लेखन से क्या मिला? लिखने से क्या होगा?

लेखन से क्या मिला ? लिखने से क्या होगा? ऐसे सवाल अक्सर पूछे जाते हैं। इनके जवाब दे रहे हैं वरिष्ठ कथाकार और साहित्य की बहुचर्चित पत्रिका ‘निकट’ के संपादक कृष्ण बिहारी

लिखने से क्या होगा?… आदि, ऐसे सवाल हैं जो कई-कई बार अपने साहित्यिक मित्रों से मुझे सुनने को मिले और हर बार मैंने इनके उत्तर खुद में खोजने चाहे …

मुझे ऐसे सवालों पर हमेशा महसूस हुआ कि यह हताश, निराश मित्रों की व्यथा है जो उन्हें कुंठित कर रही है । उनका ध्यान अपनी रचनात्मकता पर न होकर दूसरों की उपलब्धियों से आहत है। रचना में एक बड़ी लकीर खींचने की जगह वे खिंची लकीर को छोटा करने की विफल कोशिश में खुद को लहूलुहान कर रहे हैं।

यह सोचकर किसी ने भी लेखन शुरू नहीं किया होगा कि उसे कुछ मिलेगा । गुलेरी जी ने कब जाना कि अपनी मात्र 3 कहानियों से हिन्दी जगत में हमेशा जाने जाएंगे।

आज हिन्दी में पाठकों से अधिक लेखकों की संख्या है। यह संख्या क़लम , दवात और कागज़ से कोई रिश्ता नहीं रखती। इसे उन चीज़ों से मोहब्बत ही नहीं जिनकी पूजा होती थी। पूजा इनके लिए ढकोसला है। रचना को अपने पास रखने का धैर्य भी इस संख्या के पास नहीं है। तुरंत छपना इनका लक्ष्य है। आसमान पर बैठ जाना इस संख्या का स्वप्न है और भीड़ में लुप्त हो जाना इनका भविष्य है। अपने लिखे हुए को बार-बार न पढ़ते हुए देखना इनकी भाव-विहीन रति है।

हिन्दी में लेखन से लक्ष्मी सबको मिली हो , ऐसा भी नहीं है। मिल जाये तो सौभाग्य है। लक्ष्मी पाने के लिए लेखक होने से बेहतर वह प्रकाशक होना है जिसे अपनी सरस्वती और लक्ष्मी देकर यह संख्या और कुंठित , और कंगाल होते हुए प्रकाशक को दिन-दिन धनी बना रही है।

ईमानदार लेखन का मतलब हर रचना में पहले से बेहतर होते जाना है। लेखन आगे की यात्रा है। अपने समय से आगे जाना है ।

रुक कर , असफल व्यथा और ईर्ष्या के सहारे कोसते रहकर किसी भी क्षेत्र में कुछ भी प्राप्त नहीं होता। जिन लोगों की जोड़-तोड़ कोशिश को आप उनकी सफलता मान बैठे हैं , एक पल ठहरकर सोचें कि अगर वे सफल हैं तो फिर जोड़-तोड़ में क्यों लगे हैं ? गैंग बनाकर क्यों हैं? अकेले की शक्ति उनसे दूर होकर उन्हें निर्वीर्य क्यों बना बैठी है ? उनकी सफलता उस गुंडे की सफलता है जिसकी गुंडई दस साल से ज़्यादा नहीं चलती क्योंकि उसका गैंग , गैंग वार में ख़त्म हो जाता है। गैंग ख़त्म हुआ नहीं कि उसकी जीप डिवाइडर से लड़कर पलट जाती है।

लेखन से यश , सम्मान और लोकप्रियता मिलती है। सामाजिक स्वीकृति मिलती है। समाज में एक भूमिका मिलती है। बशर्ते , लेखन और जीवन में ईमानदारी हो।

दूसरा सवाल है कि लेखन से क्या होगा?  इसका उत्तर अपनी समझ से दे रहा हूँ…

साहित्य एक थाती है। विरासत है । पूंजी है । धरोहर है । पूंजी से क्या होता है ? पूंजी संकट में काम आती है । संकट केवल आर्थिक ही नहीं होता। मनोबल का कमज़ोर होना भी एक संकट है । शायद मनुष्य का सबसे बड़ा संकट। ऐसे में साहित्य ही संकटमोचक होता है। आपके लिखने से थाती , विरासत, पूंजी, धरोहर का खज़ाना बढ़ता है।

क्या कारण है कि वाल्मीकि से अबतक अनगिनत लोग जन साधारण की स्मृतियों में आज भी ताज़ा दम जीवित हैं?

स्पष्ट है कि अनगिनत रचनाकारों ने रचना की है। आत्मविस्मृति को भक्ति के सागर में डूबकर भवसागर को न केवल स्वयं पार किया बल्कि जगत को तारणहार से बड़ी सरलता से मिलवाया। इन विभूतियों ने कभी दावा नहीं किया कि उन्हें विभूति कहा जाए। इन्हें बिन मांगे वह मोती मिला जिसकी कीमत आजतक तो कूती नहीं जा सकी। इन्होंने जो विचार दिए वे आंदोलन उसी दिन नहीं बने जिस दिन उद्गार के रूप में निकले लेकिन समय ने उन्हें आंदोलन सार्वभौम आंदोलन बना दिया। युग लगे हैं सत्य को सत्य समझने में। ये सभी रचनाकार दुनियावी दुनिया से तो चले गए लेकिन उनकी आत्मा चराचर जगत के बीच बस गई। इसलिये ये आज भी जीवित हैं। इन्होंने यश , सम्मान , पुरस्कार और झौवा भर प्रशस्ति पत्रों के लिए मनसबदारी नहीं की। क्या इन जैसा आचरण आपका चरित्र है ? जब आप कोई प्रश्न पूछते हैं तो कोई न कोई उत्तर आपके पास भी होता ही होगा ।

चूंकि , आपका प्रश्न उत्तर की जिज्ञासा से दूर एक दूषित प्रश्न है , असफलताजन्य और अवसरवाद में जगह बनाने की कुत्सित जल्दबाजी है इसलिए अपनी अकर्मण्यता पर चादर डालने की कोशिश है । आपके पैर चादर से निकले नहीं हैं कि आप उन्हें ढंकने की कोशिश में कोई उपाय करें। आप सिर से पैर तक चादर में ढंके हैं और उनको भी ढंकने में लगे हैं जो अपनी रचनात्मकता की चादर को बड़ा करने में लगे हैं।

लिखने से तुरंत कुछ नहीं होता मगर होता है। लिखने से समाज को विचार मिलते हैं । सामाजिक कुरीतियां मिटती हैं। परिवर्तन होता है । विकास और उत्थान होता है। क्रांतियां होती हैं । लेकिन , लिखने से होती हैं। गाल बजाने से नहीं होतीं । बोरा भर घटिया उत्पादन से नहीं होतीं। हाथ पर हाथ रखकर बैठने या मोबाइल पर उंगलियां थिरकाने से नहीं होतीं। सार्थक लेखन से होती हैं ।

इसलिए लिखने से क्या होगा ? पूछने के बजाय पहले पढ़ें और जानें कि पढ़कर आपको क्या हुआ । अगर आपको कुछ नहीं हुआ तो आपके लिखने से भी कुछ नहीं होगा।

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