विशाल मौर्य विशु की तीन ग़ज़लें

एक

यार अब  तो ऐसा  आलम  हो गया है
मेरा हर इक जख्म मरहम हो गया है

कुछ दिनों से वो नज़र आया नहीं के
तनहा तनहा सा ये मौसम हो गया है

हसते हैं सब, खुश मगर कोई नहीं है
आदमी का आँसू हमदम हो गया है

ये भी मेरा है और वो भी मेरा ही है
हाय मुझको  कैसा  भ्रम  हो गया है

दो

जमाने को भी ये खबर हो गया है
मुहब्बत तो तनहा सफर हो गया है

ना तो दिन ढलते हैं ना ही रातें गुजरती
जुदाई का  ऐसा  असर  हो गया है

जहाँ ख्वाबों का मेला लगता था हर पल
शहर दिल  का वो  दरबदर हो गया है

उसे चाहा था हमने साँसों की तरह
किसी और का वो मगर हो गया ह

तीन

दुश्मन के हर वार को जिन्दा रखो
जीतोगे, बस हार को जिन्दा रखो

हर झूठ को दफ्न हो ही जाना है
सच लिखते अखबार को जिन्दा रखो

पहचान तो मिल ही जायेंगी कभी
तुम मरते किरदार को जिन्दा रखो

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