी भी। वो एक झटके में शशांक से अपने संबंध तोड़ सकती थी। अकेले रह सकती थी। या चाहने पर फिर से घर बसा सकती थी वो अगर ऐसा कुछ नहीं कर रही थी तो इसलिये कि इन्सान की जिन्दगी में शायद एक वक्त ऐसा आता है जब उसकी सारी आशाएं चूक जाती हैं। और जब आशाएं नहीं बचती तो शिकायत भी नहीं बचती। शिकायत नहीं होती तो कोई कोशिश भी नहीं होती। अनुसूइया वहॉ तक जा पहुंची थी जहां निराशा जड़ होकर अध्यात्म का रूप ले लेती है।

          उसकी याद एक टीस की तरह उभरती और पूरे वजूद पर छा जाती , कभी कोई नहीं जान पायेगा कोई एक शशांक है, सभ्य सुसंस्कृत पुरूष, जो अपनी पत्नी को पीटता है, और कोई एक अनुसूइया है, सुन्दर जहीन साहसी, अपने पति से मार खाती है, रोती है, फिर भी उसे प्यार करती है, उसके साथ रहती है

मैं अपने आप से शर्मसार था, इसलिये कि मैं कुछ नहीं कर पाया था। इतना भी नहीं कि उसकी जड़ता को खत्म कर उम्मींद की एक हल्की सी किरण ही जगा दूं उसके भीतर।  सिर्फ लौट आया था।  चुपचाप !

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सपना सिंह

शिक्षा              –     एम.ए. (इतिहास, हिन्दी), बी.एड.

प्रकाशित कृतियां     –     धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान के किशोर कालमों से लेखन की शुरूआत, अबतक -‘‘हंस, कथादेश, परिकथा, कथाक्रम, संबोधन, निकट समेत विभिन्न पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। एक कहानी संग्रह और उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य।

संपर्क                       

द्वारा प्रो. संजय सिंह परिहार

म नं. 10/1279, आलाप के बगल में,

अरूण नगर रीवा (म.प्र.) 486001

मो. नं. 09425833407

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